Sunday, February 27, 2011

तो ये क्यूँ नहीं

' छोटू चाय लाना '  बेहद आम से लगाने वाले ये शब्द आज बड़े और विकसित शहरों में हर पचास कदम पर सुनाई दे जायेंगे | केवल इतना ही नहीं दूसरी तरफ से एक मासूम सा जवाब भी आयेगा ' लाया साहब ' | और साहब के चहरे पर ऐसी गर्वपूर्ण मुस्कान की मानो आगामी चुनावों में निर्विरोध प्रधानमंत्री चुन लिए गए हों या भारत पाक सीमा विवाद पर विजय हांसिल कर ली हो | पर साल में ऐसा कुछ नहीं होता |

              हर बार जब भी कभी देश के विकास या किसी भी प्रकार के बदलाव की बात होती है तो हम सीधे सरकार पर निशाना साधते हैं | चाय की चुस्कियां लेते हुए सरकार की गलतियां गिनवाते हैं | हर बार ये कहते है की इस देश का कुछ नहीं हो सकता | अशिक्षा , बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार पर घंटों चर्चा करते हैं , इस दौरान हम छोटू से तीन चार बार चाय भी मंगवाते हैं | हर बार वो चाय के गिलास मेज़ पर रखता है और अपनी अधूरी आँखों से आपको देखता है और शायद ये समझने की कोशिश करता है की आखिर इतनी देर से बहस हो किस विषय पर रही है |  पर उसे कुछ समझ नहीं आता और वो वहां से कुछ गुनगुनाता हुआ चला जाता है | चर्चा अभी भी नही रुकती और रुके भी क्यूँ आखिर देश को सुधारने का बीड़ा जो उठाया है | 
   
लेकिन ये समाज शायद ये भूल गया है की वो खुद ही तो इसे बढावा दे रहे हैं | छोटू से चाय मंगाकर समाज की एक बहुत बड़ी समस्या को हम खुद ही तो बढावा दे रहे हैं | फिर चाहे वो अज्ञानतावश हो या चढ़ पैसे बचने के लालच मैं पर दोषी तो हम हैं ही |
            एक प्रतिष्ठित चाय के विज्ञापन के  'जागो रे ' जैसे स्वर हमें कुछ देर के लिए तो जगा ही देते हैं | सही ही तो कहा है उस विज्ञापन में की लोग घूस क्यूँ खाते हैं क्यूंकि हम खिलाते हैं |  लेकिन इसी कंपनी के एक अन्य विज्ञापन में  कुछ सामान अभी भी छोटू ही ला रह है |



video

अरे भाई भ्रष्टाचार , घूसखोरी और आतंकवाद से तो बहुत निपट लिए  पर बालश्रम की समस्या पर कब विचार करेंगे, तब जब इस देश में बाल ही नहीं रहेंगे या तब जब ये बाल खुद ही न्याय के लिए आवाज़ उठाएंगे |
            हर बार बाल दिवस जैसे किसी मौके पर हम थोड़ी देर के लिए चिर निद्रा से जागते हैं पर 24 घंटे बीते नहीं की हम फिर दीर्घ निद्रा मे चले जाते है अगले बाल दिवस की तैयारी में |
                                          
                                              देश के सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले पन्नों यानि की हमारे संविधान में भी बाल श्रम का विरोध करने वाला अनुच्छेद 24  है | जिसमे 14 साल से कम आयु के बच्चों को किसी परिसंकटमय  परिस्थितियों या अमानवीय परिस्थितियों में काम का विरोध किया गया है | पर संविधान में लिखी गयी बातों का कितना पालन होता है यह सर्वविदित है |
                देश में वर्ष २००१ के आंकड़ों के मुताबिक बाल श्रमिकों की संख्या कुछ इस प्रकार है :-

      
                     State-wise Distribution of Working Children according to 2001 Census                                                            age group 5-14 years


Name of the State/UT

Working children/2001

Andhra Pradesh
1363339

Arunachal Pradesh
18482

Assam
351416

Bihar
1117500

Chhattisgarh
364572

Delhi
41899

Goa
4138

Gujarat
485530

Haryana
253491

Himachal Pradesh
107774                              

Jammu & Kashmir
175630

Jharkhand
407200

Karnataka
822615

Kerala
26156

Madhya Pradesh
1065259

Maharashtra
764075

Manipur
28836                          

Meghalaya
53940

Mizoram
26265

Nagaland
45874                  

Orissa
377594

Punjab
177268

Rajasthan
1262570

Sikkim
16457

Tamil Nadu
418801

Tripura
21756

Uttar Pradesh
1927997

Uttarakhand
70183

West Bengal
857087

Andaman & Nicobar Island
1960

Chandigarh
3779

Dadra & Nagar Haveli
4274

Daman and Diu
729

Lakshadweep
27

Puducherry
1904

Total
12666377
     
                               पर आज एक  प्रश्न जो मैं सामने रखना चाहती हूँ वो यह है कि अगर केवल इसी परिस्थितियों में काम करने वाले ही बाल श्रमिक हैं तो चाय लाने वाला छोटू बाल श्रमिक नहीं है क्यूंकि वो सिर्फ चाय लाता है और वो कोई परिसंकटमय  स्थिति नहीं है |  लेकिन अगर  चाय  वाला  छोटू बाल श्रमिक है तो फिर यक़ीनन और भी बहुत से बच्चे हैं जो इस श्रेणी में है फिर चाहे वो बालिका वधु की 'आनंदी ' हो या फुलवा की 'फुलवा ' , तारे ज़मीं पर का 'दर्शील सफारी' हो या फिर कोई और  बाल कलाकार  |   हकीकत में ये सब भी  तो बाल श्रमिक हैं | तो फिर इनपर कोई प्रतिबन्ध क्यूँ नहीं लगाया जाता | क्यूंकि ये सभी  तो सिर्फ धनार्जन के लिए ही तो काम  करते है | सवाल थोडा अजीब है पर यक़ीनन गलत नहीं है |

                                             




आज भी 1500 डिग्री के तापमान पर खौलते कांच को ढोने वाले और खतरनाक रासायनिक घोलों में नंगे हाँथ डुबोकर तालों के लिए धातु के टुकडे तैयार करने वाले  बच्चों से लेकर यौन शोषण को मजबूर सभी वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं |  फिर चाहे वो शिवकाशी का आतिशबाजी का उद्योग हो या सूरत का हीरा पॉलिश,  मिर्ज़ापुर और भदोही का गलीचा उद्योग हो या जयपुर का पत्थर का उद्योग | ये सभी वो जगहें हैं जहाँ आज भी बिना किसी भय के बाल श्रम देखा जा सकता है |         


                  




                         परिस्थितियां तब और भी ज्यादा घिनौनी लगाने  लगाती हैं जब हम देश के गणमान्य  नेताओं को देश की उन्नति का बखान करते हुए सुनते हैं | समझ से परे है की ये कैसा विकास है जहां देश का भविष्य ही शोषण की त्रासदी झेल रहा है | हम आखिर इस शोषित समाज से विकास की उम्मीद कर ही कैसे सकते हैं | हालाँकि इस दिशा में कुछ गैर सरकारी संस्थाओं ने कुछ काम ज़रूर किया है पर वो नाकाफी है |  

  



      यक़ीनन अब ज़रुरत है इस दिशा में कुछ बड़े कदमों की ताकि इस मासूम बचपन को ख़त्म होने से बचाया जा सके और देश के विकास के मार्ग को किसी भी प्रकार के अवरोध से बचाया जा सके |






                                              



                                                 
                                                 'यूँ तो सब कुछ दिया तुने मेरे खुदा मुझको ,
बस इतनी ख्वाहिश मेरी और पूरी कर दे ,
मेरी ज़िन्दगी में गर कुछ पल हों खुशियों के ,
उसे किसी बेसहारा बच्चे के नाम कर दे' |||  
  

8 comments:

यशवन्त माथुर said...

बहुत ही विचारणीय लेख.आंकड़ों से लेख की रोचकता और सार्थकता बढ़ गयी है.

Vijai Mathur said...

आपकी तथ्यात्मक जानकारी अनुपम है.फिलहाल वर्मान शासन-व्यवस्था से इसमें सुधर की कोई उम्मीद नहीं है.
केवल जनता ही पहल करे तभी बात बनेगी.

Vivek tripathi said...

Gud job done krati

आशीष मिश्रा said...

सोचने को विवश करती हुई पोस्ट
सचमुच बालश्रम एक अभिशाप है जिससे देश को मुक्ति दिलाना परम आवश्यक है.

सुबीर रावत said...

बाल श्रम पर एक उम्दा पोस्ट. बारामासा पर आपने अपने को नौसिखिया कहा है किन्तु कृति जी ! यह पोस्ट तो आपकी परिपक्वता को दर्शाती है. दिए गए आंकड़े आपके लेखन की पुष्टि करते हैं. ........ बारामासा की फोल्लोवेर बन कर आपकी फोटो बारामासा पर डिस्प्ले तो नहीं हुयी. पर हम बिन बुलाये मेहमान की तरह आपके ब्लॉग पर अवश्य हाज़िर हैं.......... इसी भांति स्तर बनाये रखें. इन्ही शुभकामनाओं के साथ .

सुबीर रावत said...

बाल श्रम पर एक उम्दा पोस्ट. बारामासा पर आपने अपने को नौसिखिया कहा है किन्तु कृति जी, यह पोस्ट तो आपकी परिपक्वता को दर्शाती है. दिए गए आंकड़े आपके लेखन की पुष्टि करते हैं. ........ बारामासा की फोल्लोवेर बन कर आपकी फोटो बारामासा पर डिस्प्ले तो नहीं हुयी. पर हम बिन बुलाये मेहमान की तरह आपके ब्लॉग पर अवश्य हाज़िर हैं.......... इसी भांति स्तर बनाये रखें. इन्ही शुभकामनाओं के साथ .

Patali-The-Village said...

सचमुच बालश्रम एक अभिशाप है जिससे देश को मुक्ति दिलाना परम आवश्यक है|

अभिषेक मिश्र said...

महत्वपूर्ण विषय उठाया है आपने, और बाल दिवस जैसे रस्मी आयोजनों की बेला का इंतजार किये बिना. शुभकामनाएं.

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...