Tuesday, February 22, 2011

काठ की बनी मैं

           
                                पिछले कई दिनों से ब्लॉग पर जो भी लिख रही थी वो कहीं न कहीं ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मो जैसा था | जिसे जानते तो सब है पर शायद देखना कोई नहीं चाहता | तो सोचा कि आज कुछ ऐसा लिखती हूँ जो ढेर सारे रंगों से भरा हो और जिसे सब पढ़ना चाहे | इससे पहले मैं कुछ लिखूं आप----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- 


                      पहले कुछ देखिये -------------------------------------------------------



कुछ याद आया , शायद नहीं, आयेगा भी कैसे , इससे पहले इस तरह का कुछ देखा भी तो नहीं है, कभी कोशिश ही नहीं कि देखने की और देखते भी कैसे थ्रीडी और फोर्डी गेम से बाहर निकालें तो इन पर ध्यान देंगे न |
                                असल मैं ये है हमारा भारत ,हमारा असली भारत | वो भारत  जो खूबसूरत है, शानदार है, और नायाब है | हमारे देश की असली सुन्दरता तो हमारी लोक और पारंपरिक कलाएं हैं | वो कलाएं जो कहीं न कहीं अब विलुप्ति की कगार पर हैं और हमारे जैसी युवा पीढ़ी से ये कह रही हैं की बचा लो बचा लो हमे, हम नष्ट नहीं होना चाहते हैं | और हमारा ये फ़र्ज़ है की हम अपने देश की धरोहरों को नष्ट होने से बचाएं |     
                         
      हमारे देश की रेत में छिपी है ऐसी ही एक नायाब धरोहर  कठपुतली   | वो धरोहर जो किसी तरह अल्प रूप मे ही सही पर आज भी अपना अस्तित्व बचाए हुए है | वो धरोहर जिसमे आज भी है देश की मिटटी की खुशबू |




कठपुतलियो का अपना एक अलग ही इतिहास है | केवल भारत मे ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इनकी कहानी अपने अलग अलग रूपों में साफ़ देखी जा सकती है | कठपुतली शब्द हिंदी के दो शब्दों से मिल कर बना है काठ और पुतली  | काठ का अर्थ है लकड़ी  और पुतली का अर्थ है पुतला या मूरत से है | जिसका मतलब लकड़ी की गुडिया या पुतले से लगाया जा सकता है |  जबकि इसका अंग्रेजी रूपांतरण 'पपेट'  है | जो की एंग्लो नोर्मन शब्द पोपे से निकला है | जिसका अर्थ डॉल या  गुडिया है |
        
                          इसकी उत्पत्ति  के बारे में पूरी तरह से निश्चित तौर पर तो कुछ नहीं कहा जा सकता है | पर विद्वानों   का मानना है की भारत मे इसका अस्तित्व लगभग 4000 साल पुराना है | संस्कृत के कई नाटकों में ' सूत्रधार'  शब्द का ज़िक्र हुआ  है | कठपुतली का उदय तो भारत मे ही हुआ था पर इसने सात समंदर पार कई पूर्वी और पश्चिमी देशों की यात्रा की है |
  कहीं ये शैडो या छाया पपेट के रूप  में तो कहीं  रौड पपेट के रूप में |  दुनिया के लगभग हर देश मे ये कला किसी न किसी रूप में मौजूद है  | भारत मे ही उड़ीसा मे जहाँ कठपुतलियों को बेहद खूबसूरत स्वरूप राधा कृष्ण के रूप में तो वहीँ केरल में नृत्य कि एक खास कला कथकली के रूप मे आज भी देखा जा सकता है | 




          पर कहीं न कहीं ये कला आज भी मुख्य रूप से राजस्थान से जुडी ही मानी जाती है|  कठपुतली का पारंपरिक और वर्तमान स्वरुप लगभग 1500 साल पुराना है | जो वर्तमान नागौर जिले के आस पास का इलाका है | राजस्थान कि धरती पर  आज भी पुराने योद्धाओं में महाराजा अमर सिंह का नाम बहुत ही आदर के साथ लिया जाता है | लिहाज़ा इसी के चलते उनकी याद मे आज भी कठपुतली के किसी भी खेल और नाटक मे उन्ही के नाम का मुख्य किरदार रखा जाता है | जो शायद कही न कही इस देश कि मिटटी की उनको एक श्रद्धांजलि है|  कठपुतली को जीवन्तता देने वाला सूत्रधार अपनी कठपुतलियों का खास आदर करता है | जिनकी वो बाकायदा प्राणप्रतिष्ठा करता है  और न केवल खुद तक बल्कि अपनी आगे आने वाली पीढ़ी तक इसे बढ़ता है | आज भी कई सूत्रधारों के पास सैकड़ों साल पुरानी कठपुतलियाँ है जो आज भी उन्होंने बेहद सहेज के रखी हैं | 
             कठपुतलियों का महत्व आज सिर्फ बच्चों  तक सिमित नहीं है | दक्षिण भारत मे इनका सबसे ज्यादा उपयोग धार्मिक  कार्यों में होता है | जहां आज भी छाया कठपुतलियों के रूप मे धार्मिक अनुष्ठानो में किया जाता है | इनके इतिहास के कुछ और पुख्ता प्रमाण महाभारत और संगम काल मे भी देखे गए हैं | इनकी उत्पत्ति का एक हिस्सा सिन्धु घटी सभ्यता से भी जुड़ा  हुआ है | जहाँ खुदाई के दौरान टेराकोटा कि बनी गुड़ियाँ मिली हैं जो कहीं न कही कठपुतलियों जैसी ही हैं |
       कठपुतलियों का उपयोग आज न सिर्फ मनोरंजन के रूप में किया जाता है बल्कि कई शोधों से ये सिद्ध हो चुका है कि शिक्षा के प्रचार और प्रसार मे भी ये अपना  योगदान दिया है | खास तौर पर स्पास्टिक बच्चों के बौद्धिक विकास में भी इस कला ने बहुत   ही महत्वपुर्ण योगदान दिया है | 
             

          इससे पहले कि ये कला आज अपने अंत समय पर आ जाये या अपनी खूबसूरती से भटक जाये हमारा ये फ़र्ज़ है कि हम देश कि इस शानदार धरोहर को बचा लें और इसे इतना प्रसिद्ध कर दें कि आने वाली सैकड़ों हज़ारों सालों तक ये अपने अस्तित्व पर कायम रह सकें |  इससे पहले कि में अपने आज के ब्लॉग को खत्म करूं आपको छोड़ जाती हूँ ऐसी ही एक खूबसूरत  धरोहर के साथ -----------------------------------------------------------------------------------------


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