Thursday, June 23, 2011

मजबूरी , ख़ुशी या ज़बरदस्ती !!

                                            कभी - कभी  पोस्ट का टाइटल देखकर ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है की आखिर पोस्ट है किस विषय पर | लेकिन आज मैं जिस विषय पर पोस्ट लिखने जा रही हूँ वो कहीं न कहीं समाज द्वारा स्वीकृत मुद्दा नहीं है | हमारे समाज का एक ऐसा हिस्सा जिसे आज भी बहुत अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता है | जी हाँ मैं बात कर रही हूँ prostitution यानि 'वेश्यावृत्ति' की |  थोडा संवेदनशील मुद्दा है पर यक़ीनन है तो हमारे ही समाज का हिस्सा |  



                                     पिछले कई दिनों से मै देख रही हूँ की वर्तमान में बलात्कार और और प्रेम विवाह में असफल होने पर आत्महत्या के मामले कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं | कहीं वेश्यावृति जैसी समस्या के पीछे ऐसा ही तो कोई कारण नहीं है ? हो भी सकता है और नहीं भी | 
                     अगर आंकड़ों की बात करे तो यूनिसेफ के मुताबिक हमारे देश में तकरीबन 9 लाख sex workers है  जिनमे से 30% बच्चे हैं | इन आंकड़ों में प्रतिवर्ष 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि भी दर्ज की जा रही है | मुंबई, दिल्ली , मद्रास . हैदराबाद, कोलकाता और बंगलोर केवल इन्ही 6 शहरों में ही कुल आंकड़ों का तकरीबन 15 प्रतिशत भाग देखा गया है | जिसमे से लगभग 30 प्रतिशत की आयु 20 साल से भी कम हैं |
 बात अगर कारणों की करे तो तीन सबसे महत्वपूर्ण कारण  सामने आये :-

{1 }- अशिक्षा   
{2 }- आर्थिक विपन्नता  
{3}- गलत संगत
                              पहले दो कारण तो जग ज़ाहिर हैं , पर वर्तमान समय मे इस समस्या का सबसे तेजी से उभरता कारण तीसरा कारण ही है | जहाँ मासूम बच्चियां सिर्फ गलत संगत में पड़ कर अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर बैठती हैं | वेश्यावृत्ति की ये समस्या आज से नहीं है , देवदासियों के नाम पर हमारी भारतीय संस्कृति मे ये कुप्रथा बहुत ही पुरानी है | जो कहीं न कहीं आज भी दक्षिण भारत में जिंदा है | 
                                                     समस्या गंभीर है और इसका निवारण भी ज़रूरी है | हालाँकि कई स्वयं सेवी  संस्थाए इस दिशा में काम कर रही हैं , पर क्या कभी किसी ने ये सोचा  है की इस पीढ़ी तक तो ठीक है पर इन prostitutes की अगली पीढ़ी का क्या होगा , उनका भविष्य का क्या होगा ?  मजबूरी , ख़ुशी या ज़बरदस्ती किसी भी कारण से ही सही अगर अगली पीढ़ी को भी ये पेशा अपनाना पड़ा तब क्या होगा | समस्या तो कहीं न कहीं वहीँ पर ही रह गयी | 
                       हालाँकि कुछ पश्चिमी सभ्यता को मानने वाले लोग इसे भी एक व्यवसाय ही मानते हैं, उनका मानना है की आखिर वो भी तो उनका करियर ही है |  पर मै ये बिलकुल नहीं मानती | मेरे हिसाब से  करियर सिर्फ वो ही होता है की जो आपका विकास करे न की आपको पतन की ओर ले जाये | 
                                            बेहेतर यही है की इस समस्या का जल्द ही कोई उपाय निकला जाये ताकि आगे आने वाली पीढ़ी  मजबूरी , ख़ुशी या ज़बरदस्ती किसी भी वजह से इस दलदल मे न फसें |       

   

5 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

"हालाँकि कुछ पश्चिमी सभ्यता को मानने वाले लोग इसे भी एक व्यवसाय ही मानते हैं, उनका मानना है की आखिर वो भी तो उनका करियर ही है | पर मै ये बिलकुल नहीं मानती | मेरे हिसाब से करियर सिर्फ वो ही होता है की जो आपका विकास करे न की आपको पतन की ओर ले जाये | "

आखीर की इन पंक्तियों में आपने बिलकुल सच कहा है.

सोचने को मजबूर करता है आपका यह प्रभावी आलेख.

सादर

Vijai Mathur said...

समस्या वाजिब उठायी है और इसका निदान भी शीघ्र ही किये जाने की आवश्यकता है.समाज का दृष्टिकोण,अंध-धार्मिक मान्यताएं आदि जो भी विकृत कारन समस्या के मूल में हैं उनका सम्पूर्ण निराकरण परमावश्यक एवं अनिवार्य है.

सुबीर रावत said...

एक सार्थक व विचारोत्तेजक आलेख. समस्या अनेक है कृति जी, और निदान भी हमें ही ढूंढना होगा. ..... यह सच है कि विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में हम पश्चिमी देशों का अन्धानुकरण कर रहे हैं किन्तु सांस्कृतिक स्तर पर हम उन्हें अछूत समझते हैं. यह पहलू भी विचारणीय है. ...... आभार.

Vijai Mathur said...

कृति जी सर्व-प्रथम तो आपको आज ३० जून जन्म-दिवस की हार्दिक मुबारकवाद.आपके उज्जवल एवं समृद्ध भविष्य की हम सदैव कामना करते हैं.आप निरंतर प्रगति के सोपान चढती जाएँ यही हमारी इच्छा है.
आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद.दरअसल आप ही की इच्छा के मुताबिक यह लेख लिखा था जो रुक गया था,इसे ही अपने जन्म दिन का उपहार समझ लें.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

संवेदनशील विषय ... इस प्रथा का इतिहास इतना पुराना है की अंत होना असम्भव सा लगता है ...

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