Thursday, June 30, 2011

जीवन के 29 बसंत !

                                        

                                         आज मेरा जन्मदिन है | आज ही के दिन वर्ष 1982 में सुबह ठीक 11:30 बजे मैं इस धरती पर आई थी | अपने माता पिता की पहली संतान होने के कारण उनकी बहुत लाडली रही हूँ | उस पर भी मम्मी पापा की शादी के 11 साल बाद मैं हुयी तो सबका प्यार और बढ़ गया | एक संयुक्त परिवार में मेरा जन्म हुआ , दादी, ताउजी, ताईजी, उनके २ बेटे, चाचा , चाची उनका एक बेटा , बुआ फूफाजी और उनका भी एक बेटा और मेरा रियल भाई जो मुझसे 3 साल छोटा है और कंप्यूटर इंजिनिअर है | ये है मेरा परिवार | इतने सारे भाइयों में में अकेली बहन | दादी और ताउजी तो अब इस दुनिया मे नहीं हैं पर बाकि पूरा परिवार आज भी साथ ही रहता है | बहुत अच्छा लगता है की आज भी हमारा परिवार संयुक्त परिवार की प्रथा पर ही चल रहा है |
                                                        आज मैंने सोचा की क्यूँ न अपने इस नए ब्लॉग परिवार के साथ अपनी ज़िन्दगी बाटूँ | अपनी शुरूआती ज़िन्दगी मे बहुत ही सामान्य छात्रा हुआ करती थी | डांट भी पड़ती थी घर पर भी और टीचर की भी |पर मुझे दोस्त बनाने का शौक हमेशा से रहा है, जो आज भी बदस्तूर जारी है |

                                                     वक्त के साथ  धीरे धीरे  मैं पढाई में काफी रूचि लेने लगी |  2004 मे अपने पोस्ट ग्रेजुएशन के दौरान कॉलेज मे सबसे ज्यादा मार्क्स लाकर मैंने मनोविज्ञान में टॉप किया | और तब शुरू हुयी मेरी असली जंग | क्यूंकि अब शुरू होना था मेरा करियर | हालाँकि इसे लेकर मेरे मन मे कभी कोई दुविधा नहीं रही | मेरे लक्ष्य हमेशा क्लीयर था | बस उस तक पहुँचाने का रास्ता समझ नहीं आ रहा था |  साल 2003 में मैंने देश की सबसे बड़ी परीक्षा I .A .S . देने का निश्चय किया क्यूंकि यही वो रास्ता था जो मुझे मेरे लक्ष्य तक पहुंचा सकता था | एक साल की कठिन मेहनत के बाद मैंने 2004 की  I .A .S . की परीक्षा दी | पर इतनी मेहनत के बाद भी मुझे सफलता नहीं मिली |उस रात शायद  मैं अपनी ज़िन्दगी में सबसे ज्यादा रोई | निराशा तो बहुत हुयी , पर बचपन से लेकर आज तक कभी हार मानना तो सीखा ही नहीं था , तो फिर ठाना की अगला प्रयास फिर दूँगी , पर इस बार भी निराशा ही हाँथ लगी | इतना ही नहीं फिर कोशिश करके तीसरा प्रयास भी दिया पर फिर निराशा ही मिली | सच कहूं तो उस दौरान में पूरी तरह से अवसाद यानि डिप्रेशन मे चली गयी थी | पर फिर भी न जाने कौन सी ताकत मुझमे हर बार जोश भर देती थी |
                                         
                                                       साल 2008 तक आते आते मैंने तकरीबन 12 परीक्षाएं दीं पर किसी एक में भी सफलता नहीं मिली | अब तक तक तो लोगों के व्यंग भी शुरू हो गए थे , लड़की है कब तक पढ़ोगे आगे भी तो सोचना है, वगैरह वगैरह | पर शायद इस वक्त मेरे परिवार ने मेरा बहुत साथ दिया दुनिया की परवाह न करते हुए एक रात  मेरे पापा मेरे पास आये और पूछा - आगे क्या सोचा है ? एक पल के लिए तो मैं डर गयी की कहीं पापा ने समाज के आगे घुटने तो नहीं टेक दिए | पर अगले ही पल पापा के शब्दों ने ये एहेसास करा दिया की नहीं मेरा परिवार वाकई में सबसे अलग है | पापा ने साफ़ साफ़ कहा की जब तक तुम नहीं चाहोगी हम तुमसे शादी के बारे में कोई बात नहीं करेंगे, कुछ और करना चाहती हो तो बताओ , मैं अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता हूँ | मैंने पापा से कुछ वक्त माँगा |

                                                          मुझे अभी भी याद है की वो रात मेरी ज़िन्दगी की सबसे अजीब रात थी , समझ ही नहीं आ रहा था की ऊपर वाले का शुक्रिया करूं इस परिवार के लिए , या उससे नाराज़ हो जाऊं अब तक इतनी निराशा देने के लिए | मैं उस रात भी बहुत रोई , क्यूंकि कुछ समझ नहीं आ रहा था | पर हर बार की ही तरह इस बार भी किसी अंजान शक्ति ने मेरी मदद की | सुबह होते ही मैंने पापा से कहा की मुझे जर्नलिज्म करना है | मेरा सिर्फ इतना सोचना था की मेरी अब तक की पढाई बेकार भी न जाये और मैं अपनी असल मंजिल तक पहुच भी जाऊं | पापा ने भी हाँ कर दी | और मैंने अपने ही शहर के एक बहुत ही अच्छे संस्थान में दाखिला ले लिया | अपनी इस पढाई के दौरान मुझे यकीं हो गया  की अब मुझे मेरी मंजिल मिल ही जाएगी, इस संस्थान की टॉपर बनने के साथ ही  इस दौरान बहुत अच्छे और रसूक वाले लोगों से मुलाकात भी  हुयी | इसी दौरान मैंने राष्ट्रीय सहारा अखबार और लखनऊ दूरदर्शन में ट्रेनिग भी की | क्यूँ की मुझे कोई पत्रकार नहीं बनना था इसलिए मैंने शहर के ही कुछ लोकल चंनेल्स में एज मेनेजिंग एडिटर काम किया | पर मुझे यहाँ का माहौल रास नहीं आया | सही मुझे करने नहीं दिया गया और गलत मैं कर नहीं सकी | लिहाज़ा एक दिन बहुत उदास और क्रोधित मन से मैंने इस दिशा से भी नमस्कार कर लिया |
                                               

                                           जीवन मे एक बार फिर अवसाद यानि डिप्रेशन का दौर आया | 2003  से 2010 तक इतनी मेहनत के बाद भी मेरे हाँथ मे कुछ नहीं था | मैंने लोगों से मिलना बंद कर दिया, कही नहीं जाती थी | एक बार तो मन मे आया की अपनी ज़िन्दगी ही खत्म कर दूं , आखिर मेरी वजह से मेरे माता पिता क्यूँ समाज के ताने झेलें | पर फिर किसी अंजान ताकत ने मुझे रोका | नहीं जानती वो कौन है | पर एक रात अचानक नेट पर ब्लोगर के बारे में पता चला , हालाँकि इससे पहले भी मैं इसके बारे मैं अपने टीचर से सुन चुकी थी | ऐसा लगा मानो फिर मुझे एक नया रास्ता मिल गया | बहुत सारे गुरू ,दोस्त मुझे यहाँ मिले | वो दोस्त जिन्हें में जानती नहीं थी पर फिर भी वो अपने थे | लिखने का शौक शुरू से ही रहा था तो वो यहाँ काम आया | हालाँकि अब परिवार से भी शादी का दबाव बढ़ने लगा है, तो मैंने भी पापा के सामने हामी भर दी | आज मेरे मम्मी पापा मेरे लिए रिश्ता ढूंढकर अपना काम कर रहे हैं और मैं ब्लॉग लिखकर अपना काम कर रही हूँ |  

                                                         

                                              आज मैं लिखती हूँ और खुश हूँ | हालाँकि मेरा सपना  अभी तक पूरा नहीं हुआ है, पर मैं जानती हूँ की वो अनजान ताकत आज नहीं तो कल मेरे सपनों को पूरा करने में मेरी मदद ज़रूर करेगी और अब तो बहुत सारे नए गुरुजनों और दोस्तों की दुआएं भी मेरी ज़िन्दगी में शामिल हो चुकी हैं | मुझे पूरा यकीं है की मेरे सपना ज़रूर पूरा होगा |
                                 
                          आप सबकी दुआओं और आशीर्वाद के इंतज़ार में |
                                                                                                                                         


                                                                नमस्कार |

Thursday, June 23, 2011

मजबूरी , ख़ुशी या ज़बरदस्ती !!

                                            कभी - कभी  पोस्ट का टाइटल देखकर ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है की आखिर पोस्ट है किस विषय पर | लेकिन आज मैं जिस विषय पर पोस्ट लिखने जा रही हूँ वो कहीं न कहीं समाज द्वारा स्वीकृत मुद्दा नहीं है | हमारे समाज का एक ऐसा हिस्सा जिसे आज भी बहुत अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता है | जी हाँ मैं बात कर रही हूँ prostitution यानि 'वेश्यावृत्ति' की |  थोडा संवेदनशील मुद्दा है पर यक़ीनन है तो हमारे ही समाज का हिस्सा |  



                                     पिछले कई दिनों से मै देख रही हूँ की वर्तमान में बलात्कार और और प्रेम विवाह में असफल होने पर आत्महत्या के मामले कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं | कहीं वेश्यावृति जैसी समस्या के पीछे ऐसा ही तो कोई कारण नहीं है ? हो भी सकता है और नहीं भी | 
                     अगर आंकड़ों की बात करे तो यूनिसेफ के मुताबिक हमारे देश में तकरीबन 9 लाख sex workers है  जिनमे से 30% बच्चे हैं | इन आंकड़ों में प्रतिवर्ष 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि भी दर्ज की जा रही है | मुंबई, दिल्ली , मद्रास . हैदराबाद, कोलकाता और बंगलोर केवल इन्ही 6 शहरों में ही कुल आंकड़ों का तकरीबन 15 प्रतिशत भाग देखा गया है | जिसमे से लगभग 30 प्रतिशत की आयु 20 साल से भी कम हैं |
 बात अगर कारणों की करे तो तीन सबसे महत्वपूर्ण कारण  सामने आये :-

{1 }- अशिक्षा   
{2 }- आर्थिक विपन्नता  
{3}- गलत संगत
                              पहले दो कारण तो जग ज़ाहिर हैं , पर वर्तमान समय मे इस समस्या का सबसे तेजी से उभरता कारण तीसरा कारण ही है | जहाँ मासूम बच्चियां सिर्फ गलत संगत में पड़ कर अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर बैठती हैं | वेश्यावृत्ति की ये समस्या आज से नहीं है , देवदासियों के नाम पर हमारी भारतीय संस्कृति मे ये कुप्रथा बहुत ही पुरानी है | जो कहीं न कहीं आज भी दक्षिण भारत में जिंदा है | 
                                                     समस्या गंभीर है और इसका निवारण भी ज़रूरी है | हालाँकि कई स्वयं सेवी  संस्थाए इस दिशा में काम कर रही हैं , पर क्या कभी किसी ने ये सोचा  है की इस पीढ़ी तक तो ठीक है पर इन prostitutes की अगली पीढ़ी का क्या होगा , उनका भविष्य का क्या होगा ?  मजबूरी , ख़ुशी या ज़बरदस्ती किसी भी कारण से ही सही अगर अगली पीढ़ी को भी ये पेशा अपनाना पड़ा तब क्या होगा | समस्या तो कहीं न कहीं वहीँ पर ही रह गयी | 
                       हालाँकि कुछ पश्चिमी सभ्यता को मानने वाले लोग इसे भी एक व्यवसाय ही मानते हैं, उनका मानना है की आखिर वो भी तो उनका करियर ही है |  पर मै ये बिलकुल नहीं मानती | मेरे हिसाब से  करियर सिर्फ वो ही होता है की जो आपका विकास करे न की आपको पतन की ओर ले जाये | 
                                            बेहेतर यही है की इस समस्या का जल्द ही कोई उपाय निकला जाये ताकि आगे आने वाली पीढ़ी  मजबूरी , ख़ुशी या ज़बरदस्ती किसी भी वजह से इस दलदल मे न फसें |       

   

Sunday, June 12, 2011

तो ये हक़ भी हमें दो !!

                                      हमारा देश एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था वाला देश है | एक ऐसी व्यवस्था जहाँ जनता के वो प्रतिनिधि जिन्हें हम नेता कहते है जनता के द्वारा ही चुने जाते हैं | हर बार हम चुनावों के दौरान अपने पसंदीदा नेता को वोट देकर एक ज़िम्मेदार पद पर आसीन करते हैं , इस आशा में की इस बार ये नेता हमारी तकलीफ और दर्द समझेगा और उसका निदान करेगा | पर क्या हर बार ऐसा होता है ?   शायद नहीं | हर बार हम वोट देने के चन्द दिनों बाद ही पछताने लगते हैं | ये सोच कर की शायद हमारा वोट इस बार भी बेकार हो गया | हम इस बार भी सही उम्मीदवार का चुनाव करने मे चूक गए | पर अब क्या हो सकता है !!
    
                                                         हो सकता है यकीं मानिये बिलकुल हो सकता है | सिर्फ एक कदम और फिर एक ही झटके में इस देश से भ्रष्टाचार न गायब हो जाये तो कहियेगा | हालाँकि कदम थोडा कठिन है पर यदि देश में फ़ैल रही गन्दगी की  वाकई में सफाई करनी है तो इस तरह के ठोस कदम तो उठाने ही पड़ेंगे | 

                                           
                              एक उदाहरण से समझाती हूँ शायद ज्यादा सटीक समझा सकूं , जिस तरह कोई सामान बाज़ार से लेने के बाद अगर वो ख़राब निकल जाये तो हमारा ये हक़ है कि हम वो सामान उस दुकानदार को वापस करके या तो नया सामान ले लें या फिर हमारे पैसे वापस ले लें | क्यूंकि एक लोकतान्त्रिक देश में एक उपभोक्ता को ये हक़ दिया गया है |  मगर मेरी आज तक समझ मे नहीं आया कि ये कैसी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है जहाँ हम 100 रुपये का सामान तो बदल सकते हैं पर करोड़ों का नेता नहीं | 

                                             हमारा संविधान हमें बहुत से अधिकार देता है क्या इस संविधान में एक अधिकार ऐसा भी नहीं होना चाहिए जहाँ हम हमारा नेता बदल सकें  या उससे भी बहेतर हम अपना वोट वापस मांग सकें |  क्यूंकि अगर हमें वोट देने का हक़ है तो यक़ीनन वोट वापस लेने का हक़ भी होना चाहिए |
                                               
                                           सिर्फ ये एक कदम इस देश के बहुत से भ्रष्ट नेताओं के पसीने छुड़ाने के लिए काफी है | क्यूंकि इसके बाद तो सारा काम जनता ही कर लेगी , किसी भी बाबा या समाज सेवक को कोई आमरण अनशन कि ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी | क्यूंकि तब नेताओं की डोर एक वास्तविक लोकतान्त्रिक देश कि तरह जनता के हाँथ में होगी | नतीजा तब नेता कुछ भी गलत करने से पहले 100 बार सोचेगा  की कहीं उसकी एक छोटी सी गलती उसे अगले ही दिन ग्राउंड से बाहर न कर दे |  और  यकीन मानिये  वोट वापसी का ये अधिकार एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक व्यवस्था की नीव रखने में एक बहुत ही मज़बूत कदम के रूप मे सामने आयेगा | 
                                                                      

Wednesday, June 1, 2011

भेजे का खेल है बॉस !

                               मेरी अब तक की लाइफ में शायद ही कोई फिल्म स्टार मेरा फेवरिट बना हो | कभी किसी स्टार की कोई फिल्म अच्छी लगती है तो कभी किसी की कोई | पर कभी कभी ऐसा होता है की कोई कलाकार अपनी किसी खास बात से हम सब के दिल में खास जगह बना लेता है | उसकी कही कोई एक बात ये एहसास करा देती है की वो न सिर्फ एक अच्छा कलाकार है बल्कि कहीं न कहीं एक अच्छा और नेक इंसान भी है | पिछले दिनों एक ऐसे ही एक बड़े न्यूज़ चैनल पर फेमस स्टार सलमान खान का इन्टरवियू देखा | बड़े ही साफ़ और ज़हीन तरीके से उन्होंने मीडिया के सभी सवालों के जवाब दिए | हालाँकि कुछ व्यतिगत सवालों को लेकर उन्हें उकसाने की पूरी कोशिश की गयी पर उसका भी उन्होंने बहुत ही बेहतरीन तरीके से जवाब दिया | 
        
                                     [इससे पहले मैं अपने असल मुद्दे  पर आऊं एक बात अपने ब्लॉगर परिवार के सभी सदस्यों से करना चाहूंगी ? असल में मीडिया का वास्तविक उद्देश्य और कार्य क्या है ? देश के हित और सेवा मे काम करना , यही तो है न उद्देश्य | पर आपको क्या लगता है की क्या मीडिया आज यही काम कर रही है ? यक़ीनन नहीं !   मीडिया असल में किसी की निजी ज़िन्दगी में तभी प्रवेश कर सकता है या करने का हक़ रखता है जब उस शख्स की निजी ज़िन्दगी से देश को कोई खतरा हो , अन्यथा मीडिया को कोई हक़ नहीं है कि सिर्फ मसालेदार खबर बनाने किसी की निजी ज़िन्दगी से खिलवाड़ करे | ] 

                            अब हम आते हैं अपने असल मुद्दे पर, तो हम बात कर रहे थे सलमान के इन्टरवियू की | अपनी तरफ फेके गए हर सवाल पर उन्होंने बेहतरीन ढंग से शॉट लगाये , और स्टूडियो से जाते वक्त एक बेहतरीन छक्का मार कर गए | जैसा की आप में से ज़्यादातर लोग जानते होंगे की सलमान पेंटिंग का काफी शौक रखते है, ठीक इसी के चलते उन्होंने चैनल के स्टूडियो मे भी एक पेंटिंग बनायीं |

 जैसा की आप देख सकते हैं की सलमान एक लम्बा और बड़ी दाड़ी वाला चेहरा बना रहे हैं | इस तस्वीर को बनाने के बाद उन्होंने इसका एक बेहद ही खूबसूरत और रोचक विश्लेष्ण भी किया | जैसा की आप इस तस्वीर में देख सकते है वो चेहरा साफ़ नज़र आ रहा है, सलमान के अनुसार  इस तस्वीर को आप यदि ध्यान से देखें और इसके माथे यानि [forehead] वाले हिस्से पर कुछ देर के लिए ध्यान न दें सिर्फ भौं के नीचे का हिस्सा ही देखें तो ये एक बेहद अजीब और आश्चर्यचकित कर देने वाला तथ्य सामने ला रहा है | आप सब भी ध्यान से देखें ! 


                                                                     
                                                                             कुछ समझ में आया या नहीं, अब मैं आपको वो बताती हूँ जो सलमान ने स्टूडियो मे बताया था | अगर आप इस तस्वीर को ध्यान से देखेंगे तो नीचे के इस आधे चहरे आप लगभग सभी धर्मों के भगवानों को देख सकते है | अब ज़रा अपनी याददाश्त पर जोर डालिए , हिन्दू धर्म मे ब्रम्हा जी का चेहरा , इस्लाम में मुहम्मद साहब का चेहरा , सिखों मे गुरुनानक देव जी का चेहरा और ईसाईयों में ईसा मसीह का चेहरा और तो और अपने साईं बाबा जिन्हें तो लगभग हर धर्म के लोग मानते हैं | ये सभी चहरे  असल में एक ही तो है | यानि सभी धर्म और मज़हब  कहीं न कहीं एक ही तो हैं |
                                                           सारी गड़बड़ शुरू होती है उस जगह से जिसे हम भेजा, दिमाग या मगज कहते है | ये लो हम तो समझ रहे थे की मज़हब का कनेक्शन दिल से है पर ये तो भेजे का का खेल है बॉस | यानि की सारी फसाद की जड़ तो ये भेजा यानि कि दिमाग है |  

                                                            तो अब क्या करे ? आशा है आप सभी अपने कमेंट्स से इस सवाल का जवाब खुद ही दे देंगे | तो अब बस मैं तो बेसब्री से आपके कमेंट्स कि प्रतीक्षा कर रही हूँ | 
                                                                                                                                   
                                                                                                                                           धन्यवाद |       

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