Tuesday, August 30, 2011

ईद मुबारक !



सभी देशवासियों को ईद की बहुत बहुत बधाई |

Saturday, August 20, 2011

मेरा सपना पूरा हुआ !

                   



                                   
                                                         बचपन से लेकर आज तक मेरे मन में हमेशा ये मलाल रहा था कि आज़ादी कि लड़ाई में मैं अपना योगदान नहीं दे पाई थी पर आज कि परिस्थितियों में मुझे ऐसा लगता है कि शायद मेरा ये सपना पूरा हो जायेगा | हो सकता है कि इस मिशन मैं उतना एक्टिव पार्टिसिपेशन ना कर पाऊँ पर इंटरनेट की सहायता से  कुछ ना कुछ योगदान तो दे ही रही हूँ |

                 पर एक अफ़सोस है , अफ़सोस इस बात का कि आज कि इस पीढ़ी असल में देश के मोल को समझ ही नहीं पायी है |  वो ये समझ ही नहीं पाई है कि उन्हें ये आज़ादी आखिर मिली कैसे है | कितने लोगों ने अपनी जाने दिन हैं तब जाकर वो आज खुली हवा में साँस ले रहे हैं | वरना आज भी वो शायद किसी गोरे के जूते साफ़ कर रहे होते | आज़ादी की  उस जंग में  शायद उनके अपने शहीद नहीं हुए हैं , तभी वो इस बात का अंदाज़ा नहीं लगा पाते की देश असल में होता क्या है | उनके लिए भारत का मतलब सिर्फ किसी फॉर्म में नागरिकता का कॉलम भरने तक ही सीमित है |  उन्हें जो मिल गए उसी में खुश हैं , अपनी तरफ से इस देश को कुछ देना ही नहीं चाहते | 
               भारत में आई आई एम , आई आई टी से पढ़ लिखकर वो उन्ही गोरों के साथ काम करने में फक्र महसूस करते है जिन्होंने हमें लूटा था |  चले जाते हैं ये देश छोड़ कर गैर मुल्कों में |समझ नहीं आता ये कैसी पीढ़ी है ?  जो तरक्की के तरीके अपने मुल्क से सीखती है और तरक्की करती किसी और की है | 

                     देश में इस वक्त चल रही जन लोकपाल की बयार ने कहीं ना कहीं थोडा सुकून तो दिया ही है | आज अरसे बाद हम कही ना कहीं फिर से एक हो रहे हैं | शायद इस बात से हमारी इस नयी पीढ़ी पर कोई असर पड़े और  फिर एक बार देश में भगत सिंह , राजगुरु , सुखदेव , रानी लक्ष्मीबाई , दुर्गा भाभी जैसे क्रांतिकारी चेहरे दिखाई दें | 
         देश में हो रही इस नयी क्रांति के मिशन में शामिल होकर  मेरा तो वो बरसों पुराना सपना पूरा हो गया | और मुझे इस बात की भी पूरी उम्मीद है की असल में ये क्रांति ही देगी हमें असल आज़ादी |

                                       वंदे मातरम , वंदे मातरम , वंदे मातरम |
                                                      

Monday, August 15, 2011

वन्दे मातरम !

आज सिर्फ तस्वीरें ही बोलेंगी |  जय हिंद , जय भारत |

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जश्न - ए- आज़ादी 
स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें | जय हिंद जय भारत |

Sunday, August 14, 2011

भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान= एक ख़्वाब


        इस ब्लॉग को पढ़ने से पहले कृपया कोई देशभक्ति गाना पूरी तरह से डाउनलोड कर ले , यकीं मानिये ये ही आपको असल सोच देगा इस ब्लॉग को पढ़ने की |  ब्लॉग को पढ़ते वक़्त वो गीत साथ में सुने  | 
       This is my humble request .

                                   कहते है की प्रेम का धागा अगर टूट जाये तो लाख जोड़ने की कोशिश करो मगर फिर भी एक गांठ हमेशा रह ही जाती है , जो लाख कोशिश के बाद भी नहीं जाती |  लेकिन क्या हो अगर हम धागा ही बदल दें तो ?  हाँ सही समझा आपने मैंने कहा कि क्या हो अगर धागा ही बदल दें | और एक बार फिर एक नए और लोहे जैसे मज़बूत धागे में फिर से उन बिखरे हुए मोतियों को पिरो दें | थोडा अजीब तो लगा होगा आपको ये पढ़कर पर विश्वास रखिये ये हो सकता है | आप कर सकते हैं , हम कर सकते हैं , हम सब कर सकते हैं | 

                           14 अगस्त सन 1947 पाकिस्तान का नामकरण , 15 अगस्त 1947 भारत का नामकरण | एक खेल जो खेला था उन विदेशी ताक़तों ने जिन्होंने हम हम पर सैकड़ों साल राज किया और हमें तोड़ कर चले गए और आज तक मज़े से हमें लड़ते झगड़ते देख रहे हैं | सोचते होंगे 63-64 साल बाद आज भी देखो भिड़े पड़े हैं या तो वो हमसे ज्यादा समझदार हैं या फिर हम बहुत बड़े मूर्ख जो उनके इस खेल को 64 साल बाद भी समझ नहीं पाए | 
वो आज भी हमें नचाते है और हम कभी कश्मीर मुद्दे पर तो कभी परमाणु करार को लेकर नाचते हैं | एक कठपुतली की तरह | ये भूल कर की हममे इतनी ताकत है की हम कठपुतली की उस डोर को तोड़ भी सकते हैं | 

                             सन 1947 के उस विभाजन का दर्द क्या था ये हम और आप कभी समझ ही नहीं सकते हैं | क्यूंकि हम आज आपने परिवारों के साथ हैं | ये दर्द समझ सकते हैं सिर्फ वो लोग जिन्होंने ये झेला है | जिहोने इस बंटवारे में अपनों को खोया है | हमने तो ये सब सिर्फ किताबों में इतिहास की तरह पढ़ा और और भूल गए पर उनका क्या जो ये दर्द आज भी झेल रहे हैं | 
  दोष केवल विदेशी ताकतों का भी नहीं था | कुछ आपने ही गंदे ज़ेहन वाले लोगों ने भी आग में घी का काम किया | परिस्थितियां इस तरह की बना दी गयीं की ये चोट लगे | और फिर कह दिया गया की बंटवारे के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था | एक पल के लिए मान भी लिया जाये की माहौल बहुत बिगड़ गया था , पर क्या तब से अब तक इन 64 सालों में एक बार भी एसा मौका नहीं आया जब हम फिर से एक होने की कोशिश कर सकें |   लेकिन नहीं हमने की तो सिर्फ वार्ता , कभी सीमाओं को लेकर तो कभी आर्थिक मसलों को लेकर | पर नतीजा सिफ़र ही रहा |  कभी प्रेम का प्रतिक बसें चलीं तो कभी ट्रेने | पर इन बसों और ट्रेनों में प्रेम का ईंधन तो डाला ही नहीं गया |  सियासतदान अभी भी ये खेल खेल रहे हैं | दोनों ही लोकतान्त्रिक मुल्कों मे लोक यानि आम आदमी से तो कभी ये पूंछा ही नहीं गया की आखिर वो क्या चाहता है ? दोनों मुल्कों में किसी न किसी मुद्दे पर हर दो माह बाद चुनाव करा लिए जाते हैं | पर क्या इन 64  सालों में एक चुनाव भी एसा हुआ जिसमे आम इंसान से ये पूंछा गया हो की अब भारत और पाकिस्तान को एक बार फिर एक नहीं हो जाना चाहिए ? शायद नहीं | बाहरी लोग हमेशा इस ताक़ में रहते हैं की कब मौका मिले और हम इस सोच का फायदा उठायें | 

   
                       आने वाली 30 मार्च को मोहाली में भारत और पाकिस्तान का मैच है | ये तो तय है की कोई एक टीम तो हारेगी ही | पर हम किसी जीत के लिए कैसे खुश हो सकते हैं क्यूंकि असल में हम कहीं न कहीं हार भी तो रहे हैं |         एक बार सिर्फ एक बार सोचिये अगर वो बंटवारा न हुआ  तो क्या आज तस्वीर यही होती | नहीं बिलकुल नहीं , यक़ीनन नहीं |  हिन्दुस्तान की ही टीम में तब सचिन और अफरीदी  एक साथ ओपनिग करते और सामने होता कोई विदेशी मुल्क | एक मिनट के लिए अपनी आंखे बंद कीजिये और कल्पना कीजिये जो हिन्दुस्तानियों से भरा वो ग्राउंड ,  उस जोश की तीव्रता को आप आज इसी वक्त आपने दिल के रिक्टर पैमाने पर आंक सकते हैं | तब लाहौर या पेशावर जाने के लिए हमें और दिल्ली और लखनऊ जाने के लिए उन्हें किसी पासपोर्ट की ज़रुरत नहीं होती | वाघा बोर्डर पर हमारे बच्चे
क्रिकेट खेल रहे होते | सब कुछ बेहद खूबसूरत और खुशनुमा होता | चरों तरफ अमन , प्रेम और भाईचारा होता | 
  
     बहुत जी लिए हम अपने लिए आपने स्वार्थ के लिए , एक बार सिर्फ एक बार क्यूँ न हम जी लें आपने मुल्क आपने वतन के लिए | शहीदों ने अपनी जान मुल्क को विदेशियों से आज़ादी दिलाने के लिए दी थी ना कि अपनों से | 


      सन 1857 में एक क्रांति का बिगुल फूंका गया था  ताकि देश को विदेशी ताकतों से मुक्ति मिल सके 
  आज 26 मार्च सन 2011 में क्यूँ ना एक बार फिर बिगुल फूंका जाये , पर इस बार किसी को भागने के लिए नहीं बल्कि बिछड़ों को  मिलाने  के लिए , अपनो से मिलने के लिए  और एक बार फिर   भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान= एक ख़्वाब  को फिर से जीने के लिए और उसे हकीक़त में तब्दील करने के लिए | तो क्या आप तैयार हैं इस मिशन में शामिल होने के लिए | अगर हाँ तो ब्लॉग जगत से जुड़े हर हिन्दुस्तानी [ भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान ] के ब्लॉग पर ये सन्देश पहुँचाना चाहिए कि अब हम एक हैं |  1857  में भी इंक़लाब कलम ही लाया था और आज भी अमन कलम ही लायेगा | इस सोच को इतना फैलाइए कि आखिर दोनों मुल्कों में गूँज ही उठे ---------------


 MISSION REMOVE THE PARTITION '  
  

Thursday, August 11, 2011

महान वैज्ञानिक का जन्मोत्सव |



भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डा. विक्रम अंबालाल साराभाई ने भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र 

में अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर पहुँचाया। उन्होंने अन्य क्षेत्रों में भी समान रूप से पुरोगामी योगदान दिया: वे 

अंत तक वस्त्र, औषधीय, परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य क्षेत्रों में लगातार काम करते रहे।

डॉ. साराभाई एक रचनात्मक वैज्ञानिक, एक सफल और भविष्यदृष्टा उद्योगपति, सर्वोच्च स्तर के प्रर्वतक, 

एक महान संस्थान निर्माता, एक भिन्न प्रकार के शिक्षाविद्, कला के पारखी, सामाजिक परिवर्तन के 

उद्यमी, एक अग्रणी प्रबंधन शिक्षक तथा और बहुत कुछ थे।

डॉ. विक्रम साराभाई का जन्म पश्चिमी भारत में गुजरात राज्य के अहमदाबाद शहर में 12 अगस्त 1919 

को हुआ था। साराभाई परिवार एक महत्वपूर्ण और संपन्न जैन व्यापारी परिवार था। उनके पिता अंबालाल 


साराभाई एक संपन्न उद्योगपति थे तथा गुजरात में कई मिलों के स्वामी थे। विक्रम साराभाई, अंबालाल 

और सरला देवी के आठ बच्चों में से एक थे।


इंटरमीडिएट विज्ञान की परीक्षा पास करने के बाद वे इंग्लैंड चले गए और केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सेंट 

जॉन कॉलेज में भर्ती हुए। उन्होंने केम्ब्रिज से 1940 में प्राकृतिक विज्ञान में ट्राइपॉस हासिल किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बढ़ने के साथ, साराभाई भारत लौटे और बेंगलौर के भारतीय विज्ञान संस्थान में भर्ती 

हुए तथा नोबेल पुरस्कार विजेता, सर सी. वी. रामन के मार्गदर्शन में ब्रह्मांडीय किरणों में अनुसंधान शुरू

 किया।


युद्ध के बाद 1945 में वे केम्ब्रिज लौटे और 1947 में उन्हें उष्णकटिबंधीय अक्षांश में कॉस्मिक किरणों की 

खोज शीर्षक वाले अपने शोध पर पी.एच.डी की डिग्री से सम्मानित किया गया।

30 दिसंबर,1971 को कोवलम, तिरुवनंतपुरम, केरल में डॉ. विक्रम साराभाई का निधन हो गया।

पुरस्कार

शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार (1962)
पद्मभूषण (1966)
पद्म विभूषण, मरणोपरांत (1972)


महत्वपूर्ण पद

भौतिक-विज्ञान अनुभाग, भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष (1962)
आई.ए.ई.ए., वेरिना के महा सम्मलेनाध्यक्ष (1970)
उपाध्यक्ष, 'परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग' पर चौथा संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1971)

सम्मान
रॉकेटों के लिए ठोस और द्रव नोदकों में विशेषज्ञता रखने वाले अनुसंधान संस्थान, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष 

केंद्र (वीएसएससी) का नामकरण उनकी स्मृति में किया गया, जो केरल राज्य की राजधानी तिरूवनंतपुरम 

में स्थित है।

1974 में, सिडनी में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने निर्णय लिया कि सी ऑफ़ सेरिनिटी में स्थित चंद्रमा क्रेटर 

बेसेल (बीईएसएसईएल) डॉ. साराभाई क्रेटर के रूप में जाना जाएगा।

Tuesday, August 9, 2011

इतिहास एक याद [काकोरी कांड]












1924 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' चंद युवा क्रांतिकारियों द्वारा बनाया गया एक ऐसा संगठन जो 

संगठित सशस्त्र क्रांति पर विश्वास रखता था | 9 अगस्त सन 1925 को इस संगठन ने उत्तर रेलवे के 

लखनऊ सहारनपुर संभाग के काकोरी नाम के स्टेशन पर 8 डाउन ट्रेन पर डकैती डाल कर सरकारी खजाने 

को लूटा |

यही घटना इतिहास में काकोरी कांड कहलाई| इस पूरे मामले में कुल 29 लोगों की गिरफ़्तारी हुई| जिनमे से 

राम प्रसाद बिस्मिल , राजेंद्र लाहिड़ी , रोशन सिंह और अशफाकुल्ला खां को दिसंबर 1927 में फांसी हुई | 

शचीन्द्रनाथ सान्याल को आजीवन कारावास की सजा हुई | मन्मथ नाथ गुप्ता को 14 साल की सजा हुई | 

कई और क्रांतिकारियों को भी लंबी सजाए हुई |इस कांड में चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे पर वो अंग्रेजों के 


हाँथ नहीं आये | बाद में लाहौर केस में भी वो अपनी चतुराई से बच निकले , लेकिन 27 फरवरी सन 1931 

को इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में पुलिस से हुई मुटभेड में वो शहीद हो गए | इतिहास में युवा क्रांतिकारियों 

का ये अध्याय आज भी युवाओं की पहली पसंद है | आज भी ना जाने कितनी फिल्मों में इस क्रांति को बेहद 

ही खूबसूरती से दिखाया जाता है |

हम भारतीय है और हमारा ये फ़र्ज़ है की आज हम सब उन शहीदों को एक श्रधांजलि दें , और याद करें उनके 


बलिदान | और दुनिया को ये विश्वास दिला दें की क्रांतिकारी आज भी पैदा होते हैं | 









राम प्रसाद बिस्मिल 



सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।

रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।

यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

है लिये हथियार दुश्मन ताक मे बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिनमें हो जुनून कटते नही तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला सा हमारे दिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न
जान हथेली में लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल मैं है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

दिल मे तूफानों की टोली और नसों में इन्कलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमे रोको न आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल मे है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

--राम प्रसाद बिसमिल





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