Thursday, May 19, 2011

अब नहीं दिखती !!!!

                                         'चूं चूं करती आई चिड़िया, दाल का दाना लायी चिड़िया ||

                                           याद आया बचपन में या तो किताबों में या फिर दादी नानी के मूंह से या फिर किसी न किसी रूप में हम सबने ये कविता ज़रूर सुनी होगी | बड़ा मज़ा आता था सुनने में , और मज़ा तब और भी बढ़ जाता था जब ये कविता कानो तक तब पहुचती थी जब एक प्यारी सी गौरैया हमारे आंगन में या छज्जे में होती थी| पर अब ऐसा नहीं है, आज ये कविता कुछ सूनी सूनी हो गयी है | कारण आज कविता की पंक्तियों में तो चिड़िया है पर असल में वो कहीं ग़ायब हो गयी हैं |
                                           मुझे याद है की अपनी दादी माँ की मृत्यु के बाद से लगभग पिछले 14 -15 सालों से हर रोज अपने छज्जे पर चिड़ियों के लिए खाना और पानी रखती हूँ | दो चार साल पहले तक लगभग सभी पक्षी खाने और पानी पीने आते थे पर अब दो तीन साल से वो छोटी सी प्यारी सी गौरैया पता नहीं कहाँ खो गयी नज़र ही नहीं आती | बहुत इंतजार किया उसका पर नहीं दिखी | सोचा नेट पर देखती हूँ शायद कुछ पता चले | 
तब मालूम पड़ा की असल में हमारी प्यारी गौरैया अब तो विलुप्तप्राय प्रजातियों में शामिल की जा चुकी है | यानि एक ऐसी प्रजाति जिसके विलुप्त होने का खतरा है | इसका मतलब की यदि उनके बचाव के लिए उन समस्याओं को दूर ना किया गया जिससे उनकी उत्तर जीविता  [sarvival ]  खतरे मे है तो निकट भविष्य में उनकी समाप्ति सुनिश्चित है | 
                                      अपनी इतनी पुरानी दोस्त के लिए ऐसा पढ़ कर बहुत बुरा लगा | इसका मतलब अब आगे आने वाली पीढ़ी के लिए तो चिड़िया भी डायनासोर की तरह सिर्फ किताबों के पन्नो तक ही सीमित रह जाएँगी |  काफी खोज और नेट पर ढूढने के बाद ये साफ़ हुआ की इन सबके पीछे तीन सबसे महतव्पूर्ण कारण
 हैं -----


1 - जगह जगह लगने वाले मोबाईल टावर 

2 -  खतरनाक उर्वरकों का प्रयोग 

3 -  घरों में लगने वाले ए.सी  
           मोबाईल टावर और घरों में लगने वाले ए.सी से होने वाले विकिरण से पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचता है | नतीजा पर्यावरण में रहने वाले हर एक प्राणी की ज़िन्दगी को खतरा उत्पन्न हो गया है | आज गौरैया गयी है कल और भी प्राणी धीरे धीरे ग़ायब हो जायेंगे | सिर्फ इतना ही नहीं खेतों में इस्तेमाल होने वाले  खतरनाक उर्वरक भी इस गौरैया के अस्तित्व को ख़त्म करने का एक कारण है, अंदाज़ा लगाइए इस उर्वरक से उत्पन्न अनाज खाकर हम कहाँ जायेंगे ?
                   

                             पर्यावरण मे लगातार बढ़ रहा इस तरह का प्रदूषण आगे भी कई बड़े दुष्परिणाम सामने लायेगा | इससे पहले कि हम और भी कुछ खूबसूरत और प्यारी चीज़ खो दें , हमें अपने पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेना होगा और वो भी पर्यावरण दिवस का इंतज़ार किये बिना | क्यूँ कि मैं वाकई में अपनी प्यारी चिड़िया को खोना नहीं चाहती |

  
   

                                                  
 SAVE NATURE , SAVE EARTH '

         

15 comments:

मनोज कुमार said...

लोगों को जागरूक करती बहुत ही अच्छी पोस्ट।

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सच में हमारे आँगन की फुदकती गौरैया कहाँ दिखती है अब...... संवेदनशील पोस्ट

संजय भास्कर said...

सुन्दर अभिव्यक्ति|

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (21.05.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

सुबीर रावत said...

गौरया की भांति आप भी तो कहीं लुप्त हो गयी थी कृति जी, लम्बी प्रतीक्षा के बाद अच्छा हुआ आप नेट पर दिख गयी. ... बहरहाल ! (आप नाराज न हों, आत्मीयतावश लिख रहा हूँ)... गौरया पर आपकी फ़िक्र वाजिब है कृति जी. मुझे याद है हमारे घर में ही कई गौरया के घोसले होते थे. जब मकान पक्का बना तो उनको कही घोसले के लिए जगह नहीं मिल पाई. हम भी खुश हुए अब न बार-बार कबाड़ गिरता है और न ही साँपों का डर,क्योंकि कई बार सांप चढ़ आते थे घोसलों तक. परन्तु स्थिति आज भयावह हो गयी है. दो बरस पहले जनवरी में लोनावाला (पुणे) जाना हुआ था वहां पर सिंहगढ़ इंस्टीटयूट के पीछे पहाड़ी पर गौरया बड़ी तादाद में देख कर मन प्रसन्न हो गया. वहां चट्टानों पर घोसला बनाने के लिए बहुत जगह है, ठीक ठाक पेड़ पौधे हैं और भी कई वजह होगी जो वहां पर गौरया बड़ी तादाद में है......
सार्थक व रचनात्मक सोच के लिए आभार.

krati said...

नमस्ते सुबीर सर,

बहुत अच्छा लगा ये जानकर की आप जैसे सीनियर्स भी मेरी पोस्ट का इंतज़ार करते हैं | यकीन मानिये इतने दिनों के लिए ब्लॉग से गायब होना मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था पर एक पारिवारिक समारोह के कारण कुछ दिनों तक ब्लॉग लिखने में असमर्थ थी | पर अब आ गयी हूँ | आशा है आप जैसे गुरुजनों का आशीर्वाद मिलता रहेगा | बहुत ख़ुशी हुयी ये जानकर कि मेरी दोस्त गौरैया को भी अपने हाल फिलहाल में देखा है | पोस्ट को पढ़कर उस पर अपनी टिप्पणी भेजने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद | मेरे एक अन्य ब्लॉग

[kavyanjali-krati.blogspot.com और socho-krati.blogspot.com ] पर भी अपनी दृष्टि डालें और उस पर भी कुछ टिप्पणी दें | विश्वास करिये इससे नए लेखकों का उत्साह बढ़ता है |

उत्साह बढ़ने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद |

सादर प्रणाम |

रश्मि प्रभा... said...

ab chidiya dekhni ho to gini chuni chidiya pinjre me latka lo ... aaj ko bayaan karti rachna

Dr (Miss) Sharad Singh said...

गहन चिन्तनयुक्त विचारणीय लेख ....

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बिलकुल सच कहा आपने.
बचपन में मैं अक्सर आसमान में गौरय्या के झुंडों को देखा करता था पर आज वह दृश्य दुर्लभ है.

सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पर्यावरण के प्रति सचेत करती अच्छी पोस्ट

मदन शर्मा said...

व्यस्तता के कारण देर से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ.
बहुत इन्तजार करवाया आपने !!
बहुत रोचक और सुन्दर अंदाज में लिखी गई रचना .....
आभार

Shah Nawaz said...

गहरे चिंतन का विषय है... जानकारियों के लिए आभार!!!

गिरधारी खंकरियाल said...

पर्यावरण के लिए जागरूकता भरा आलेख

mahendra srivastava said...

सुंदर और ज्ञानवर्धक

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