Monday, March 14, 2011

माँ पाली नहीं जाती !!!

औलादों से अब ये ज़िम्मेदारी संभाली नहीं जाती ,
चार-चार बेटों से मिलकर अब एक माँ पाली नहीं जाती ||  

ये कोई व्यंग्य नहीं है बल्कि इस समाज की एक ऐसी सच्चाई है जिसे आज चाह कर भी नकारा नहीं जा सकता | हमारे समाज में एक ऐसी ही जगह है जिसे देखकर  किसी और का तो मै नहो जानती पर हाँ मेरा मूड ज़रूर ख़राब हो जाता है | ऊपर लिखी दो पंक्तियों से आप में से ज़्यादातर  लोग तो समझ ही गए होंगे | जी हाँ मै बात कर रही हूँ   ओल्ड ऐज होम  यानि कि  वृद्ध आश्रम  की | इस स्थिति पर और भी ज्यादा गुस्सा तब आता है जब हमारा समाज   अतिथि देवोभव   और  वसुधैव कुटुम्बकम  की बात करता है | 

                                  


                                                             जब भी देश के समृद्ध लोग बड़े बड़े मंच पर खड़े होकर इन विषयों पर लम्बे और तथाकथित प्रवचन रुपी भाषण देते हैं तो सच में मेरा मन यही करता है कि अभी इन लोगों के घर में जाऊं और देखूं  कि दूसरों के हित कि बनावटी बात सोचने वाले इन लोगों के घरों में खुद इनके माँ बाप कितने खुश और सुखी हैं |
                                       हर साल देश में कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहे ये वृद्ध आश्रम इस बात का साफ़ संकेत दे रहे हैं कि अब  बूढ़े माँ बाप के लिए उन्ही के अपने घर में कोई जगह नहीं है | इस दुखद स्थिति कोई एक वजह नहीं है | घर के बुजुर्गों के अपने घर को छोड़ कर जाने या उन्हें जबरन आश्रम पहुचाये जाने कि कई वजहें  हैं |  फिर चाहे वो बढ़ता पारिवारिक कलह हो या बेटे बहू दोनों का वर्किंग होना , आर्थिक परेशनी हो या मात्र सिर्फ विचारों का मेल न खाना | वजह चाहे कोई भी हो पर झेलना तो अंततः सिर्फ एक को ही पड़ता है और वो हैं घर के बुज़ुर्ग |


                   तकलीफ तो होती ही होगी कि कल किस तरह से एक एक पाई जोड़कर ये घर बनवाया था , ये सोच कर कि बुढ़ापे में नाती पोतों के साथ चैन से ज़िन्दगी गुजेंगे और इसी घर कि देहरी से आखिरी रुखसती भी लेंगे | पर नहीं , अब इस घर कि दीवारें ही उनसे कहने लगती हैं कि भाग जा , भाग जा कही ! किसी ऐसी जगह जहां कम से कम तू चैन से मर तो सके | 
           घर के आंगन में पत्नी की लगाई गयी हरी भरी तुलसी भी अब पूरी तरह से सूख गयी है |  ऐसा लगता है की मनो वो भी मुझसे कह रही हो की बस अब और नहीं रहना यहाँ | चलो मुझे भी कहीं और ले चलो |  
          पता नहीं किस पाप का खामियाजा भुगत रहा है बुढ़ापा ? परिस्थितियां तब और भी ज्यादा तकलीफदेह हो जाती हैं जब ज़िन्दगी के कई बसंत एक साथ देख चुके ये बुज़ुर्ग अचानक एक दूसरे का साथ छोड़ देते हैं | इतनी लम्बी दोस्ती का यूँ इस तरह खत्म होना उस दूसरे सदस्य को पूरी तरह से तोड़ देता है | 
                                            कुछ वक्त तो शायद यकीं भी नहीं होता होगा की हमारा सबसे पुराना दोस्त हमें छोड़ कर चला गया | पर वो बूढी हड्डियाँ वक्त के साथ समझौता करतीं हैं और एक बार फिर अपने भविष्य को अपने बच्चों और नाती पोतों में ढूँढने लगती हैं | पर नहीं उनकी ये सोच गलत साबित होती है उनका भविष्य उन्हें बड़े ही तीखे अंदाज़ में ये बता देता है की वो अब सिर्फ उनपर एक बोझ हैं जिसे वो ना चाहते हुए भी ढो रहे हैं | हर रोज़ की कलह , हर रोज़ के ताने | हर सवेरे ये अहसास दिलाना की या तो वो बहुत पीछे छूट गए हैं या फिर हम बहुत आगे निकल गए हैं | 
                                                                   कभी दादी नानी के मूंह से किस्से सुनाने वाले इस समाज में अब दादी नानी ही किस्सा बन कर रह गए हैं | संयुक्त परिवार की प्रथा अब यदाकदा ही देखने को मिलाती है | मेरी उम्र 28 साल है और मै यकीन के साथ कह सकती हूँ मेरी पीढ़ी शायद वो आखिरी पीढ़ी होगी जिसने दादी दादा और नाना नानी का भरपूर सुख लिया होगा | आज से औसतन 10 से 15 साल बाद जब एक नयी पीढ़ी अपना होश संभालेगी तब तक ये रिश्ते कहीं दूर बहुत दूर खो जायेंगे | 
                             
              
मेरी नानी माँ
         
                        साल 2010 , 11 मई ये वो दिन था जब मैंने अपनी नानी को खोया था, उनकी डेथ के बाद मेरी ये सोच  पूरी तरह से यकीन में बदल गयी कि एक बुजुर्ग ना सिर्फ किसी परिवार कि नीव होता है बल्कि उस परिवार कि ऐसी डोर भी होता है जो पूरे परिवार बो बंधे रखता है |    
             समाज में आज यही वर्ग बेहिसाब उपेक्षा का शिकार हो रहा है | नतीजा परिवार से तंग आकर या तो वो खुद ही वृद्ध आश्रम चला जाता है या उसकी अपनी औलादें उसे वहां  छोड़ आतीं हैं | एक वृद्ध आश्रम में एक प्रोजेक्ट के दौरान जाने पर ये सारी परिस्थितिया खुद ब खुद मेरे सामने आ गयीं | वहां मौजूद हर बुज़ुर्ग सिर्फ अपना अंत मांग रहा था | हर आंख में आंसू था हालाँकि वहां सेवारत लोग उनकी भरपूर सेवा कर रहे थे | पर वो सब अपने जैसे थे अपने नहीं |   उनकी आँखों में परिवार कि भूख साफ़ दिख रही थी | 

                               
                        सच कहूं तो समझ ही नहीं आता कि ये कैसी तरक्की है जो ऐसे बढते हुए वृद्ध आश्रमों से आंकी जाती है , ये कैसी तरक्की है जो इन बुजुर्गों के आसुओं पर तैर कर आगे बढ़ रही है | क्यूंकि अगर ये तरक्की है तो मेरी ईश्वर से सिर्फ एक ही दुआ है कि मुझे हमेशा  पिछड़ा ही रखना | 

9 comments:

सुरेश शर्मा (कार्टूनिस्ट) said...

आपने एक ज्वलंत मुद्दा पेश किया है ..
मेरे माँ -बाप बरसों पहले इस दुनिया से
चले गए ,तब मैं कमाता नहीं था, उनके
लिए बहुत कुछ करना था पर ??????
अब जिनके माँ-बाप हैं उनसे यही कहना
है, भगवान् तुम्हारे सामने हैं,उनका
सम्मान करो,अपमान नहीं !

सुबीर रावत said...

कृति जी, आपका लेख सार्थक है. .....काफी कुछ सोचने पर मजबूर करता है...... परन्तु दूसरा पहलू यह भी है कि कहीं माँ बाप स्वतंत्र व अकेले ही अपने घर में रहना चाहते हैं जब तक कि उनका शरीर ठीक ठाक रहता है. जब वे पूरी तरह असमर्थ हो जाते हैं तो फिर बेटे बहू की ओर देखते हैं. ऐसे में बेटा तो रखना चाहता है किन्तु बहू और पोते पोतियाँ ताने मारते हैं कि "जब तक ठीक थे तब तक.......... अब कौन टट्टी पेशाब साफ़ करे." और परस्पर भावनात्मक लगाव भी नहीं हो पाता है...........

अतः बुजुर्गो को भी चाहिए कि शरीर में ताक़त रहते ही बच्चों के साथ रहना शुरू करें और सस्मंजस्य बनाना सीखें. जेनेरेसन गैप तो रहेगा ही किन्तु कम करने का प्रयास करें.

मदन शर्मा said...

एक बुजुर्ग ना सिर्फ किसी परिवार कि नीव होता है बल्कि उस परिवार कि ऐसी डोर भी होता है जो पूरे परिवार बो बंधे रखता है |
कृति जी, बहुत ही सार्थक चिंतन है आपका ..........
सच आदमी दिन प्रति दिन असामाजिक होता जा रहा है जो चिंता का विषय है.

Vijai Mathur said...

हमारी प्राचीन संस्कृति में 'आठ और साठ' घर में नहीं रहते थे.८ के बाद गुरुकुल में तथा ६० के बाद वानप्रस्थ का प्राविधान था. जब तक ऐसा चला ठीक-ठाक चला.जैसे ही व्यवस्था बदली सब समस्याग्रस्त हो गया.
यदि वही स्थिति बहाल न भी हो सके तो भी अगर यही याद रखें की जीवित माता-पिता -गुरु और सास-श्वसुर की सेवा करना ही श्राद्ध -तर्पण है तो भी समस्या उतनी भयावह न हो.लेकिन पोंगा-पंथी कैसे श्राद्ध-तर्पण का विकृत रूप मृत लोगों के लिए करते हैं और लोग खुशी-खुशी भटकते एवं परेशानी का ताना-बना बुनते हैं.

क्रिएटिव मंच-Creative Manch said...

संयुक्त परिवार की प्रणाली छिन्न-भिन्न होने से आज बुजुर्गों की हालत दयनीय होती जा रही है. घर में बुजुर्गों की उपस्थिति कितनी आवश्यक होती है ये बात हम उनके जाने के बाद ही महसूस कर पाते हैं.

बहुत ही सामयिक और प्रभावशाली पोस्ट है जो मनन करने को बाध्य करती है.
आभार

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

कृति जी, बहुत ही ज्वलन्त एवं सामयिक समस्या को छुआ है आपने---यह सिर्फ़ हमारे अपने देश नहीं पूरे विश्व की समस्या है--इस मुद्दे पर हम सभी को चिन्तन करना होगा--तथा टूटती बिखरती जा रही संयुक्त परिवार प्रणाली को बचाने के लिये प्रयास करना होगा।

दर्शन कौर धनोए said...

बहुत बढ़िया लेख लिखा है आपने --बुजुर्ग ही इस तपते हुए रेगिस्तान में छाव की मानिंद खड़े है --हमे उनका आदर सत्कार करना ही चाहिए...

मेरे ब्लोक है :-
मेरे अरमान मेरे सपने |
प्यारी माँ |

आपका स्वागत रहेगा और इन्तजार भी --धन्यवाद |

Patali-The-Village said...

आपका लेख सार्थक है जो मनन करने को बाध्य करती है|
होली की हार्दिक शुभकामनाएँ|

mridula pradhan said...

समझ ही नहीं आता कि ये कैसी तरक्की है जो ऐसे बढते हुए वृद्ध आश्रमों से आंकी जाती है , ये कैसी तरक्की है जो इन बुजुर्गों के आसुओं पर तैर कर आगे बढ़ रही है | क्यूंकि अगर ये तरक्की है तो मेरी ईश्वर से सिर्फ एक ही दुआ है कि मुझे हमेशा पिछड़ा ही रखना |
ekdam hila kar rakh denewala lekh hai...bahut achche visay chune hain...dekhiye shayad kuch badal sake.....

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...