Saturday, March 26, 2011

भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान= एक ख़्वाब

        इस ब्लॉग को पढ़ने से पहले कृपया कोई देशभक्ति गाना पूरी तरह से डाउनलोड कर ले , यकीं मानिये ये ही आपको असल सोच देगा इस ब्लॉग को पढ़ने की |  ब्लॉग को पढ़ते वक़्त वो गीत साथ में सुने  | 
       This is my humble request .

                                   कहते है की प्रेम का धागा अगर टूट जाये तो लाख जोड़ने की कोशिश करो मगर फिर भी एक गांठ हमेशा रह ही जाती है , जो लाख कोशिश के बाद भी नहीं जाती |  लेकिन क्या हो अगर हम धागा ही बदल दें तो ?  हाँ सही समझा आपने मैंने कहा कि क्या हो अगर धागा ही बदल दें | और एक बार फिर एक नए और लोहे जैसे मज़बूत धागे में फिर से उन बिखरे हुए मोतियों को पिरो दें | थोडा अजीब तो लगा होगा आपको ये पढ़कर पर विश्वास रखिये ये हो सकता है | आप कर सकते हैं , हम कर सकते हैं , हम सब कर सकते हैं | 

                           14 अगस्त सन 1947 पाकिस्तान का नामकरण , 15 अगस्त 1947 भारत का नामकरण | एक खेल जो खेला था उन विदेशी ताक़तों ने जिन्होंने हम हम पर सैकड़ों साल राज किया और हमें तोड़ कर चले गए और आज तक मज़े से हमें लड़ते झगड़ते देख रहे हैं | सोचते होंगे 63-64 साल बाद आज भी देखो भिड़े पड़े हैं या तो वो हमसे ज्यादा समझदार हैं या फिर हम बहुत बड़े मूर्ख जो उनके इस खेल को 64 साल बाद भी समझ नहीं पाए | 
वो आज भी हमें नचाते है और हम कभी कश्मीर मुद्दे पर तो कभी परमाणु करार को लेकर नाचते हैं | एक कठपुतली की तरह | ये भूल कर की हममे इतनी ताकत है की हम कठपुतली की उस डोर को तोड़ भी सकते हैं | 

                             सन 1947 के उस विभाजन का दर्द क्या था ये हम और आप कभी समझ ही नहीं सकते हैं | क्यूंकि हम आज आपने परिवारों के साथ हैं | ये दर्द समझ सकते हैं सिर्फ वो लोग जिन्होंने ये झेला है | जिहोने इस बंटवारे में अपनों को खोया है | हमने तो ये सब सिर्फ किताबों में इतिहास की तरह पढ़ा और और भूल गए पर उनका क्या जो ये दर्द आज भी झेल रहे हैं | 
  दोष केवल विदेशी ताकतों का भी नहीं था | कुछ आपने ही गंदे ज़ेहन वाले लोगों ने भी आग में घी का काम किया | परिस्थितियां इस तरह की बना दी गयीं की ये चोट लगे | और फिर कह दिया गया की बंटवारे के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था | एक पल के लिए मान भी लिया जाये की माहौल बहुत बिगड़ गया था , पर क्या तब से अब तक इन 64 सालों में एक बार भी एसा मौका नहीं आया जब हम फिर से एक होने की कोशिश कर सकें |   लेकिन नहीं हमने की तो सिर्फ वार्ता , कभी सीमाओं को लेकर तो कभी आर्थिक मसलों को लेकर | पर नतीजा सिफ़र ही रहा |  कभी प्रेम का प्रतिक बसें चलीं तो कभी ट्रेने | पर इन बसों और ट्रेनों में प्रेम का ईंधन तो डाला ही नहीं गया |  सियासतदान अभी भी ये खेल खेल रहे हैं | दोनों ही लोकतान्त्रिक मुल्कों मे लोक यानि आम आदमी से तो कभी ये पूंछा ही नहीं गया की आखिर वो क्या चाहता है ? दोनों मुल्कों में किसी न किसी मुद्दे पर हर दो माह बाद चुनाव करा लिए जाते हैं | पर क्या इन 64  सालों में एक चुनाव भी एसा हुआ जिसमे आम इंसान से ये पूंछा गया हो की अब भारत और पाकिस्तान को एक बार फिर एक नहीं हो जाना चाहिए ? शायद नहीं | बाहरी लोग हमेशा इस ताक़ में रहते हैं की कब मौका मिले और हम इस सोच का फायदा उठायें | 

   
                       आने वाली 30 मार्च को मोहाली में भारत और पाकिस्तान का मैच है | ये तो तय है की कोई एक टीम तो हारेगी ही | पर हम किसी जीत के लिए कैसे खुश हो सकते हैं क्यूंकि असल में हम कहीं न कहीं हार भी तो रहे हैं |         एक बार सिर्फ एक बार सोचिये अगर वो बंटवारा न हुआ  तो क्या आज तस्वीर यही होती | नहीं बिलकुल नहीं , यक़ीनन नहीं |  हिन्दुस्तान की ही टीम में तब सचिन और अफरीदी  एक साथ ओपनिग करते और सामने होता कोई विदेशी मुल्क | एक मिनट के लिए अपनी आंखे बंद कीजिये और कल्पना कीजिये जो हिन्दुस्तानियों से भरा वो ग्राउंड ,  उस जोश की तीव्रता को आप आज इसी वक्त आपने दिल के रिक्टर पैमाने पर आंक सकते हैं | तब लाहौर या पेशावर जाने के लिए हमें और दिल्ली और लखनऊ जाने के लिए उन्हें किसी पासपोर्ट की ज़रुरत नहीं होती | वाघा बोर्डर पर हमारे बच्चे
क्रिकेट खेल रहे होते | सब कुछ बेहद खूबसूरत और खुशनुमा होता | चरों तरफ अमन , प्रेम और भाईचारा होता | 
  
     बहुत जी लिए हम अपने लिए आपने स्वार्थ के लिए , एक बार सिर्फ एक बार क्यूँ न हम जी लें आपने मुल्क आपने वतन के लिए | शहीदों ने अपनी जान मुल्क को विदेशियों से आज़ादी दिलाने के लिए दी थी ना कि अपनों से | 


      सन 1857 में एक क्रांति का बिगुल फूंका गया था  ताकि देश को विदेशी ताकतों से मुक्ति मिल सके 
  आज 26 मार्च सन 2011 में क्यूँ ना एक बार फिर बिगुल फूंका जाये , पर इस बार किसी को भागने के लिए नहीं बल्कि बिछड़ों को  मिलाने  के लिए , अपनो से मिलने के लिए  और एक बार फिर   भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान= एक ख़्वाब  को फिर से जीने के लिए और उसे हकीक़त में तब्दील करने के लिए | तो क्या आप तैयार हैं इस मिशन में शामिल होने के लिए | अगर हाँ तो ब्लॉग जगत से जुड़े हर हिन्दुस्तानी [ भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान ] के ब्लॉग पर ये सन्देश पहुँचाना चाहिए कि अब हम एक हैं |  1857  में भी इंक़लाब कलम ही लाया था और आज भी अमन कलम ही लायेगा | इस सोच को इतना फैलाइए कि आखिर दोनों मुल्कों में गूँज ही उठे ---------------


 ' MISSION REMOVE THE PARTITION '  
  

7 comments:

मदन शर्मा said...

इस विषय पर मैं आपसे बिलकुल सहमत नहीं हूँ. ऐसी बातें सुनने में तो बहुत ही अच्छी लगती हैं लेकिन प्रयोगात्मक स्तर पर नामुमकिन है. ये बातें वहीँ संभव है जहाँ पर विचार धाराएँ सामान हों. हमें सर्व प्रथम आवश्यकता इस बात की है की पहले अपने देश को तो एक करें. क्या हम कश्मीर की समस्या, असम की समस्या दक्षिण भारत की समस्या को भूल सकते हैं? आज पूरा भारत जाति वाद प्रान्त वाद के आग में सुलग रहा है. क्या हम इसे नजर अंदाज कर सकते हैं? जो हम अपने स्वार्थ के लिए किये गए गलतियों का ठीकरा अंग्रेजों के सर फोड़ते है ये हमारी बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है. वैसे मै आपके ब्लॉग के लिए नया हूँ कुछ गलत हो तो क्षमा कीजियेगा .

Vijai Mathur said...

बिलकुल सही सोच प्रस्तुत की है आपने.दरअसल जाने या अनजाने आज भी लोग साम्राज्यवादियों के इशारे पर नाचते हुए आपस में ही टकरा रहे हैं.पहले असली शत्रु को शत्रु तो मानें फिर सब स्वतः मूल बात को समझ लेंगे और तभी हमारा अखंड भारत पुनः स्थापित हो सकेगा.

krati said...

मदन सर आप उम्र में मुझसे बहुत बड़े हैं | जहां तक रही बात कि ये सब बातें सुनने में बहुत अच्छी लगतीं हैं लेकिन हकीक़त मैं मुश्किल , तो माफ़ी चाहूंगी 15 अगस्त सन 1947 से पहले तो हिन्दुस्तान की आज़ादी भी कपोल कल्पना ही लगती थी | पर सैकड़ों साल कि गुलामी के बाद ये कल्पना हकीकत मैं तब्दील हुयी | हर अच्छे काम में पहले आलोचना ही होती है मैं आलोचनाओं से नहीं डरती और यकीं मानिये ये आलोचनाये अगर आप जैसे गुनी जन करे तो कहीं न कहीं जोश और बढ़ जाता है | अब दूसरी बात कि आपका कहना है कि हर चीज़ का दोष अंग्रेजों पर मढ़ना गलत है अपने ब्लॉग में मैंने केवल उन्हें ही नहीं अपनों को भी दोषी ठहराया है क्यूंकि यक़ीनन ताली एक हाँथ से नहीं बजती | अब करते हैं अगली बात कश्मीर समस्या की तो एक बार दिल और दिमाग दोनों से सोचये की समस्या की जड़ तो वही है जिस पर मैंने ब्लॉग लिखा है | मैं उसे ही तो मिटाने की बात कर रही हूँ , पर सिर्फ ऊपरी तौर पर नहीं बल्कि जड़ से | आखिर में रही बात असोम और दक्षिण भारतीय समस्याओं की तो यकीं मानिये ये भी आज नहीं तो कल एक बार फिर विभाजन को जन्म देंगीं | हम फिर बंटवारा कर देंगे | पर क्या बंटवारा ही हर समस्या का हल है | नहीं न | मैं वही तो कह रही हूँ एक साथ रह कर भी तो समस्याओं को सुलझाया जा सकता है | इतिहास की जड़ में झांक कर देखें तो हर समस्या की जड़ तो ये विभाजन ही है | एक छोटा सा उदहारण देना चाहूंगी - परिवार में झगडा होता है एक बेटा अपने हक की मांग करता है और अलग हो जाता है , कुछ सालों बाद दूसरा बेटा भी हक मांगने लगता है और अलग होने की मांग करता है , इसी तरह तीसरा और चौथा भी , पर क्या ये सही है | यक़ीनन नहीं | अगर पहले बेटे को ही अलग न किया होता तो बाकियों की हिम्मत भी न पड़ती | इसीलिए मैं उसी पहले बेटे को वापस बुलाने की मांग कर रही हूँ ताकि फिर कोई दूसरा बेटा अपना नाजायज़ हक मांग कर अलग न हो जाये | रही बात झगड़े किस परिवार में नहीं होते मेरे घर में नहीं होते या आपके घर में नहीं होते | हम जोश में घर से अलग भी हो जाते हैं , पर हकीक़त यही है की ज़िन्दगी के किसी न किसी मोड़ पर एक टीस ज़रूर उठती है है अपनों से अलग होने की | मैं उस टीस को ही ख़त्म करने की बात कर रही हूँ | अगर आपको खुद पर विश्वास है तो यकीं मानिये ये होगा , आज नहीं तो कल , कल नहीं तो परसों !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA said...

जवर्दस्त सोचती हो भाई । तुसी
जब्बाब नहीं कृति जी

Patali-The-Village said...

बिलकुल सही सोच प्रस्तुत की है आपने|धन्यवाद|

मदन शर्मा said...

इस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हमारा नव संवत्सर शुरू होता है इस नव संवत्सर पर आप सभी को हार्दिक शुभ कामनाएं....

सारा सच said...

अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

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