Monday, September 12, 2011

हाँ सर क्या लेंगे आप !

                       
                                                                  हं हं ये ज़रूरी नहीं की हर बार आपको इतने ही शिष्ट और सभ्य शब्द सुनाई दें कभी कभी तो ऐसे कर्कश ध्वनि आपके कानों में गूंजती है की आपका कुछ खाने का मन ही नहीं करेगा | क्यूँ ऐसा आपके साथ कभी नहीं हुआ | मिडिल क्लास नहीं होंगे ना, इसलिए | देखिये मैंने बहुत अच्छे रेस्टोरेंट्स में भी खाना खाया है और साधारण से दिखने वाले ढाबों पर भी खाया है |

                                     हर जगह अलग-अलग नज़ारे देखने को मिलते हैं | अगर किसी शिष्ट जगह पहुँच गए तो आप एकाएक स्वयं को किसी बड़े राजा महाराजा से कम महसूस नहीं करेंगे | होटल का वेटर आपको इतना  आदर देगा जितने की शायद आपको आदत नहीं होगी | पर क्या करे बेचारा घर पर बीवी से चाहे  कितनी ही बुरी तरह से झगडा कर के आया हो आपका स्वागत वो मुस्कुराहट के साथ ही करेगा | बड़ा अच्छा लगता है | एक साफ़ सुथरी मेज़ पर वो बिलकुल चमचमाते गिलासों में पानी लाकर देगा | आपको भी प्यास लगी होगी पर आप आस पास के लोगों पर अपनी नज़र दौड़ाएंगे की वो इस परिस्थिति में क्या कर रहे हैं | यकीं मानिये अगर पड़ोस की टेबल पर बैठे सूटेड बूटेड आदमी ने पानी नहीं पिया है तो आप भी सहर्ष प्यासे मरना स्वीकार करेंगे | फिर आप नज़र डालेंगे मेन्यू पर | पहली बार में तो आप सारी डिशेज का रेट देखेंगे, फिर शुरू होगा औड मैन आउट वाला सिस्टम | यानि आप हर उस चीज़ को अपनी पसंद से बाहर करने का प्रयास करेंगी जो असल में आपके बजट के बाहर हैं | अब बारी आयेगी आपकी बीवी की जो शत प्रतिशत आपका ही अनुसरण करेगी, एक सीधा सा जवाब जो अपने लिए मंगा रहे हैं वही मंगा लीजिए | आप उन्हें थोड़ी अजीब सी निगाहों से देखेंगे और सोचेंगे की काश कुछ और ऑर्डर करती तो वो भी खाने को मिल जाता | पर चलो कोई बात नहीं जो है वही खाते हैं | अब बारी आएगी सबसे बड़ी परीक्षा की यानि बच्चों की | अगर धोखे से पूंछ लिया तो मान कर चलिए की मेन्यू की सबसे कीमती डिश पर ही उंगली जायेगी | अब क्या करें, अब आप उसे अपनी पूरी ताकत लगा कर उसे समझाने का प्रयास करेंगे की बेटा ये बिलकुल अच्छा नहीं है या ये बहुत सारा है आप इसे खा नहीं पायेंगे और ना जाने क्या क्या | बच्चा अगर समझदार हुआ तो आपका इशारा समझ जायेगा पर अगर वो कलयुगी संतान हुई तो ये मान लीजिए आपका बजट बिगडने वाला है |



           यहाँ तक का सफर तो फिर भी ठीक था | अब बारी आयेगी उस अमूल्य भोजन को गले से नीचे उतारने की | वेटर बहुत ही सफाई से आपकी टेबल पर आपका सारा आर्डर लाकर रखेगा | अचानक एक ज़ोरदार धमाका होगा जानते हैं ये क्या हुआ, असल में आपके बच्चे ने टेबल पर रखा पानी का गिलास गिरा दिया होगा | आप एक लज्जित और अर्धविक्षिप्त मुस्कुराहट से आस पास के लोगों को देखते हुए कहेंगे की आज कल के बच्चे बहुत शैतान हो गए हैं | उसके बाद धीमे से अपने बच्चे को चुटकी काटते हुए उसे कहेंगे की घर चलो तब बताऊँगा, आज के बाद कभी घुमाने नहीं ले जाऊँगा | बच्चे को एकाएक अपनी गलती का अहसास होता है, और वो शांत हो जाता है | अब आप खाना खाना शुरू करते हैं | छुरी कांटे से खाना आपके लिए थोडा मुश्किल होगा पर आखिरकार आप फ़तेह पा ही लेंगे | और आखिर में वेटर को पेमेंट के दौरान सिर्फ रौब दिखाते हुए एक अच्छी खासी टिप देकर वहाँ से एक विजयीभव् जैसा भाव लेकर वहाँ से बाहर निकलेंगे |
                    कहानी यहीं खतम नहीं होगी असल में ये कहानी अगले दिन आपके दफ्तर और पड़ोसियों तक भी   किसी ना किसी रूप में जायेगी | और तब समाप्त होगा आपका असली राजसी दिन |

     
              इस पूरी कथा के बाद अब आते हैं एक दूसरे चित्र पर जो ज्यादा आम है | ये जिंदगी है स्ट्रीट फ़ूड की, नुक्कड़ पर बिकने वाली चाट और पानी पूरी की | जो मेरे हिसाब से उस आलिशान होटल के खाने से कहीं ज्यादा स्वादिष्ट है | खास तौर पर आज मैं सभी महिला ब्लोगर्स को उनके पुराने या वर्तमान दिन याद दिलाने का प्रयास करूंगी | जब कॉलेज के बाहर लगे ठेलो पर अपनी सहेलियों के साथ खूब गोल गप्पे खाए हैं | आज भी जब कभी भी इन ठेलों के सामने से गुज़रना होता है तो हम वहाँ से कुछ खाए बिना नहीं रह पाते | सच कहूँ तो कोई फर्क नहीं पडता था की वो ठेला कैसा है उसने हाँथ धोए हैं या नहीं | मज़ा तो तब आता था जब कुछ सेकण्ड इंतज़ार के बाद आपका नंबर आता है तो एन उसी वक्त कोई और अपनी कटोरी आगे कर देता था | ऐसा लगता था मानो किसी ने हमसे हमारी पूरी जायदाद ले ली हो |एक और चीज़ जो अक्सर गर्ल्स कॉलेज के बाहर मिलती है, जिसे मैंने तो नहीं चखा पर हाँ अपनी सहेलियों को खाते हुए ज़रूर देखा है और वो है इमली  और वो रंग बिरंगा चूरन और साथ में एक और ठेला जहाँ कुछ ठंडा मिलता था याद आया वो रंग बिरंगे बर्फ के गोले और फलूदा | ये तो मैंने खाया है और आज भी अगर मौका मिलता है तो  उसे छोडती नहीं हूँ |


                 सच कहूँ तो ये सब चीज़ें सिर्फ और सिर्फ हमारे देश में ही मिल सकतीं हैं | ये वो स्वाद हैं जो सिर्फ आपकी ज़बान पर नहीं आपके दिल में रहते हैं | आप जब भी चाहें इनको बिना खाए इनका स्वाद ले सकते हैं | मुझे यकीन है इस पोस्ट को पढने के दौरान भी आप में से कईयों के मुंह में पानी आ गया होगा | तो कोई बात नहीं ये तो हमेशा हमारे बजट में आएगा | तो चलिए चलते हैं फिर उन्ही ठेलों पर | और कहते हैं "भैया थोडा मटर और डालो ना या थोडा पानी और मिलेगा"|





11 comments:

केवल राम : said...

बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है आपका यह आलेख ....आपने बहुत गंभीरता हर व्यक्ति की स्थिति और उसकी मानसिकता का परिक्षण किया है ....!

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

भारत मे सभी वर्गों की जेब के अनुसार पेट भरने का जुगाड़ हो जाता है. हां रेहड़ी के चाट और गोलगप्पों स्वाद ही कुछ और है. मैं भी जायका इंडिया की तर्ज पर घुमक्कड़ी में सभी तरह के खानो का स्वाद लेना नही भूलता। बढ़िया आलेख......आभार

Geeta said...

sach kaha aapne in thelo pe khane ka swad anokha hi hai,
" muh mei panni aa hi gaya"

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

भारत की बात निराली है।

मदन शर्मा said...

आपके विचारों से सहमत!
वर्तमान का यथार्थ है आपकी रचना में...

मीनाक्षी said...

यकीनन अपने देश की बात निराली है...पानी पूरी से ज़्यादा गोल गप्पे कहने मे मज़ा आता है और अन्दर बैठ कर खाने की बजाए बाहर खड़े होकर खाने मे अपना ही मज़ा है...

सुबीर रावत said...

चाट, गोलगप्पे की बात पढ़कर मुंह में पानी आ गया..... अच्छा आलेख. आभार !

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने।

सादर

Kunwar Kusumesh said...

ओह,आपका ब्लॉग भी है,ये तो अभी देखा.तमाम तरह के पकवानों की चर्चा मज़ेदार लगी और खाने का मन भी करने लगा.

Vijai Mathur said...

आपका कहना सही है कि होटल के मुक़ाबले ठेले का सामान ताजा होगा। मैंने 1975 से 1985 तक आई टी सी के होटल मुगल ,आगरा मे बतौर अकाउंट्स सुपरवाइज़र काम किया है और चेकिंग/इंटरनल आडिट भी किया है। कोल्ड स्टोरेज मे सारा खाना रेडीमेड मौजूद रहता है। आर्डर के मुताबिक डिश को कीचेन मे लाकर हेवी वाट बल्ब्स से गरम करके टेबुल पर परोस दिया जाता है। अपनी आँखों से यह सब देखा है। यह सब भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद और चिकित्सकों के पेशे केलिए फायदेमंद होता है क्योंकि उनके ग्राहकों की संख्या बढ़ती रहती है।

ठेले वाले तुरंत गरम सेंकते हैं जिससे बासीपन का नुकसान नहीं होता है।
होटल मे भोजन अमीरों के चोचले हैं जो पूँजीपतियों को लाभदायक होता आई।

Vijai Mathur said...

आप सब को विजयदशमी पर्व शुभ एवं मंगलमय हो।

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