Saturday, March 26, 2011

भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान= एक ख़्वाब

        इस ब्लॉग को पढ़ने से पहले कृपया कोई देशभक्ति गाना पूरी तरह से डाउनलोड कर ले , यकीं मानिये ये ही आपको असल सोच देगा इस ब्लॉग को पढ़ने की |  ब्लॉग को पढ़ते वक़्त वो गीत साथ में सुने  | 
       This is my humble request .

                                   कहते है की प्रेम का धागा अगर टूट जाये तो लाख जोड़ने की कोशिश करो मगर फिर भी एक गांठ हमेशा रह ही जाती है , जो लाख कोशिश के बाद भी नहीं जाती |  लेकिन क्या हो अगर हम धागा ही बदल दें तो ?  हाँ सही समझा आपने मैंने कहा कि क्या हो अगर धागा ही बदल दें | और एक बार फिर एक नए और लोहे जैसे मज़बूत धागे में फिर से उन बिखरे हुए मोतियों को पिरो दें | थोडा अजीब तो लगा होगा आपको ये पढ़कर पर विश्वास रखिये ये हो सकता है | आप कर सकते हैं , हम कर सकते हैं , हम सब कर सकते हैं | 

                           14 अगस्त सन 1947 पाकिस्तान का नामकरण , 15 अगस्त 1947 भारत का नामकरण | एक खेल जो खेला था उन विदेशी ताक़तों ने जिन्होंने हम हम पर सैकड़ों साल राज किया और हमें तोड़ कर चले गए और आज तक मज़े से हमें लड़ते झगड़ते देख रहे हैं | सोचते होंगे 63-64 साल बाद आज भी देखो भिड़े पड़े हैं या तो वो हमसे ज्यादा समझदार हैं या फिर हम बहुत बड़े मूर्ख जो उनके इस खेल को 64 साल बाद भी समझ नहीं पाए | 
वो आज भी हमें नचाते है और हम कभी कश्मीर मुद्दे पर तो कभी परमाणु करार को लेकर नाचते हैं | एक कठपुतली की तरह | ये भूल कर की हममे इतनी ताकत है की हम कठपुतली की उस डोर को तोड़ भी सकते हैं | 

                             सन 1947 के उस विभाजन का दर्द क्या था ये हम और आप कभी समझ ही नहीं सकते हैं | क्यूंकि हम आज आपने परिवारों के साथ हैं | ये दर्द समझ सकते हैं सिर्फ वो लोग जिन्होंने ये झेला है | जिहोने इस बंटवारे में अपनों को खोया है | हमने तो ये सब सिर्फ किताबों में इतिहास की तरह पढ़ा और और भूल गए पर उनका क्या जो ये दर्द आज भी झेल रहे हैं | 
  दोष केवल विदेशी ताकतों का भी नहीं था | कुछ आपने ही गंदे ज़ेहन वाले लोगों ने भी आग में घी का काम किया | परिस्थितियां इस तरह की बना दी गयीं की ये चोट लगे | और फिर कह दिया गया की बंटवारे के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था | एक पल के लिए मान भी लिया जाये की माहौल बहुत बिगड़ गया था , पर क्या तब से अब तक इन 64 सालों में एक बार भी एसा मौका नहीं आया जब हम फिर से एक होने की कोशिश कर सकें |   लेकिन नहीं हमने की तो सिर्फ वार्ता , कभी सीमाओं को लेकर तो कभी आर्थिक मसलों को लेकर | पर नतीजा सिफ़र ही रहा |  कभी प्रेम का प्रतिक बसें चलीं तो कभी ट्रेने | पर इन बसों और ट्रेनों में प्रेम का ईंधन तो डाला ही नहीं गया |  सियासतदान अभी भी ये खेल खेल रहे हैं | दोनों ही लोकतान्त्रिक मुल्कों मे लोक यानि आम आदमी से तो कभी ये पूंछा ही नहीं गया की आखिर वो क्या चाहता है ? दोनों मुल्कों में किसी न किसी मुद्दे पर हर दो माह बाद चुनाव करा लिए जाते हैं | पर क्या इन 64  सालों में एक चुनाव भी एसा हुआ जिसमे आम इंसान से ये पूंछा गया हो की अब भारत और पाकिस्तान को एक बार फिर एक नहीं हो जाना चाहिए ? शायद नहीं | बाहरी लोग हमेशा इस ताक़ में रहते हैं की कब मौका मिले और हम इस सोच का फायदा उठायें | 

   
                       आने वाली 30 मार्च को मोहाली में भारत और पाकिस्तान का मैच है | ये तो तय है की कोई एक टीम तो हारेगी ही | पर हम किसी जीत के लिए कैसे खुश हो सकते हैं क्यूंकि असल में हम कहीं न कहीं हार भी तो रहे हैं |         एक बार सिर्फ एक बार सोचिये अगर वो बंटवारा न हुआ  तो क्या आज तस्वीर यही होती | नहीं बिलकुल नहीं , यक़ीनन नहीं |  हिन्दुस्तान की ही टीम में तब सचिन और अफरीदी  एक साथ ओपनिग करते और सामने होता कोई विदेशी मुल्क | एक मिनट के लिए अपनी आंखे बंद कीजिये और कल्पना कीजिये जो हिन्दुस्तानियों से भरा वो ग्राउंड ,  उस जोश की तीव्रता को आप आज इसी वक्त आपने दिल के रिक्टर पैमाने पर आंक सकते हैं | तब लाहौर या पेशावर जाने के लिए हमें और दिल्ली और लखनऊ जाने के लिए उन्हें किसी पासपोर्ट की ज़रुरत नहीं होती | वाघा बोर्डर पर हमारे बच्चे
क्रिकेट खेल रहे होते | सब कुछ बेहद खूबसूरत और खुशनुमा होता | चरों तरफ अमन , प्रेम और भाईचारा होता | 
  
     बहुत जी लिए हम अपने लिए आपने स्वार्थ के लिए , एक बार सिर्फ एक बार क्यूँ न हम जी लें आपने मुल्क आपने वतन के लिए | शहीदों ने अपनी जान मुल्क को विदेशियों से आज़ादी दिलाने के लिए दी थी ना कि अपनों से | 


      सन 1857 में एक क्रांति का बिगुल फूंका गया था  ताकि देश को विदेशी ताकतों से मुक्ति मिल सके 
  आज 26 मार्च सन 2011 में क्यूँ ना एक बार फिर बिगुल फूंका जाये , पर इस बार किसी को भागने के लिए नहीं बल्कि बिछड़ों को  मिलाने  के लिए , अपनो से मिलने के लिए  और एक बार फिर   भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान= एक ख़्वाब  को फिर से जीने के लिए और उसे हकीक़त में तब्दील करने के लिए | तो क्या आप तैयार हैं इस मिशन में शामिल होने के लिए | अगर हाँ तो ब्लॉग जगत से जुड़े हर हिन्दुस्तानी [ भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान ] के ब्लॉग पर ये सन्देश पहुँचाना चाहिए कि अब हम एक हैं |  1857  में भी इंक़लाब कलम ही लाया था और आज भी अमन कलम ही लायेगा | इस सोच को इतना फैलाइए कि आखिर दोनों मुल्कों में गूँज ही उठे ---------------


 ' MISSION REMOVE THE PARTITION '  
  

Thursday, March 24, 2011

कुछ याद आया ?

                   अपनी आज की इस पोस्ट के बारे मैं कुछ भी बताने से पहले एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकती हूँ की इस पोस्ट को पढ़ने के बाद तक़रीबन 90 प्रतिशत रीडर्स के चहरे पर मुस्कराहट तो आयेगी ही आयेगी | एक ऐसी मुस्कराहट जो कहीं न कहीं आपको आपके अतीत से जोड़ देगी | वो अतीत जो शत -प्रतिशत हम सब से जुड़ा हुआ है और शायद वो हमारे वर्तमान का भी हिस्सा हो | भाई मेरे तो है अब आपका मैं नहीं जानती | दिमाग पर ज्यादा जोर देने की ज़रुरत नहीं है | इससे पहले मैं कुछ और लिखूं आप एक तस्वीर देखें |

                                                      
                                       क्यूँ याद आ गया न | आ गयी न चेहरे पर एक मीठी सी बचपन वाली मुस्कराहट | 
कैरम हकीकत में हम सभी के बचपन का एक खूबसूरत और बेहद ही प्यारा हिस्सा है | वो हिस्सा जो गर्मियों की छुट्टियों में शुरू होता था फिर चाहे वो अपना घर हो या पड़ोस में रहने वाले हमारे दोस्त और सहेली का | मम्मी की रसोई या फिर पड़ोस से आती आवाज़ '' बेटा अब बस बहुत हो गया नहाना धोना है या पूरे दिन कैरम में ही लगे रहोगे | हे भगवान् ये बच्चे छुटियाँ हुयी नहीं की पूरे दिन बस कैरम कैरम |"  
                            यही तो होता था ना | बचपन बीत गया पर आज भी शायद घर के स्टोर रूम में आपका पुराना कैरम आपका इंतज़ार कर रहा होगा | लेकिन आपमें से किसी ने क्या कभी ये जानने की ये कोशिश कि कि हम सब का पसंदीदा कैरम आखिर आया कहाँ से ? अपने एक शोध के बाद जो कुछ मुझे पता चला वो काफी रोचक है और आज इसे ही में आपके साथ बांटने जा रही हूँ |


    कैरम के इतिहास को लेकर कहीं ना कहीं आज भी संशय कि स्थिति बनी हुयी है | पर सभी आंकड़ों को देखने के बाद अनुमानतः ये कहा जा सकता है कि कैरम का इतिहास तक़रीबन 200 साल पुराना यानि लगभग 1889 के आस पास है | कुछ लोग इसे भारत से ही उपजा बताते हैं जबकि कुछ इसे बर्मा और पुर्तगाल से भी जोड़ते हैं |  असल में ये टेबिल - टॉप परिवार का है | जिसे अलग अलग jaghon पर अलग अलग नाम से पुकारा जाता है | पश्चिम के कुछ देशों में इसे फिंगर बिलियर्ड्स भी कहा जाता है |  जबकि अपने देश में ही पंजाब में इसे ' फट्टा ' कहते हैं | फिजी में इसी से मिलता जुलता खेल vindi -vindi हैं | इसराइल में ऐसा ही एक खेल szha कहलाता है |  नोर्थ  अमेरिका और कुछ अन्य यूरोपीय देशों में इसे crokinole [ नोर्थ  अमेरिका ],pitchnut और novuss [लात्विया ,इस्टोनिया ] ,chapavev [Russia]  में , bobspil [denmark] आदि namon से पुकारा जाता  है |


                          भारत में एक मानक कैरम का साइज़ 29 इंच होता है | इसे जिस डिस्क से खेला जाता है जिसे हम साधारण भाषा में गोटी कहते हैं उसे अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर कैरम मैन  कहा जाता है | इसके अलावा इसके अन्य नाम puck ,coin  और seed भी कहते हैं | जिसका आकार 3.02 cm से 3.18 cm के बीच और वज़न 5 से 5.5 ग्राम के बीच होना चाहिए | एक अन्य बड़ी डिस्क स्ट्राइकर कहलाती है | जिसका आकार 4.13 cm और वज़न 15 ग्राम से ज्यादा नहीं होना चाहिए | खेल मई एक खास गोटी होती है जिसे queen यानि रानी कहा जाता है | ये होती तो अन्य गोटिओं कि ही तरह है पर इसका रंग लाल होता है |  शेष सभी गोटियाँ काली और सफ़ेद ही होतीं हैं |

                                                                         कैरम शब्द कि उत्पत्ति संभवतः दक्षिण पूर्व एशिया  के तिमोर से मानी जाती है | जहाँ से पुर्तगालियों के साथ होता हुआ ये मालाबार तटों के ज़रिये ये भारत पहुंचा |  पर इतिहास मिले ज़्यादातर साक्ष्य इसे पुर्तगालियों से ही जोड़ते हैं |  अगर किसी निश्चित तिथि कि बात करें तो एशिया मे कैरम से जुड़ा पहला टूर्नामेंट 1935 मे श्रीलंका मे खेला गया था | 1958 मे भारत और श्रीलंका ने एक 'फेडरेशन ऑफ़ कैरम क्लब ' स्थापित किया | इस फेडरेशन से जुड़ा पहला मैच 1960 के आस पास भारत और श्रीलंका के बीच खेला गया | इस टूर्नामेट मे अफगानिस्तान , पकिस्तान , मलेशिया और मोलदीव जैसे देशों ने हिस्सा लिया | 60 के दशक में यूरोपीय देशों मे इस खेल से जुड़े मैच होने लगे लगे | 1970 तक आते आते इस खेल का पूरी तरह से व्यवसायीकरण हो गया था | इस दशक के अंत तक आते आते  स्विट्ज़रलैंड , जर्मनी और  होलैंड जैसे देश भी इस खेल में उतर आये |
        1980 तक आते आते इस खेल से  जुडी  अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं पूरे विश्व में होने लगी | इसी दौरान 'अंतर्राष्ट्रीय कैरम फेडरेशन क्लब ' की  स्थापना  हुयी |  पहली कैरम कांग्रेस 1988 में हुयी | पहला अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट 1989 में खेला गया | इस अंतर्राष्ट्रीय संगठन से आज लगभग सभी देशों के फेडरेशन जुड़े है |


ये सच है कि इतिहास हमेशा रोचक होता है | पर अगर वही इतिहास हमसे जुड़ा हो तो कही ना कही हमारी रूचि और भी बढ़ जाती है | कैरम आज भी हमारी ज़िन्दगी का ही एक हिस्सा है जो अल्प रूप में ही सही पर अपने अस्तित्व को बनाये हुए है | आज भी ये खेल इनडोर खेलों में बच्चों की और बच्चे ही क्यूँ बड़ों की भी पहली पसंद है |  आज भी गर्मियों की छुट्टियों में धूल से बाहर आता कैरम हर  घर में देखा जा सकता है |
                                                         तो चलो क्यूँ ना इस बार फिर गर्मियों की छुट्टियों में अपने बचपन की यादें ताज़ा करें | और हो जाये एक मैच !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

 
 

Saturday, March 19, 2011

HAPPY HOLI TO ALL BLOGGERS...............

सभी ब्लोगर्स को होली की हार्दिक शुभकामनायें |||||||||||||||


Monday, March 14, 2011

माँ पाली नहीं जाती !!!

औलादों से अब ये ज़िम्मेदारी संभाली नहीं जाती ,
चार-चार बेटों से मिलकर अब एक माँ पाली नहीं जाती ||  

ये कोई व्यंग्य नहीं है बल्कि इस समाज की एक ऐसी सच्चाई है जिसे आज चाह कर भी नकारा नहीं जा सकता | हमारे समाज में एक ऐसी ही जगह है जिसे देखकर  किसी और का तो मै नहो जानती पर हाँ मेरा मूड ज़रूर ख़राब हो जाता है | ऊपर लिखी दो पंक्तियों से आप में से ज़्यादातर  लोग तो समझ ही गए होंगे | जी हाँ मै बात कर रही हूँ   ओल्ड ऐज होम  यानि कि  वृद्ध आश्रम  की | इस स्थिति पर और भी ज्यादा गुस्सा तब आता है जब हमारा समाज   अतिथि देवोभव   और  वसुधैव कुटुम्बकम  की बात करता है | 

                                  


                                                             जब भी देश के समृद्ध लोग बड़े बड़े मंच पर खड़े होकर इन विषयों पर लम्बे और तथाकथित प्रवचन रुपी भाषण देते हैं तो सच में मेरा मन यही करता है कि अभी इन लोगों के घर में जाऊं और देखूं  कि दूसरों के हित कि बनावटी बात सोचने वाले इन लोगों के घरों में खुद इनके माँ बाप कितने खुश और सुखी हैं |
                                       हर साल देश में कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहे ये वृद्ध आश्रम इस बात का साफ़ संकेत दे रहे हैं कि अब  बूढ़े माँ बाप के लिए उन्ही के अपने घर में कोई जगह नहीं है | इस दुखद स्थिति कोई एक वजह नहीं है | घर के बुजुर्गों के अपने घर को छोड़ कर जाने या उन्हें जबरन आश्रम पहुचाये जाने कि कई वजहें  हैं |  फिर चाहे वो बढ़ता पारिवारिक कलह हो या बेटे बहू दोनों का वर्किंग होना , आर्थिक परेशनी हो या मात्र सिर्फ विचारों का मेल न खाना | वजह चाहे कोई भी हो पर झेलना तो अंततः सिर्फ एक को ही पड़ता है और वो हैं घर के बुज़ुर्ग |


                   तकलीफ तो होती ही होगी कि कल किस तरह से एक एक पाई जोड़कर ये घर बनवाया था , ये सोच कर कि बुढ़ापे में नाती पोतों के साथ चैन से ज़िन्दगी गुजेंगे और इसी घर कि देहरी से आखिरी रुखसती भी लेंगे | पर नहीं , अब इस घर कि दीवारें ही उनसे कहने लगती हैं कि भाग जा , भाग जा कही ! किसी ऐसी जगह जहां कम से कम तू चैन से मर तो सके | 
           घर के आंगन में पत्नी की लगाई गयी हरी भरी तुलसी भी अब पूरी तरह से सूख गयी है |  ऐसा लगता है की मनो वो भी मुझसे कह रही हो की बस अब और नहीं रहना यहाँ | चलो मुझे भी कहीं और ले चलो |  
          पता नहीं किस पाप का खामियाजा भुगत रहा है बुढ़ापा ? परिस्थितियां तब और भी ज्यादा तकलीफदेह हो जाती हैं जब ज़िन्दगी के कई बसंत एक साथ देख चुके ये बुज़ुर्ग अचानक एक दूसरे का साथ छोड़ देते हैं | इतनी लम्बी दोस्ती का यूँ इस तरह खत्म होना उस दूसरे सदस्य को पूरी तरह से तोड़ देता है | 
                                            कुछ वक्त तो शायद यकीं भी नहीं होता होगा की हमारा सबसे पुराना दोस्त हमें छोड़ कर चला गया | पर वो बूढी हड्डियाँ वक्त के साथ समझौता करतीं हैं और एक बार फिर अपने भविष्य को अपने बच्चों और नाती पोतों में ढूँढने लगती हैं | पर नहीं उनकी ये सोच गलत साबित होती है उनका भविष्य उन्हें बड़े ही तीखे अंदाज़ में ये बता देता है की वो अब सिर्फ उनपर एक बोझ हैं जिसे वो ना चाहते हुए भी ढो रहे हैं | हर रोज़ की कलह , हर रोज़ के ताने | हर सवेरे ये अहसास दिलाना की या तो वो बहुत पीछे छूट गए हैं या फिर हम बहुत आगे निकल गए हैं | 
                                                                   कभी दादी नानी के मूंह से किस्से सुनाने वाले इस समाज में अब दादी नानी ही किस्सा बन कर रह गए हैं | संयुक्त परिवार की प्रथा अब यदाकदा ही देखने को मिलाती है | मेरी उम्र 28 साल है और मै यकीन के साथ कह सकती हूँ मेरी पीढ़ी शायद वो आखिरी पीढ़ी होगी जिसने दादी दादा और नाना नानी का भरपूर सुख लिया होगा | आज से औसतन 10 से 15 साल बाद जब एक नयी पीढ़ी अपना होश संभालेगी तब तक ये रिश्ते कहीं दूर बहुत दूर खो जायेंगे | 
                             
              
मेरी नानी माँ
         
                        साल 2010 , 11 मई ये वो दिन था जब मैंने अपनी नानी को खोया था, उनकी डेथ के बाद मेरी ये सोच  पूरी तरह से यकीन में बदल गयी कि एक बुजुर्ग ना सिर्फ किसी परिवार कि नीव होता है बल्कि उस परिवार कि ऐसी डोर भी होता है जो पूरे परिवार बो बंधे रखता है |    
             समाज में आज यही वर्ग बेहिसाब उपेक्षा का शिकार हो रहा है | नतीजा परिवार से तंग आकर या तो वो खुद ही वृद्ध आश्रम चला जाता है या उसकी अपनी औलादें उसे वहां  छोड़ आतीं हैं | एक वृद्ध आश्रम में एक प्रोजेक्ट के दौरान जाने पर ये सारी परिस्थितिया खुद ब खुद मेरे सामने आ गयीं | वहां मौजूद हर बुज़ुर्ग सिर्फ अपना अंत मांग रहा था | हर आंख में आंसू था हालाँकि वहां सेवारत लोग उनकी भरपूर सेवा कर रहे थे | पर वो सब अपने जैसे थे अपने नहीं |   उनकी आँखों में परिवार कि भूख साफ़ दिख रही थी | 

                               
                        सच कहूं तो समझ ही नहीं आता कि ये कैसी तरक्की है जो ऐसे बढते हुए वृद्ध आश्रमों से आंकी जाती है , ये कैसी तरक्की है जो इन बुजुर्गों के आसुओं पर तैर कर आगे बढ़ रही है | क्यूंकि अगर ये तरक्की है तो मेरी ईश्वर से सिर्फ एक ही दुआ है कि मुझे हमेशा  पिछड़ा ही रखना | 

Tuesday, March 8, 2011

HAPPY WOMEN'S DAY ??????????????????????

         आज पूरे विश्व में महिला दिवस मनाया जा रहा है | आज के दिन       खास तौर     पर महिलाओं को सम्मान दिया जाता है | इस शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया क्यूंकि आज से पहले और आज के बाद महिलाओं का क्या हाल है ये मैं कुछ दिखाकर बताऊंगी | 
 आज पूरे विश्व के लगभग सभी अख़बारों, चैनल्स और संचार के सभी माध्यमों में सब कुछ सकारात्मक ही दिख रहा है | किरण बेदी , कल्पना चावला , इंदिरा गाँधी , मदर टेरेसा और ना जाने  कितनी विख्यात महिलाओं की तस्वीरें आज हर जगह दिखेंगी | पर क्या हकीकत यही है ?
इससे पहले आपके दिमाग में कुछ और आये  पहले कुछ देखिये , कुछ ऐसा जो मैंने खासतौर पर आज के लिए बनाया है |  देखिये --------------

video


          क्या अब भी आप कहेंगे ' Happy Women's Day ' | किस हक से ? कोई हक नहीं है हमें ये कहने का , कम से कम तब तक तो बिल्कुल भी नहीं जब तक ये तस्वीरें बदल नहीं जातीं |
                            एक बार फिर सोचिये और तब फैसला कीजिये !!!!!!!!!




             (नोट)- कृपया ऊपर दिखाए गए वीडियो को पूरी तरह से  डाऊनलोड  करके  ही देखें |
 

Sunday, March 6, 2011

माँ सब जानती है

 
                              '' मैं कभी बतलाता नहीं , पर अँधेरे से डरता हूँ मैं माँ ,
                                यूँ तो मैं दिखलाता नहीं , तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ ,
                                तुझे सब है पता है न माँ , तुझे सब है पता मेरी माँ |''

                        बहुचर्चित फिल्म 'तारे ज़मीन पर ' का ये गीत हर बच्चे के जीवन का एक एसा सार्वभौमिक सत्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता | सच है!  ' माँ को सब पता होता है' | 
                  जन्म के तुरंत बाद नए  नए हांथो का वो पहला स्पर्श  जो याद तो शयद किसी को नहीं पर महसूस सब कर सकते हैं | जोर जोर से धड़कता हुआ एक दिल जब इस दुनियां में आता है और उन हांथो में सौपा जाता  है  जिसकी वजह से  वो है , उस वक्त उस दिल की धड़कने अपने आप ही सामान्य हो जाती हैं , मानो एक जड़ से उखाड़े पौधे को फिर से ज़मीन मिल गयी हो | शांत भाव से वो नयी चमकदार ऑंखें उस चेहरे को को देखने और समझने का प्रयास करतीं हैं , जिसे अब तक उसने सिर्फ महसूस किया था | एक अजीब सा एहसास है शायद ! आश्चर्य से भरी वो ऑंखें यही सोचतीं हैं की ये कौन हैं ? कौन है ये, जो नया तो है पर ना जाने क्यूँ  जाना पहचाना सा लगता है , ऐसा क्यूँ लगता है की ये तो वही है जो मेरे होने का प्रमाण है , मेरे अस्तित्व की वजह है | क्या अगर ये चेहरा नहीं होता तो मैं भी नहीं होता? न जाने कितने ऐसे सवाल उस नए ह्रदय और मस्तिष्क में चल रहे होते हैं | लेकिन वो अबोध समय दर समय इन सवालों के जवाब खुद ही खोज लेता है | 
                                                        वक्त  बीतता चला जाता है और समय       साथ साथ  ये रिश्ता और भी मज़बूत होता चला जाता है | याद है स्कूल का वो पहला दिन जब मन इस डर से भरा रहता है की अब माँ को छोड़कर जाना है | 
माँ के हांथों को मज़बूती से पकडे वो कोमल हाँथ जैसे अपनी सारी ताकत लगा देतें हैं खुद को उस शरीर से जोड़े रखने के लिए |
                                                               रात के आंचल में माँ का वो कुछ गुनगुनाकर सुलाना और हमारा ये जिद करना कि  'माँ कोई कहानी सुनाओ ना ' | वो सब कितना पाक़ था कितना खूबसूरत था | उस वक्त वो कहानियाँ कितनी सच्ची लगतीं थीं |  मशहूर गीतकार जावेद अख्तर के शब्द सही ही कह रहे हैं कि 
           ' मुझको यकीं है सच कहती थी , जो भी अम्मी कहती थी ,
             जब मेरे बचपन के दिन दिन थे चाँद में परियां रहतीं थी |'
   
 

            वक्त बीतता जाता है और हम बड़े होते जाते हैं | घर से स्कूल , स्कूल से कॉलेज वक्त तो मानो पंख लगा कर भागता है | लेकिन हर बार मन में एक सुकून का एहसास होता है कि हमारी माँ हमारे साथ है | मेरी तरफ आने वाली हर मुसीबत , हर तकलीफ को पहले मेरी माँ के                               मज़बूत सीने से होकर गुज़ारना पड़ेगा |  हम हमेशा सुरक्षित हैं क्यूंकि हमारी माँ है |

  ' घोंसले में आई चिड़िया से चूजों ने पूंछा ,
    माँ आकाश कितना बड़ा है ?
   चूजों को पंखों के निचे समेटती बोली चिड़िया ,
   सो जाओ , इन पंखों से छोटा है |
    
  सारी माएं ऐसी ही तो होतीं हैं | हर बार रह दिखाती हुयी , हर बार समझाती हुई और हर हमारी गलतियों पर पर्दा डालती हुई |
    मशहूर शायर 'मुनव्वर राणा' के अल्फाजों में ----
     ' जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आती है 
       माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है |'

    दूर होने पर भी एक एहसास हम दोनों को जोड़े रखता है | खास तौर पर उस वक्त जब लगता है कि कोई भी अब साथ नहीं है , हम पूरी तरह से मुसीबत में घिर चुके हैं | तब एक माँ ही तो है जो साथ ना होकर भी हमेशा  साथ रहती है |  निदा फ़ाज़ली के शब्दों में ---' मैं रोया परदेस में , भीगा माँ का प्यार ,
                                                                  दुःख ने दुःख से बात कि बिन चिठ्ठी बिन तार |'

      घनघोर रात के साये में जब हम अकेले बैठे सोच रहे होतें हैं, रो रहे होतें हैं , खुद से सवाल कर रहे होते हैं और माँ को याद कर रहे होते हैं, तभी अचानक फोन कि घंटी बजती है और उस पार से आवाज़ आती है ---------" बेटा कैसे हो , ठीक तो हो ना , कोई तकलीफ तो नहीं है | तबियत तो ठीक है ना , आज जी बहुत घबरा रहा था , एसा लग रहा था कि मानो मेरे कलेजे का टुकड़ा किसी मुसीबत मे है, बोल बेटा तो ठीक तो है ना " ? 
  जवाब मिलता है ---" मै ठीक हूँ माँ, अब वाकई में ठीक हूँ , तुम मेरे साथ हो ना , तो सब अपने आप ही ठीक हो जायेगा , तुम बिलकुल चिंता मत करो सब ठीक है" |          भरे गले से कहा ---" माँ आवाज़ साफ़ नहीं आ रही है बाद में फ़ोन करते है |"  
     फ़ोन का रिसीवर रखकर अपने आंसू पोंछते हैं और खुद से ये सवाल करते हैं  कि माँ के गर्भ से बहार आये हुए तो कई बरस हो गए लेकिन सच तो ये है कि आज भी हम पूरी तरह से अलग नहीं हो पाए हैं |
 

   मुसीबत के ऐसे पलों में माँ के वो चन्द शब्द ऐसा एहसास दिला देते हैं कि लगता है कि एक ही पल में सब कुछ ठीक हो जायेगा | हमारी सारी मुसीबतें अपने आप ही भाग जाएँगी | ऐसा लगता है कि जैसे माँ का ममता और आशीर्वाद भरा हाँथ सिर पर रख दिया और सारी परेशनियाँ छूमंतर |

             ' माँ '  एक ऐसा रिश्ता जो हर रिश्ते से कम से कम नौ माह पुराना होता है | एक रिश्ता जो पहली धड़कन से शुरू होकर आखिरी साँस तक        चलता है | एक ऐसा रिश्ता जो हर वक्त हमारे स्थ होता है चाहे हम जहाँ भी रहें | एक ऐसा रिश्ता जो न जाने कैसे जान जाता है कि आज हम मुसीबत में हैं | 




 ' मेरी तकलीफ को मुझसे पहले कैसे पहचान लेतीं है वो,
  कुछ उलझन है मुझे ये कैसे मान लेतीं है वो ,
                                               खुद के ग़मों को तो होंठों तक आने देती नहीं हूँ मैं,
                                               क्या धड़कन से ही सब कुछ ही जान लेतीं हैं वो |"

                 
        सच कहूं तो आज तक समझ नहीं पाई कि कैसे कर लेतीं हैं वो ये सब ?  शायद  इसीलिए क्यूंकि अभी मैं सिर्फ एक बेटी हूँ माँ नहीं |   

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