Tuesday, February 22, 2011

वी वांट जस्टिस




                             इससे पहले कि कुछ लिखना शुरू करूं खुद का ही लिखा कुछ पेश करना चाहती हूँ, इस उम्मीद में कि शायद कुछ फर्क पढ़े इस समाज के जेहेन में |


            ' मासूम कली मुस्काई थी,          
              अभी थोडा ही शरमाई थी,
              आँखों को उसने खोला था,
            और सपनों कि अंगड़ाई थी,                             नापाक निगाहों ने उसपर 
           कुछ ऐसा दृष्टिपात किया,
            मासूम कली के यौवन पर,
            निर्ममता से यूँ वार किया,
            चिल्लाई कली तडपी बेहद,
             आंचल को लेकर भागी वो,
                     खुद कि ही लाज बचने को,
                    बेहाल कली यूँ कुचली गयी, 
                    नापाक निगाहों के  हांथों,
                    तब गरज बरस के एक स्वर,
                    नभ मे यूँ एकाएक गूंजा,   
                    ऐ दुष्ट निर्दयी दानव तू,
                   कब तक ये रूप दिखायेगा,
                   नारी कि कोख से उपजा तू,  
                   इस धरती मे मिल जायेगा,
                  लगता है तू भूल गया अपनी माँ के उस आंचल को,
                   तेरी बेटी ही भुगतेगी अब तेरे इन पापों को,
                   तब रोयेगा तू पछतायेगा,
                   पर कुछ न करने पयेगा 
                   और तेरा ही वो निर्मम शब्द,
                       तुझे अंत काल दिखलायेगा,
                      ऐ दुष्ट आत्मा याद रहे,
                      तू भी नारी का हिस्सा है,
                      ये तल्ख़ शब्द सिर्फ व्यंग नहीं,
                     इस धरती का ही किस्सा है ||||||||||||'

  ये सिर्फ एक कविता नहीं है, ये कराह और पीड़ा है उन तमाम औरतों कि जो कभी न कभी इस पीड़ादायक स्थिति से गुज़र चुकी हैं | आम आदमी तो इसे एक खबर कि तरह पढ़ कर भूल जाते हैं, फिर चाहे वो कविता हों या दिव्या शीलू हो या रुचिका  या फिर प्रियदर्शिनी  | आम आदमी सुबह अखबार में ये खबर पढ़ेगा कुछ देर पीडिता के लिए सान्तवना दिखायेगा और आरोपी को कोसेगा और फिर चाय कि लम्बी चुस्की लेते  हुए अखबार का पन्ना पलट  देगा | फिर, फिर क्या होगा  ?  कुछ नहीं | नेता आएंगे मीडिया आयेगी समाज सेवक भी आएंगे पर देंगे सब वही सिर्फ तसल्ली | कोई ये नहीं कहेगा कि चाहे कुछ भी हो जाये आरोपी को फांसी दी जाएगी जल्द से जल्द और वो भी सरेआम | ताकि भविष्य मे कभी भी कोई भी ऐसा अपराध   करने के   बारे में सपने में भी न सोच  सके  |
                     2009 में रिकॉर्ड किये गए 21,397 केसेस में से 11.5% (2,470) केसेस 15 साल से कम आयु  कि किशोरियों  से जुड़े  हुए  थे  |  15.6% (2,912) केसेस  15 से 18 साल  के बीच के थे | 59.8 % (12 ,812 ) 18 से 30  साल के बीच के थे | 14.6% (3,124) 30 से 50 के बीच थे और 0 .4 % (95 ) 50 साल से ऊपर के था |






 Around the world
  • One in five women will be a victim of rape or attempted rape in her lifetime (WHO 1997).
  • In South Africa 147 women are raped every day (South African Institute for Race Relations 2003).
  • In the USA a woman is raped every 90 seconds (US Department of Justice, 2000).
  • In France 25,000 women are raped per year (European Women’s Lobby, 2001).
  • In Turkey 35.6% of women have experienced marital rape sometimes and 16.3% often (surveys

    published in 2000, Women and sexuality in Muslim societies  , WWHR  Publications: Istanbul, 2000).


    बात अगर भारत कि करें तो NCRB  के अनुसार बलात्कार से जुड़े मामलों में टॉप 7 राज्य मध्य प्रदेश, 


    वेस्ट बंगाल, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, असोम, राजस्थान, और बिहार हैं | जिनके क्रमवार आंकड़े कुछ इस 


    तरह है (2008 के आंकड़ों के अनुसार) 2,937 , 2263 , 1871 , 1558 , 1438 , 1335 , 1302 | जबकि सबसे 


    कम मामले नागालेंड में सामने आये जो कि  मात्र १९ हैं  | 
           
                    हर साल दिन पर दिन बढ़ता ये आंकड़ा समाज कि उस गन्दी सोच को दिखा रहा है जिसकी 


    आज से पहले कल्पना भी नहीं कि जा सकती थी | ध्यान देने वाली बात तो ये है कि ये सभी आंकडे तो 


    उन केसेस के हैं जो कि पुलिस के पास तक पहुचे हैं, तो इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि 


    वास्तविक आंकड़े क्या होंगे |  परिस्थितियां तब और भी ज्यादा वीभत्स महसूस होने लगती है जब ये 


    बात सामने आती है कि बलात्कार के हालिया मामलों में सबसे ज्यादा मामले मासूम बच्चियों के हैं | वो 


    बच्चियां जिन्होंने शायद अपनी ज़िन्दगी के 10 , 12 बसंत भी नहीं देखे होंगे |उनमे से ज्यादातर तो काल 


    के गाल में समां गयीं और जो बची भी वो आज मृत प्राय ही हैं | अब उनमे न तो जीने कि उम्मीद है और 


    न ही कोई आशा | क्या होगा उनका ये अब कोई नहीं जानता, कैसे उबरेंगी वो इस हादसे से, क्या किसी 


    कि भी तस्सली उन्हें उनकी पुरानी ज़िन्दगी में वापस ले जा पायेगी ? शायद नहीं | लेकिन एक कोशिश 


    तो कि ही जा सकती है  कि भविष्य में इस तरह के हादसे दोबारा न हों | ताकि फिर कोई कली फिर इस 


    बेरहमी से कुचली न जा सके  |         
    
                       
SAVE WOMEN, SAVE SOCIETY

3 comments:

archit said...

mam aap ki kavita har jajbat ko baya kar rahi hai

संजय भास्कर said...

बहुत पसन्द आया
हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

Anonymous said...

tooo gud mam....
nd the poem was superb....

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