Tuesday, February 22, 2011

केवट कि नैया खतरे में






 रामायण  काल में एक बेहद ही रोचक और महत्वपुर्ण किरदार था 'केवट'. भगवान् श्री राम जब माता सीता के साथ वनवास को जा रहे थे, तब सरयू नदी में नाव चलाने वाला यह किरदार खुद भगवान् की नाव पार लगाता है. रामायण का वह किरदार आज भी जिंदा है, हाँ शायद समय के साथ उसका नाम बदल गया है, पर आज भी उसका  काम वही है, लोगों की नाव पर लगाना.
                         कानपुर शहर का गंगा कटरी एक ऐसा इलाका है जहां आज भी सिर्फ नाव चलाने वाले मल्लाहे ही रहेते हैं. इस इलाके में काफी बढ़ी संख्या में ऐसे ही परिवार रहते. आज से कुछ दशक पहले तक तो यहाँ की  परिस्थितियाँ काफी हद तक ठीक थी पर आज परिस्थितियाँ बेहद ही खराब हैं, हर साल चुनावी समर के पहले यहाँ कुछ देर के लिए माहौल थोडा ठीक होता है पर कुछ दिनों बाद ही सुब कुछ पहेले जैसा हो जाता है. वही भूख से बेहाल बचपन, वही बेरोजगार युवा, और वही बदहवास बुढापा. गंगा कटारी के इस इलाके में आज भी मल्लाहे सिर्फ और सिर्फ नाव चला कर ही अपना गुज़र बसर करते हैं, पर  आज के समय में इन परिवारों का बसर अब मुश्किल हो गया है. इन लोगों के पास अब दो वक़्त की रोटी भी नहीं है, हालाँकि कुछ लोगों का मानना है की कटरी के इस इलाके में कुछ गलत कारोबार भी होते हैं, पर ऐसा कुछ साफ़ तौर पर सामने नहीं आया. यहाँ रहेने वाले लोगों से बात करने के बाद पता चला की आखिर इनकी ज़िन्दगी अब कितनी मुश्किल हो गई है. नाव चलाने वाले यह मल्लाहे अब शहर आकर मजदूरी करने को मजबूर हैं. उनका यह साफ़ यह कहना है की दो वक़्त की रोटी के लिए वह यह करने पर  मजबूर हैं. सरकार पर भी सीधा निशाना साधते हुए उन लोगों ने यह साफ़ कहा की उन्हें कभी भी सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली.
          माननीय कांग्रेस युवराज श्री राहुल गाँधी जोकि युवा नेता हैं उनसे  इन लोगों का साफ़ कहना है की एक बार आकर इस इलाके की स्थिति ज़रूर देखें. सरकार द्वारा हाल ही में चुनाव पहचान पत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन करने की बात कही गयी थी, पर क्या किसी ने यहाँ आकर एक बार भी ये पता लगाने की कोशिश की कि क्या इन लोगों को कंप्यूटर क्या होता है यह भी पता है? शायद नहीं ! 
           सरकार हर बार चुनावों से पहले तकनीकी और आर्थिक विकास कि बात करती है, वह हर बार यह कहती है कि देश बहुत तरक्की कर रहा है. किस आधार पर? क्या उन्हें इसे इलाके दिखाई नहीं देते या फिर कुछ चमकदार इलाकों के चक्कर में ये इलाके कहीं छुप जाते हैं. हम क्यूँ भूल  जाते हैं कि आखिर सरकार चुननेवालों  में से आधी से ज्यादा आबादी तो ऐसे ही लोगों कि है. याद रहे कि अगर आगामी चुनावों से इसे लोगों ने हाथ खीच लिया तो केवल कुछ बड़े उद्योगपतियों के वोटों से चुनाव नहीं जीता जा सकता. 
              कटरी के इस इलाके में भुखमरी का यह हाल है कि मल्लाहों के बच्चे नदी पार आये भक्तों द्वारा नदी में फेके गए चन्द रुपयों  के लिए अपनी ज़िन्दगी को खतरे में डालने से भी नहीं चूकते. आधे अधूरे पेट सो रहा यह इलाका अब अच्छे दिन भी देखना चाहता है.
                 कभी भगवान् श्री राम को सरयू पार करनेवाला ये पौराणिक अब अपनी खुद कि नाव पार नहीं लगा  पा रहा है. अपना पुश्तैनी काम देखने वाला यह समाज अब यह नहीं जानता कि उनकी आगे आने वाली पीढ़ी अपना भरण पोषण कैसे  करेगी , क्या होगा उनके परिवार और उनके बच्चों का ?
                 धार्मिक संस्कारों, परम्पराओं और मान्यताओं के इस देश में नदियों  के इस राजा कि स्थिति आज बेहद ख़राब है. लिहाजा समाज का ये वर्ग अब मांग कर रहा है 'सोशल जस्टिस' यानी 'सामाजिक न्याय' कि. ये समाज एक बार फिर आशा करेगा कि इससे पहले कि इस चुनावी समर कि खुमारी चढ़ कर उतर भी जाये जल्द से जल्द इस इलाके का कुछ न कुछ विकास तो हो ही जाये. ताकि देर से ही सही पर इस केवट कि नैया पार तो लग ही सके.           

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