Monday, July 25, 2011

इनका क्या दोष ?

                                           कहते हैं कि प्रेम ही इस धरती पर मानव उत्पत्ति का कारण है | फिर किसी अबोध की उत्पत्ति पाप कैसे हो सकती है ? क्यूंकि यक़ीनन प्रेम पाप तो नहीं ही  है |  पर ऐसा होता है | कम से कम हमारे देश में तो होता ही ही | क्यूँ आखिर जिस रफ़्तार से हमारे देश में अनाथ आश्रम बढ़ रहे हैं , वो कहीं न कहीं समर्थन तो इसी बात का कर रहे हैं |  और अगर हम कुछ देर के लिए या मान भी लें कि ये पाप है तो जिसने वो पाप किया सजा उसको मिलनी चाहिए, पर नहीं हम सजा देते हैं उस नन्ही सी जान को जो न चाहते हुए भी इस पाप का भागीदार बन जाता है | 

                   एक ऐसा ही किस्सा मैं आज आपको बताने जा रही हूँ | अपने शहर कानपुर में ही पत्रकारिता की पढाई के दौरान एक बार मेरे ग्रुप और मेरे टीचर्स ने ये सोचा कि हम बाल दिवस किसी खास अंदाज़ में मनाएंगे | तो हमने फैसला किया की हम इसे अनाथ आश्रम में मनाएंगे | हमारे शहर में मदर टेरेसा के नाम का एक अनाथ आश्रम है | इस आश्रम मे बहुत छोटे यानि नवजात बच्चों को रखा जाता है | हम सब बहुत ख़ुशी ख़ुशी  वहां पहुंचे | लेकिन वहां का दृश्य देखकर मैं अन्दर तक हिल गयी | मासूम गोद के बच्चे झूलों में लेटे थे |  हालाँकि जो तस्वीर आपको सामने दिख रही है वो वहां की तो नहीं है , पर वहां का दृश्य लगभग ऐसा ही था |

                                 इतने मासूम और प्यारे बच्चे जिन्हें देखकर अपने मन में किसी भी तरह का पाप लाना भी एक बहुत बड़ा पाप ही होगा | बहुत बुरा लगा देखकर, कोई कैसे अपने हिस्से को अपने से अलग कर सकता है | अनाथ आश्रम का वो दृश्य मुझे कई रातों तक सपनो में दिखा | ऐसा लगता था मानो वो बच्चे मुझे बुला रहे हों | मेरी ज़िन्दगी में ये कोई पहला वाकया नहीं था , इससे पहले भी दो बार मैंने कुछ ऐसा ही सुना भी था |
         
                                 मेरे एक रिश्तेदार एक अस्पताल में भर्ती थे, उन्ही के बगल के एक जनरल वार्ड मे कोई महिला पैदा होते ही अपने बच्चे को वहीँ छोड़ कर चली गयी | जनवरी की भीषण सर्दी के दिन थे वो, वो मासूम ठण्ड से कांप रही थी, कुछ देर बाद अस्पताल वालों ने उसे दूध दिया और एक कम्बल में लपेट कर सुला दिया  | मै तो उस वक्त अस्पताल में नहीं थी , पर घर आकर वो पूरा किस्सा मेरी माँ ने मुझे बताया |  बहुत अजीब लगा सुन कर | मैंने माँ से कहा की क्या हम उस बच्चे को गोद नहीं ले सकते, पर माँ ने माना कर दिया उस दिन मेरी मौसी भी घर आयीं थी | बहुत मनाने और पूरी रात जागने के बाद आखिर मेरी मौसी उसे गोद लेने को तैयार हो गयीं |
                मेरी माँ और मौसी अगले दिन अस्पताल पहुंचे पर हमारे पहुँचने से पहले ही कोई और उस बच्ची को गोद लेकर चला गया था | घर आकर मम्मी ने मुझे ये सब बताया | ख़ुशी हुई की कम से कम अब वो बच्ची अनाथ तो नहीं कहलाएगी |

केवल इतना ही नहीं एक बार अखबार में मैंने एक मासूम बच्ची के रेलवे ट्रेक पर पड़े होने की खबर पढ़ी | उस रिपोर्टर से व्यतिगत रूप से मिल कर पूरी बात जानने की कोशिश  की | जिस वक्त उस बच्ची को उस रिपोर्टर ने देखा  बच्ची की जबान एक जानवर के मूंह मे थी | आसपास खड़े लोग सिर्फ तमाशा देख रहे थे |  और उस बच्ची को मारा हुआ समझ कर उसे नुचते हुए देख रहे थे | उस जानवर को हटाने के बाद जब देखा गया तो वो बच्ची जिंदा थी | उसे किसी तरह उसी वक्त अनाथ आश्रम पहुंचा दिया गया | आज वो बच्ची लगभग 5 -6 साल की होगी और पूरी तरह से स्वस्थ है और एक अच्छे परिवार की सदस्य भी है |

                           
                    लेकिन यक़ीनन हर अनाथ बच्चे की किस्मत इन दोनों बच्चों जैसी नहीं होती | आज भी हमारे देश में कई ऐसे अनाथ आश्रम हैं जहाँ इन बच्चो की अच्छी परवरिश होती है | पर यक़ीनन माँ बाप जैसा प्यार तो उन्हें नहीं मिल पाता होगा | समझ नहीं आया की आखिर क्यूँ और कैसे कोई इन्हें अपने से अलग कर सकता है | अरे एक जानवर के बच्चे को  भी देखकर हम उससे प्यार करने लगते है तो कोई कैसे नौ महीने तक एक नन्ही सी जान को अपने अन्दर रखने के बाद इस तरह सड़क पर मरने के लिए छोड़ सकता है  |
 कुछ लोगों का कहना है की परिस्थितियाँ ही ऐसी बन जातीं है जो उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर देती हैं , पर मै नहीं मानती , क्या आपके चोट लगने पर और उसके ज़ख्म बनने पर भी क्या आप खुद अपने उस हिस्से को काट सकते हैं  यक़ीनन नहीं | तो फिर ये क्यूँ |

                              सोचने का विषय है , एक बार फिर नए सिरे से सोचिये , शायद सोच बदल जाये, और अगर फिर भी सोच न बदले तो एक बार किसी अनाथ आश्रम चले जाइये, सोच यक़ीनन  बदल जाएगी |


                                           
                                                   बच्चे तो बच्चे हैं फिर क्या पाप क्या पुण्य |

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