Saturday, April 16, 2011

बचपन खो गया

                                     बाल श्रम पर लगभग सभी अख़बारों में कुछ न कुछ मिल ही जायेगा | हर बार इस विषय पर संविधान को दोषी ठेहेरा दिया जाता है | पर एक बात जिस पर संविधान से लेकर कानून तक शायद अब तक नज़र नहीं डाल पाए वो है 'खोया हुआ बचपन '| थोडा अजीब लगा होगा सुनने में |  अच्छा एक बात बताइए आप सबने एक फिल्म कोई मिल गया तो देखी होगी | उसमे बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम करने वाली हंसिका मोटवानी को तो सबने देखा होगा |  एक फिल्म पहले चाइल्ड आर्टिस्ट और अगली ही फिल्म में हिमेश रेशमिया के साथ लीड हिरोइन |  अचानक एकाएक बड़ा हो जाना आज फिल्मों का चलन बन गया है | पर क्या आप मे से किसी ने कभी सोचा है की ऐसा क्यूँ होता है | 

                             

                                  मनोविज्ञान का एक खास हिस्सा  है बाल मनोविज्ञान | आप मे से जिसने भी इसे थोडा बहुत भी इसे पढ़ा है वो शायद मेरे कहने का मतलब समझ गए होंगे | शारीरिक परिपक्वता मानव जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है | पर ये बेहतर तभी है जब  वक्त पर हो | टीवी पर दिखाए जाने वाले कुछ सिरिअल्स में आज कल कुछ ऐसा दिखाया जा रहा जो सही नहीं है |  
             फुलवा में एक छोटी सी मासूम बच्ची की मांग में जबरन सिन्दूर भर दिया जाता है | हमने तो इसे सिर्फ एक नाटक समझ कर देख लिया | पर क्या किसी ने एक बार भी सोचा की इस सीन का उस बच्ची के ज़ेहन पर क्या असर पड़ेगा | ये सारी बातें इंसान के अचेतन में कहीं न कहीं घर कर जातीं हैं | और वक्त आने पर अपना प्रभाव दिखतीं हैं | 
 ये पहली बार नहीं हुआ है , इससे पहले भी बालिका वधु में आनंदी का भी बाल विवाह दिखाया गया था | कहने को तो ये सिर्फ नाटक है पर इसका थोडा असर अब दिखने लगा है | अगले ही नाटक ससुराल सिमर का में आनंदी यानि अविका एकाएक बड़ी लगने लगी |  असर खुद ब खुद सामने आ गया |  
                










कुछ सालों बाद फुलवा भी एकाएक बड़ी हो जाएगी  और उसका बचपन भी कहीं खो जायेगा |  टीवी और फिल्मों पर इस तरह के बाल कलाकार अब क्यूँ ज्यादा दिन तक बाल नहीं रह पाते |
                                       जबकि अगर हम तुलना करें तो पुरानी फिल्मों में बतौर बाल कलाकार  कई बच्चे कई फिल्मों में दिखते थे | पर आज एक फिल्म के ही बाद बच्चे बड़े हो जाते हैं | एक बार सोचियेगा ज़रूर | क्यूंकि मनोवैज्ञानिक तौर पर ये सब ठीक नहीं है | बच्चों का  खोता बचपन न सिर्फ उनके मन पर बल्कि हमारे समाज पर भी भविष्य में बहुत ही बुरा असर डालेगा | बाल श्रम का पुरजोर विरोध करने वाले समाज सेवक अब तक इस गंभीर विषय पर अपनी नज़र क्यूँ नहीं डाल पाए | 

मनोरंजन ज़रूरी है पर तब तक जब तक वो स्वस्थ हो | जब ये मनोरंजन शारीरिक या मानसिक बीमारियाँ देने लगे तो जल्द से जल्द उस मनोरंजन पर लगाम लगा देनी चाहिए  | वरना ये हमें और हमारे समाज को  बीमार कर देगा |
   

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