Tuesday, February 22, 2011

पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं !


                                   " पापा लाइए 500 रुपये दीजिये , अभी कल ही तो दिए थे 500 उनका क्या हुआ  ? खर्च  हो गए पापा, फ्रेंड्स के साथ घूमने गया था | 500 रुपये एक ही दिन मे खर्च हो गए? बेटा बड़ी मेहनत का पैसा है इसे मत उडाओ, पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं |"


         बेहद आम से लगाने वाली ये लाइने आज शायद हर दूसरे घर मे सुने देती हैं | खासतौर पर वहां जहाँ बच्चे, युवा या किशोर होंगे | युवाओं से भी अगर इस विषय पर बात करेंगे तो उनका साफ़ तर्क होगा कि क्या करें    महंगाई ही इतनी बढ़ गयी है कि छोटी मोटी पार्टी मे ही दो चार हज़ार खर्च हो जाना आम है | कोई उन्हें ये क्यूँ नहीं समझता कि ज़रूरी नहीं कि पार्टी मैं पिज्जा, बर्गर और बियर ही हो, समोसे और नीबू पानी से भी तो पार्टी हो सकती है | लेकिन नहीं भाई इज्ज़त का सवाल है | दोस्तों ने अगर पिज्जा पार्टी दी है तो हम समोसे से केसे कोम्प्रोमयिज़ कर ले |  बेईज्ज़ती हो जाएगी  भाई |

          आज के समय मे ये सब कुछ लगभग हर मध्यम वर्गीय परिवार में देखा जा सकता है | आज की ये शोपिंग माल जनरेशन दस हज़ार कि ड्रेस मॉल  से ले लेगी पर वाही ड्रेस दो हज़ार मे थोक मार्केट से लेना गवारा नहीं है | अरे किसी फ्रेंड ने देख लिया तो कितना ख़राब लगेगा | उन्हें ये कौन समझाये कि बेटा अगर वही दोस्त तुम्हे मॉल से कुछ खरीदता हुआ देख लेगा तो तुम्हे कि नोबेल पुरस्कार नहीं मिल जायेगा | पर नहीं , आज कि पीढ़ी को ये सारी बातें सिर्फ बड़े बूढों  का प्रवचन ही लगतीं हैं | जिनका उनके हिसाब से आज के समय में इनका  कोई उपयोग नहीं है, सब बेकार की बातें हैं |

           छोटे बच्चों में भी बचत और सेविंग्स की आदतें अब यदा कदा ही दिखती हैं | दशकों पहले आई 'गुल्लक' परंपरा का नाम बदल कर आज पिगी बैंक ज़रूर हो गया है, पर बच्चों में अपनी गुल्लक में कुछ न कुछ डालते रहने की आदत अब ना के बराबर ही रह गयी है |


            पुराने समय में मनुष्य अपने भविष्य या असल का सामना करने के लिए अपनी ज़रूरत की चीजों को इकठ्ठा करने के बारे में सोचता था | मानव के इसी स्वभाव ने ही उसमे बचत जैसी आदत की नीव डाली | धीरे धीरे ये आदत रुपये पैसे में तब्दील होने लगी | मनुष्य धातु के बने विशेष पात्रों में अपनी बची मुद्रा को रखने लगा | बचत को सुरक्षित रखने की इसी आदत ने ही गुल्लकों और तिजोरियो को जन्म दिया |




   

 गुल्लकों का इतिहास लगभग 2000 साल पुराना है |  गुल्लक का सबसे पुराना नमूना एशिया के पश्चिमी छोर वाले प्रायदीप के यूनान नगर 'प्रथीनी' से मिला है | जिसका समय ईसा पूर्व पहली या दूसरी शताब्दी आँका गया है|  दक्षिणी इटली की छोटी छोटी जगहों और राइन नदी के पश्चिमी तटवर्ती इलाकों में रोमन युग के गुल्लक भी मिले हैं | इन गुल्लकों के गोलाकार होने के बारे में ये कहा जाता है की इसका सम्बन्ध माता के स्तनों से है, जो की उर्वरता के प्रतीक हैं |        

                                          ज्यादातर ये देखा गया है कि बच्चे गुल्लक को इसलिए पसंद करते हैं , क्यूंकि उन्हें अपनी बचत सुरक्षित रखने में एक तरह का मनोवैज्ञानिक सुकून मिलता है | पहले के समय में ये गुल्लकें जन्मदिन में तोहफे के रूप में दी जातीं थी | परिवारों में पारंपरिक गुल्लकें रखने का भी चलन रहा है | आज भी अलग अलग क़िस्म कि गुल्लकें बाज़ारों में देखी जा सकती हैं |
              लेकिन समय के साथ साथ बच्चों में ये आदत अब ख़त्म होती जा रही है | वो अब खुद की गयी बचत के महत्व और ख़ुशी को भूलते जा रहे हैं | महानगरीय  परिवारों में तो बच्चों को मिलने वाली पाकेटमनी अब शायद ही बचत तक पहुंचती हो |  लेकिन इसमे दोष सिर्फ बच्चों को ही देना गलत है, बच्चे तो सिर्फ फ़ॉलो करते हैं | जब तक वो किसी अन्य को गुल्लक में कुछ डालते हुए नहीं देखेंगे , शायद ही इसकी ख़ुशी या महत्व को समझ सकेंगे |


    पापा मम्मी कि शादी की सालगिरह पर अपनी गुल्लक तोड़ना, फिर उसमे से पैसे निकाल कर गिनना और फिर ये सोचना कि इतने पैसे में क्या आयेगा ! इन सब चीजों से जुडी ख़ुशी न सिर्फ बच्चों के चहरे पर बल्कि माता पिता के चहरे पर भी साफ़ तौर पर देखी जा सकती थी | लेकिन आज आपका बच्चा कौन सी गुल्लक तोड़े, अपने उसे तोड़ने के लिए कोई गुल्लक दी ही नहीं है | वो असल में जानता ही नहीं है इस मज़े का स्वाद |


 आज बहुत ज़रुरत है बच्चों में इस आदत को पुनः वापस लाने की | उन्हें ये अहसास दिलाने की कि इस आदत का अपना ही मज़ा है | उन्हें ये अहसास दिलाने की कि उनकी ये आदत उन्हें किस तरह से दूसरों से अलग कर सकती है | वरना कहीं ऐसा न हो कि आगे आने वाली पीढ़ी तक पहुँचते  पहुँचते ये ख़ुशी सिर्फ अतीत कि कहानियों में सिमट कर रह जाएगी और तब ये 'गुल्लकें' शायद किसी म्यूजियम तक ही सिमट कर रह जाएँगी |
 

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