Friday, May 27, 2011

'स्वीट मेमोरीस'

                                      कहा जाता है की हर इंसान की ज़िन्दगी में कभी न कभी एक ऐसा वक्त आता है जिसकी कुछ खूबसूरत यादें कहीं न कही हमेशा उसके जेहेन में रहती हैं | हर इंसान का अपना अलग ही नजरिया है उस वक्त के बारे में सोचने का , पर जहां तक मुझे लगता है एक वक्त ऐसा है जो हम सब की ज़िन्दगी में आया भी ज़रूर है और शत प्रतिशत यादगार भी होगा , और वो है हमारा   ' बचपन '  | 
                                        हो सकता हैं कुछ लोगों के बचपन के साथ उनकी कुछ कड़वी यादें भी जुडी हुयी हों  , पर मेरा इस बात पर भी पूरा विश्वास है की आपकी अब तक की ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत याद भी कहीं न कहीं आपके बचपन से ही जुडी होगी |
                  
                 याद करिए बचपन का वो दौर जब आप पहली बार स्कूल गए होंगे , हाँ हाँ हो सकता है की आप भी पहले दिन रोते रोते ही गए हों मेरी तरह | और ऊपर से मम्मी की ज़ोरदार डांट भी खायी होगी | उस पर भी अपनी  ग़लती नहीं मानी होगी , गुस्से भरी निगाहों से मम्मी को घूर के देखा होगा ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में दुर्योधन ने अर्जुन को और रामायण में रावण ने राम को देखा था | एक पल के लिए तो यक़ीनन ऐसा ही लगा होगा कि इस वक्त इस धरती पर मेरी माँ से बड़ा शायद  ही मेरा कोई शत्रु हो ! पर आज ज़रा वो वक्त याद कीजिये तो हंसी आती है अपने उस बचपने पर | 
                                      याद है वो गर्मी कि छुट्टियों का बेसब्री से इंतज़ार करना | शायद आपमें से कुछ को याद हो उस दौरान दूरदर्शन पर दोपहर के वक्त तरंग नाम का एक कार्यक्रम आता था [ शायद आज भी आता है ] | कितना इंतज़ार करते थे हम लोग उसका | हर सन्डे सुबह 7 :15 पर वो गीतों भरी रंगोली |  उस दौरान टी.वी. पर एक खास गीत भी पूरे दिन बजता रहता था '' मिले सुर मेरा तुम्हारा , तो सुर बने हमारा ''| और एक गीत जो उस वक्त मुझे बहुत पसंद था और एक कार्टून के रूप में आता था '' एक चिड़िया अनेक चिड़िया , दाना चुगने बैठी चिड़िया''| उस वक्त तक तो केवल यही समझ मे आता था | 


                वक्त बीता और हमारे घर में एक और सदस्य ने प्रवेश किया नाम बताऊँ उसका , नहीं नहीं पहले गाना सुनाती हूँ नाम आप खुद-ब-खुद समझ जायेंगे --         '' जंगल जंगल बात चली है पता चला है अरे चड्डी बहन के फूल खिला है फूल खिला है "| हाँ हाँ हमारा और उस वक्त मेरी उम्र के सभी बच्चों का सबसे पक्का दोस्त ' मोगली '| ये कार्टून मुझे इतना पसंद था कि आज यही गीत मेरे मोबाइल कि रिंगटोन है |  
                       बचपन कितना अच्छा होता है कोई पाबन्दी नहीं कोई रोक टोक नहीं | हम स्वछंद रूप खेलते थे | जात पात , ऊँच नीच कुछ भी तो नहीं था तब | सब कितना पाक और साफ़ था | पर अब नहीं रहा वो सब कुछ | पता नहीं कहाँ खो गया ? बहुत ढूँढा पर मिला ही नहीं | मैं तो बड़ी हो गयी  पर आज जब आज का बचपन देखती हूँ तो थोडा आश्चर्य होता है , तुलना करती हूँ अपने बचपन से तो लगता है , कि या तो मे बहुत पीछे छूट गयी थी उस वक्त या आज का ये बचपन कुछ ज्यादा ही आगे निकल गया है | पर सच कहूं मुझे कोई अफ़सोस नहीं है अपने उस पिछड़ेपन का , क्यूँकि अगर आज तरक्की का पैमाना गन्दगी और फूहड़ता है , तो बहुत खुश हूँ मै अपने इस पिछड़ेपन से | और ईश्वर से ये प्रार्थना करती हूँ कि वो मुझे हमेशा ही पिछड़ा ही रखे |
                        
                       अपनी इन्ही यादों को ताज़ा रखने के लिए मेरे दिमाग मे एक आईडिया आया | मैंने फेसबुक पर एक ग्रुप बनाया है 'स्वीट मेमोरीस' के नाम से | इस ग्रुप को बनाने के पीछे मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना था कि इसके ज़रिये मुझ जैसे सभी लोग अपना बचपन याद कर सकें | अगर आप भी मानते है कि बचपन वाकई में खूबसूरत होता है तो फेसबुक पर मुझे ज्वाइन करें और बाटें अपने बचपन कि उन खूबसूरत और मीठी यादों को |

[ मेरी इसी प्रोफाइल पिक्चर के ज़रिये आप मुझे फेसबुक पर ढूंढ सकते हैं ]|     
               
                                मुझे पूरा विश्वास है आज मैंने आप सबकी ज़िन्दगी के उन खास दिनों को याद दिला कर आपके चहरे पर न सिर्फ वो मासूम मुस्कराहट ला दी होगी , बल्कि कुछ देर के लिए तो शायद आपको आपके बचपन में वापस भी लौटा दिया होगा | 

                    तो चलिए एक मीठे से गीत के साथ छोड़ जाती हूँ आप सबको उन मीठी यादों में | इस उम्मीद के साथ कि अब अपने इसी मासूम बचपने के साथ हमारी मुलाकात होगी फेसबुक पर |



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Thursday, May 19, 2011

अब नहीं दिखती !!!!

                                         'चूं चूं करती आई चिड़िया, दाल का दाना लायी चिड़िया ||

                                           याद आया बचपन में या तो किताबों में या फिर दादी नानी के मूंह से या फिर किसी न किसी रूप में हम सबने ये कविता ज़रूर सुनी होगी | बड़ा मज़ा आता था सुनने में , और मज़ा तब और भी बढ़ जाता था जब ये कविता कानो तक तब पहुचती थी जब एक प्यारी सी गौरैया हमारे आंगन में या छज्जे में होती थी| पर अब ऐसा नहीं है, आज ये कविता कुछ सूनी सूनी हो गयी है | कारण आज कविता की पंक्तियों में तो चिड़िया है पर असल में वो कहीं ग़ायब हो गयी हैं |
                                           मुझे याद है की अपनी दादी माँ की मृत्यु के बाद से लगभग पिछले 14 -15 सालों से हर रोज अपने छज्जे पर चिड़ियों के लिए खाना और पानी रखती हूँ | दो चार साल पहले तक लगभग सभी पक्षी खाने और पानी पीने आते थे पर अब दो तीन साल से वो छोटी सी प्यारी सी गौरैया पता नहीं कहाँ खो गयी नज़र ही नहीं आती | बहुत इंतजार किया उसका पर नहीं दिखी | सोचा नेट पर देखती हूँ शायद कुछ पता चले | 
तब मालूम पड़ा की असल में हमारी प्यारी गौरैया अब तो विलुप्तप्राय प्रजातियों में शामिल की जा चुकी है | यानि एक ऐसी प्रजाति जिसके विलुप्त होने का खतरा है | इसका मतलब की यदि उनके बचाव के लिए उन समस्याओं को दूर ना किया गया जिससे उनकी उत्तर जीविता  [sarvival ]  खतरे मे है तो निकट भविष्य में उनकी समाप्ति सुनिश्चित है | 
                                      अपनी इतनी पुरानी दोस्त के लिए ऐसा पढ़ कर बहुत बुरा लगा | इसका मतलब अब आगे आने वाली पीढ़ी के लिए तो चिड़िया भी डायनासोर की तरह सिर्फ किताबों के पन्नो तक ही सीमित रह जाएँगी |  काफी खोज और नेट पर ढूढने के बाद ये साफ़ हुआ की इन सबके पीछे तीन सबसे महतव्पूर्ण कारण
 हैं -----


1 - जगह जगह लगने वाले मोबाईल टावर 

2 -  खतरनाक उर्वरकों का प्रयोग 

3 -  घरों में लगने वाले ए.सी  
           मोबाईल टावर और घरों में लगने वाले ए.सी से होने वाले विकिरण से पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचता है | नतीजा पर्यावरण में रहने वाले हर एक प्राणी की ज़िन्दगी को खतरा उत्पन्न हो गया है | आज गौरैया गयी है कल और भी प्राणी धीरे धीरे ग़ायब हो जायेंगे | सिर्फ इतना ही नहीं खेतों में इस्तेमाल होने वाले  खतरनाक उर्वरक भी इस गौरैया के अस्तित्व को ख़त्म करने का एक कारण है, अंदाज़ा लगाइए इस उर्वरक से उत्पन्न अनाज खाकर हम कहाँ जायेंगे ?
                   

                             पर्यावरण मे लगातार बढ़ रहा इस तरह का प्रदूषण आगे भी कई बड़े दुष्परिणाम सामने लायेगा | इससे पहले कि हम और भी कुछ खूबसूरत और प्यारी चीज़ खो दें , हमें अपने पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेना होगा और वो भी पर्यावरण दिवस का इंतज़ार किये बिना | क्यूँ कि मैं वाकई में अपनी प्यारी चिड़िया को खोना नहीं चाहती |

  
   

                                                  
 SAVE NATURE , SAVE EARTH '

         

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