Friday, October 7, 2011

मै थोड़ी हैरान हूँ !

                                     जिस विषय पर आज लिखने जा रही हूँ हालाँकि उस विषय पर पहले भी लिख चुकी हूँ, पर इस बार बात और सोच थोड़ी अलग है | विषय है बालश्रम | जानती हूँ विषय पुराना है पर विश्वास रखिये सोच नयी ही होगी |
                                       


                                  सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं की आखिर मैंने ये विषय चुना ही क्यूँ | आज कल फिर पढाई करने लगी हूँ, असल मैं मैंने कानपुर यूनिवर्सिटी में ही मास्टर इन सोशल वर्क में एडमिशन लिया है | और ये शायद मेरा सौभाग्य ही है की यहाँ आते ही एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मेरे विभाग को मिल गया | जिसमे  शहर में मौजूद बाल श्रमिकों के बारे में सर्वे करना था | चूँकि पत्रकारिता की भी छात्रा रह चुकी हूँ इसलिए चाहते हुए भी वो कीड़ा अपने अंदर से नहीं निकाल पायी हूँ, और कुछ हद तक ये बहुत अच्छा भी है शायद तभी  निष्पक्ष  और संवेदनाओं से परे रह कर काम कर पाऊँगी |
                                        इस सर्वे के दौरान अलग अलग लोगों से अप्रत्यक्ष रूप से लोगों से जानने का प्रयास किया की आखिर शहर में बाल श्रम की स्थिति क्या है पर जवाब संतोषजनक नहीं थे, तब अपने पत्रकारिता गुरु की सलाह पर कुछ देर के लिए सोशल वर्कर से फिर पत्रकार बन कर सर्वे का काम शुरू किया | आपको जानकर आश्चर्य होगा ३० मिनट के अंदर ही १०० से  १५० बाल श्रमिक सामने आ गए | सर्वे का काम तो उस वक्त हो गया, पर एक नया सवाल मेरे सामने खड़ा हो गया |
                                           इस दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसे बाल श्रमिक से हुई जिसने मुझे फिर नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया | मैंने जब उस बच्चे से पूछा की क्या वो मुफ्त में पढाना लिखना चाहेगा | तो उस महज १०-११ के बच्चे का जवाब था " पागल हूँ क्या, पढ़ाई किसको करनी है, हाँ पैसा कमाने का कोई और तरीका हो तो बताओ "| मुझे हंसी भी आई और बहुत हैरानी और अफ़सोस भी हुआ |   समझ ही नहीं आया कि इस बच्चे कि बात को किस तरह से लूं | कहीं ऐसा तो नहीं कि हम किसी गलत दिशा में प्रयास कर रहे हैं |

              हाँ हम गलत दिशा में ही प्रयास कर रहे हैं | हम [ यानि सरकार] लगातार स्कूल खोलते जा रहे हैं , आये दिन सरकारी योजनाओं के तहत स्कूल खुलते हैं , उनमे भोजन मिलता है , किताबें भी मुफ्त मिलतीं हैं और तो और यूनिफार्म भी मुफ्त ही मिलती है | पर क्या सरकार ने कभी भी ये जानने की कोशिश की कि क्या इन स्कूलों में जितने बच्चे पढ़ रहे हैं वो वास्तव में पढ़ना भी चाहते हैं या नहीं | शायद  नहीं ! और बिना सोचे समझे वो इन शिक्षा सम्बन्धी योजनाओं पर पानी की तरह पैसा बहा रही है |

                                             एक मिनट आप लोग ये बिलकुल मत सोचियेगा की मैं देश की भावी पीढ़ी की शिक्षा के पक्ष में नहीं हूँ | मेरी ऐसी सोच बिलकुल नहीं है | मैं भी भी चाहती हूँ की हमारा देश विश्व का सबसे शिक्षित देश बने | पर उसके लिए सबसे पहले उस भावी पीढ़ी के मन में ये सोच डालनी होगी की शिक्षा के बिना वो अल्पकालिक धनार्जन या तरक्की तो कर सकते हैं पर दीर्घकालिक विकास और तरक्की के लिए शिक्षा के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है |

                             इस वक्त इन बच्चों को स्कूल से ज्यादा किसी अच्छे काउंसलर यानि किसी अच्छे परामर्शदाता की ज़रूरत है , जो की सर्वप्रथम इनकी सोच बदल सके | क्यूंकि बिना सोच बदले सरकार लाख स्कूल बना ले पर इस बच्चों को शिक्षित नहीं कर पायेगी | एक बार कभी अपने इलाके के किसी सरकारी स्कूल में जाकर देखिये ७० से ७५ प्रतिशत बच्चे तो आपको वहाँ सिर्फ मिड-डे-मील के लालच में ही दिखेंगे | गलती इनकी भी नहीं है एक भूखा इंसान किताबों से तो पेट नहीं भर सकता, और वो भी बच्चे , बिलकुल नहीं |

                                     ये जो कुछ भी मैं कह रही हूँ ये कोई कल्पना नहीं है , ये वो सच है जिसे आप जब चाहें जांच सकते हैं | सिर्फ एक बार किसी बाल श्रमिक को रोक कर उससे पूँछिये कि मुफ्त स्कूल और कमाई में वो क्या चुनेगा ? यकीन मानिये ९५ प्रतिशत से ऊपर बच्चा कमाई ही चुनेगा |   कारण उस सोच कि कमी | बच्च आपना भविष्य खुद नहीं देख सकता , हमें उसे सपने देखना सिखाना होगा | हमें उसे ये बताना होगा कि अगर असल तरक्की चाहिए तो पढाना ही पड़ेगा | उसमे पढई के प्रति रूचि डालनी होगी |  वरना ये बेवजह स्कूलों कि भीड़ लगाने का कोई फायदा नहीं होने वाला |

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