Sunday, June 12, 2011

तो ये हक़ भी हमें दो !!

                                      हमारा देश एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था वाला देश है | एक ऐसी व्यवस्था जहाँ जनता के वो प्रतिनिधि जिन्हें हम नेता कहते है जनता के द्वारा ही चुने जाते हैं | हर बार हम चुनावों के दौरान अपने पसंदीदा नेता को वोट देकर एक ज़िम्मेदार पद पर आसीन करते हैं , इस आशा में की इस बार ये नेता हमारी तकलीफ और दर्द समझेगा और उसका निदान करेगा | पर क्या हर बार ऐसा होता है ?   शायद नहीं | हर बार हम वोट देने के चन्द दिनों बाद ही पछताने लगते हैं | ये सोच कर की शायद हमारा वोट इस बार भी बेकार हो गया | हम इस बार भी सही उम्मीदवार का चुनाव करने मे चूक गए | पर अब क्या हो सकता है !!
    
                                                         हो सकता है यकीं मानिये बिलकुल हो सकता है | सिर्फ एक कदम और फिर एक ही झटके में इस देश से भ्रष्टाचार न गायब हो जाये तो कहियेगा | हालाँकि कदम थोडा कठिन है पर यदि देश में फ़ैल रही गन्दगी की  वाकई में सफाई करनी है तो इस तरह के ठोस कदम तो उठाने ही पड़ेंगे | 

                                           
                              एक उदाहरण से समझाती हूँ शायद ज्यादा सटीक समझा सकूं , जिस तरह कोई सामान बाज़ार से लेने के बाद अगर वो ख़राब निकल जाये तो हमारा ये हक़ है कि हम वो सामान उस दुकानदार को वापस करके या तो नया सामान ले लें या फिर हमारे पैसे वापस ले लें | क्यूंकि एक लोकतान्त्रिक देश में एक उपभोक्ता को ये हक़ दिया गया है |  मगर मेरी आज तक समझ मे नहीं आया कि ये कैसी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है जहाँ हम 100 रुपये का सामान तो बदल सकते हैं पर करोड़ों का नेता नहीं | 

                                             हमारा संविधान हमें बहुत से अधिकार देता है क्या इस संविधान में एक अधिकार ऐसा भी नहीं होना चाहिए जहाँ हम हमारा नेता बदल सकें  या उससे भी बहेतर हम अपना वोट वापस मांग सकें |  क्यूंकि अगर हमें वोट देने का हक़ है तो यक़ीनन वोट वापस लेने का हक़ भी होना चाहिए |
                                               
                                           सिर्फ ये एक कदम इस देश के बहुत से भ्रष्ट नेताओं के पसीने छुड़ाने के लिए काफी है | क्यूंकि इसके बाद तो सारा काम जनता ही कर लेगी , किसी भी बाबा या समाज सेवक को कोई आमरण अनशन कि ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी | क्यूंकि तब नेताओं की डोर एक वास्तविक लोकतान्त्रिक देश कि तरह जनता के हाँथ में होगी | नतीजा तब नेता कुछ भी गलत करने से पहले 100 बार सोचेगा  की कहीं उसकी एक छोटी सी गलती उसे अगले ही दिन ग्राउंड से बाहर न कर दे |  और  यकीन मानिये  वोट वापसी का ये अधिकार एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक व्यवस्था की नीव रखने में एक बहुत ही मज़बूत कदम के रूप मे सामने आयेगा | 
                                                                      

7 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

पूर्णतः सहमत हूँ आपकी बात से.


सादर

मदन शर्मा said...

आपकी बातों से सहमत ! काश आप की बातें सत्य सिद्ध हों किन्तु ये नकारा तानाशाह सरकार क्या ऐसा होने देगी ?

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

मुझे नहीं लगता कि कोई भी पार्टी, ये हक हमें दे देगी।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके ब्लॉग की किसी पोस्ट की कल होगी हलचल...
नयी-पुरानी हलचल

धन्यवाद!

Vijai Mathur said...

जय प्रकाश नारायण द्वारा उठाये मुद्दे को पुनर्जीवित करके आपने अच्छा किया है.प्रतिनिधियों को वापिस बुलाने का अधिकार संविधान में अवश्य ही शामिल कराया जाना चाहिए ,परन्तु इसके लिए भी सशक्त आंदोलन चलाना पडेगा.

सुबीर रावत said...

दिल को बहलाने को ग़ालिब यह ख़याल भी अच्छा है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अन्ना हजारे भी इस बात को सामने ला रहे हैं ..यदि यह अधिकार मिल जाए तो सच ही नेता कुछ भी करने से पहले सौ बार सोचेगा ... काश ऐसा हो सकता

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