Sunday, February 27, 2011

तो ये क्यूँ नहीं

' छोटू चाय लाना '  बेहद आम से लगाने वाले ये शब्द आज बड़े और विकसित शहरों में हर पचास कदम पर सुनाई दे जायेंगे | केवल इतना ही नहीं दूसरी तरफ से एक मासूम सा जवाब भी आयेगा ' लाया साहब ' | और साहब के चहरे पर ऐसी गर्वपूर्ण मुस्कान की मानो आगामी चुनावों में निर्विरोध प्रधानमंत्री चुन लिए गए हों या भारत पाक सीमा विवाद पर विजय हांसिल कर ली हो | पर साल में ऐसा कुछ नहीं होता |

              हर बार जब भी कभी देश के विकास या किसी भी प्रकार के बदलाव की बात होती है तो हम सीधे सरकार पर निशाना साधते हैं | चाय की चुस्कियां लेते हुए सरकार की गलतियां गिनवाते हैं | हर बार ये कहते है की इस देश का कुछ नहीं हो सकता | अशिक्षा , बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार पर घंटों चर्चा करते हैं , इस दौरान हम छोटू से तीन चार बार चाय भी मंगवाते हैं | हर बार वो चाय के गिलास मेज़ पर रखता है और अपनी अधूरी आँखों से आपको देखता है और शायद ये समझने की कोशिश करता है की आखिर इतनी देर से बहस हो किस विषय पर रही है |  पर उसे कुछ समझ नहीं आता और वो वहां से कुछ गुनगुनाता हुआ चला जाता है | चर्चा अभी भी नही रुकती और रुके भी क्यूँ आखिर देश को सुधारने का बीड़ा जो उठाया है | 
   
लेकिन ये समाज शायद ये भूल गया है की वो खुद ही तो इसे बढावा दे रहे हैं | छोटू से चाय मंगाकर समाज की एक बहुत बड़ी समस्या को हम खुद ही तो बढावा दे रहे हैं | फिर चाहे वो अज्ञानतावश हो या चढ़ पैसे बचने के लालच मैं पर दोषी तो हम हैं ही |
            एक प्रतिष्ठित चाय के विज्ञापन के  'जागो रे ' जैसे स्वर हमें कुछ देर के लिए तो जगा ही देते हैं | सही ही तो कहा है उस विज्ञापन में की लोग घूस क्यूँ खाते हैं क्यूंकि हम खिलाते हैं |  लेकिन इसी कंपनी के एक अन्य विज्ञापन में  कुछ सामान अभी भी छोटू ही ला रह है |



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अरे भाई भ्रष्टाचार , घूसखोरी और आतंकवाद से तो बहुत निपट लिए  पर बालश्रम की समस्या पर कब विचार करेंगे, तब जब इस देश में बाल ही नहीं रहेंगे या तब जब ये बाल खुद ही न्याय के लिए आवाज़ उठाएंगे |
            हर बार बाल दिवस जैसे किसी मौके पर हम थोड़ी देर के लिए चिर निद्रा से जागते हैं पर 24 घंटे बीते नहीं की हम फिर दीर्घ निद्रा मे चले जाते है अगले बाल दिवस की तैयारी में |
                                          
                                              देश के सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले पन्नों यानि की हमारे संविधान में भी बाल श्रम का विरोध करने वाला अनुच्छेद 24  है | जिसमे 14 साल से कम आयु के बच्चों को किसी परिसंकटमय  परिस्थितियों या अमानवीय परिस्थितियों में काम का विरोध किया गया है | पर संविधान में लिखी गयी बातों का कितना पालन होता है यह सर्वविदित है |
                देश में वर्ष २००१ के आंकड़ों के मुताबिक बाल श्रमिकों की संख्या कुछ इस प्रकार है :-

      
                     State-wise Distribution of Working Children according to 2001 Census                                                            age group 5-14 years


Name of the State/UT

Working children/2001

Andhra Pradesh
1363339

Arunachal Pradesh
18482

Assam
351416

Bihar
1117500

Chhattisgarh
364572

Delhi
41899

Goa
4138

Gujarat
485530

Haryana
253491

Himachal Pradesh
107774                              

Jammu & Kashmir
175630

Jharkhand
407200

Karnataka
822615

Kerala
26156

Madhya Pradesh
1065259

Maharashtra
764075

Manipur
28836                          

Meghalaya
53940

Mizoram
26265

Nagaland
45874                  

Orissa
377594

Punjab
177268

Rajasthan
1262570

Sikkim
16457

Tamil Nadu
418801

Tripura
21756

Uttar Pradesh
1927997

Uttarakhand
70183

West Bengal
857087

Andaman & Nicobar Island
1960

Chandigarh
3779

Dadra & Nagar Haveli
4274

Daman and Diu
729

Lakshadweep
27

Puducherry
1904

Total
12666377
     
                               पर आज एक  प्रश्न जो मैं सामने रखना चाहती हूँ वो यह है कि अगर केवल इसी परिस्थितियों में काम करने वाले ही बाल श्रमिक हैं तो चाय लाने वाला छोटू बाल श्रमिक नहीं है क्यूंकि वो सिर्फ चाय लाता है और वो कोई परिसंकटमय  स्थिति नहीं है |  लेकिन अगर  चाय  वाला  छोटू बाल श्रमिक है तो फिर यक़ीनन और भी बहुत से बच्चे हैं जो इस श्रेणी में है फिर चाहे वो बालिका वधु की 'आनंदी ' हो या फुलवा की 'फुलवा ' , तारे ज़मीं पर का 'दर्शील सफारी' हो या फिर कोई और  बाल कलाकार  |   हकीकत में ये सब भी  तो बाल श्रमिक हैं | तो फिर इनपर कोई प्रतिबन्ध क्यूँ नहीं लगाया जाता | क्यूंकि ये सभी  तो सिर्फ धनार्जन के लिए ही तो काम  करते है | सवाल थोडा अजीब है पर यक़ीनन गलत नहीं है |

                                             




आज भी 1500 डिग्री के तापमान पर खौलते कांच को ढोने वाले और खतरनाक रासायनिक घोलों में नंगे हाँथ डुबोकर तालों के लिए धातु के टुकडे तैयार करने वाले  बच्चों से लेकर यौन शोषण को मजबूर सभी वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं |  फिर चाहे वो शिवकाशी का आतिशबाजी का उद्योग हो या सूरत का हीरा पॉलिश,  मिर्ज़ापुर और भदोही का गलीचा उद्योग हो या जयपुर का पत्थर का उद्योग | ये सभी वो जगहें हैं जहाँ आज भी बिना किसी भय के बाल श्रम देखा जा सकता है |         


                  




                         परिस्थितियां तब और भी ज्यादा घिनौनी लगाने  लगाती हैं जब हम देश के गणमान्य  नेताओं को देश की उन्नति का बखान करते हुए सुनते हैं | समझ से परे है की ये कैसा विकास है जहां देश का भविष्य ही शोषण की त्रासदी झेल रहा है | हम आखिर इस शोषित समाज से विकास की उम्मीद कर ही कैसे सकते हैं | हालाँकि इस दिशा में कुछ गैर सरकारी संस्थाओं ने कुछ काम ज़रूर किया है पर वो नाकाफी है |  

  



      यक़ीनन अब ज़रुरत है इस दिशा में कुछ बड़े कदमों की ताकि इस मासूम बचपन को ख़त्म होने से बचाया जा सके और देश के विकास के मार्ग को किसी भी प्रकार के अवरोध से बचाया जा सके |






                                              



                                                 
                                                 'यूँ तो सब कुछ दिया तुने मेरे खुदा मुझको ,
बस इतनी ख्वाहिश मेरी और पूरी कर दे ,
मेरी ज़िन्दगी में गर कुछ पल हों खुशियों के ,
उसे किसी बेसहारा बच्चे के नाम कर दे' |||  
  

Thursday, February 24, 2011

जीने दो

           लोकतंत्र पर आस्था और विश्वास रखने वाले इस देश की एक विडम्बना है , हर बार  देश में जब कभी भी रिज़र्वेशन  यानि आरक्षण की बात होती है तो हमारा ध्यान जाता है अनुसूचित जाति और जनजाति पर | हर बार चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार आज भी सिर्फ इन्ही के आरक्षण की ही बात करते हैं | ये भूल कर की जब ये आरक्षण व्यवस्था शुरू हुई थी तो असल में इसका मकसद क्या था ? इसका मकसद था देश के पिछड़े वर्ग को देश की मुख्य धारा से जोड़ना | पर क्या आज ये आरक्षण अपने असल मुद्दे पर कायम है | नहीं ! ये असल में अपना असली उद्देश्य भूल गया है | ये पहचान ही नहीं पा रहा है की असल में इस आरक्षण का असली हक़दार कौन है | 
 ये है समाज का वो वर्ग जिसे असल में आरक्षण की ज़रुरत है |  मंगलामुखी  | स्वयं को अर्धनारीश्वर भगवान शिव का हिस्सा बताने वाला ये समाज का वो हिस्सा जो हमारे समाज का होकर भी हमारा नहीं है | जो आज भी अपने हक़ के लिए लड़ रहा है | 

                                  हमारे समाज में आज भी इन मंगलामुखियों को बहुत अजीब सी नज़रों से देखा जाता है |
यदि आज की स्थिति की बात करें तो हमारे देश में लगभग २ करोड़ [ एक मंगलामुखी के ही अनुसार ] मंगलामुखी  हैं |  एक मंगलामुखी से वार्ता के दौरान इस समाज की एक अजीब सी छवि उभर कर सामने आई |  ऊपर से बहुत ही सख्त दिखने  वाला ये समाज असल में समाज की प्रताड़ना और अवमानना का लगातार  शिकार हो रहा है | एक प्रोजेक्ट  के दौरान इस समाज से रूबरू होने का जब मुझे मौका मिला तो सारी हकीकत खुद-ब-खुद  सामने आ गयी | सामने आया वो सच  जो हकीकत  में इन लोगों  को झेलना पड़ रहा है | 
                

 इन लोगों के बारे  में ज्यादा से ज्यादा जानने के लिए मै अपने ही शहर की अलग अलग गद्दियों  पर गयी , और इन लोगों से जानी इनकी असल ज़िन्दगी | इनकी ज़िन्दगी का वो कड़वा पहलू जिससे ये समाज हर रोज़ दो चार होता है|                                                          
एक मंगलामुखी ने बताया की  समाज में जब भी कभी इस तरह का बच्चा पैदा होता है तो ज़्यादातर तो परिवार खुद ही उन्हें सौंप जाता है नहीं तो ये खुद उन्हें जाकर ले आते है | इनका साफ़ कहना है की परिवार  बढ़ाने का इनके पास सिर्फ यही एक जरिया है | इस दौरान मेरी मुलाकात  एक गद्दी पर ऐसी ही एक बच्ची से हुई  | पहले तो मैंने इसे आम बच्ची समझ कर ज्यादा ध्यान नहीं दिया , पर एक मंगलामुखी के बताने पर मेरा ध्यान खास तौर पर उस बच्ची पर गया |  बेहद खूबसूरत और मासूम  मगर आम सी दिखने वाली ये लड़की  कहीं से भी और बच्चों से अलग नहीं लग रही
थी | आम लड़कियों की तरह खूब सजी संवरी और मुस्कुराते  हुए मुझे देख रही थी | समझ नहीं आया की क्या हो रहा है | मेरे ये पूछने पर की वो जब बड़ी हो जायेगा तो क्या बनेगी , तो उसका जवाब था की वो डाक्टर बनेगी | सच कहूं तो मैं उस वक्त कुछ कहने के लायक ही नहीं थी | दिमाग और दिल में सिर्फ एक ही सवाल चल रहा था  कि आखिर क्या होगा इस मासूम के सपनों का | वो सपने जो यक़ीनन आज कि परिस्थितियों में तो कभी भी सच नहीं होंगे |  कैसा लगेगा  जब 13-14 साल तक एक लड़की कि ज़िन्दगी जीने वाली ये बच्ची एक दिन अचानक खुद को आइने में एक नए रूप में देखेगी | कैसे स्वीकार करेगी ज़िन्दगी की ये सच्चाई | सिर्फ और सिर्फ सवाल ही घूम रहे थे मेरे ज़हन में |  
       क्यूँ हमारा समाज इन लोगों को भी अपने सपने पूरे करने का हक़ नहीं देता ? क्यूँ नहीं बन सकती ये बच्ची डाक्टर ?  सिर्फ इसलिए क्यूंकि प्रकृति ने उसे आम नहीं बनाया | पर इसमे इसका क्या दोष है | और असल में दोष तो किसी का भी नहीं है | पर इनके सपनों को पूरा करने का कोई तो तरीका होगा |
      इसी गद्दी पर मेरी मुलाकात एक दिल्ली यूनिवर्सिटी के पढ़े मंगलामुखी से भी हुई | उसने भी मुझे अपने अनुभवों के बारे मैं बताया | उसने बताया कि कैसे उसने समाज के गंदे और घिनौने ताने झेल  कर अपनी पढाई   पूरी की | पर क्या फायदा इस पढाई का आज कर तो वही रही है जो बाकि के मंगलामुखी करते हैं | नौकरी का सपना तो बस सपना ही रह गया |
  
        शहर के एक इलाके की पार्षद भी एक मंगलामुखी है | देश की सक्रीय राजनीति का हिस्सा बनी काजल किरण ने भी अपने समाज के बारे मे बताया | उन्होंने बताया कि उनके समाज में भी अब फ्रौड केसेज़ सामने आने लगे हैं | आज के आंकड़े यदि देखें तो लगभग 60 प्रतिशत से ऊपर तो फ्रौड केसेज़ हैं जो असल में मंगलामुखी हैं ही नहीं |  असल में यही वो लोग हैं जो हमारे समाज को बदनाम कर रहे हैं | अपने गुरुओं का बेहद सम्मान करने वाला ये समाज जो आम लोगों कि खुशियों में शरीक होकर अपने ग़म को पूरी तरह से भूल जाता है | वो भूल जाता है कि उनकी ज़िन्दगी मे असल में कभी खुशियाँ आयेंगी ही नहीं |
          बातों ही बातों में एक मंगलामुखी काफी भावुक हो गया | उसने मुझे अपने समाज से जुडी कुछ खास प्रथाओं और संस्कारों के बारे में भी बताया | पर वो बातें मैं आपको नहीं बता सकती | क्यूंकि उसने बेहद विश्वास के साथ ही मुझे अपने समाज के छिपे पहलुओं के बारे में बताया था | आज वो इस दुनिया में नहीं है, पर उसके वो आंसू मुझे आज भी कुछ देर के लिए परेशान कर देते हैं | वो बार बार रो रहा था और ये कह रहा था कि दिन तो किसी तरह गाने बजने में कट जाता है पर रात उन्हें उनकी असल ज़िन्दगी याद दिला देती है | उनका परिवार उनसे संपर्क में तो है पर सामाजिक रूप से उन्हें स्वीकार नहीं कर पता | हर रात इस उम्मीद में सोते हैं कि शायद कोई चमत्कार हो जाये और हम भी आम ज़िन्दगी जीने लगें | पर हर नयी सुबह उगने वाला सूरज जैसे शायद  हमे चिढाते हुए ये कहता है  कि बस अब सपने देखना बंद करो और हकीकत से सामना करो |
           


पर अब कुछ उम्मीद दिख रही है | सरकार द्वारा जनगणना में इस बार थर्ड जेंडर को भी शामिल कि जाने कि बात कही गयी है |  शायद कुछ हो | शायद  सच हो सकें इस समाज के सपने | शायद अब इस समाज का कोई बच्चा बड़े होकर डाक्टर और इंजीनियर बन सके | वो भी देख सके वो सपने वो पूरे होंगे | और उन्हें भी दिलाएंगे इस समाज में एक सशक्त स्थान |

       ऐसा लगता है  हर बार उस बच्ची की मुस्कान मुझसे यही कहती है| कि आखिर कब आइने में खुद को देखकर अफ़सोस नहीं होगा |  कब मैं बड़ी होकर भी इस बात का अफ़सोस नहीं करूंगी की मैं आखिर पैदा ही  क्यूँ हुई |
       समाज का ये वर्ग अब हमें याद दिला रहा है की अगर हमने हर बात पर अपनी सोच बदल दी है , तो इस बात पर क्यूँ नहीं | ये समाज अब कह रहा है कि अब हम भी जीना चाहते हैं , खुले आकाश में साँस लेना चाहते हैं| हम भी बैग लटकाकर स्कूल जाना चाहते हैं, हम भी दोस्तों के साथ कॉलेज कैंटीन में जोर जोर से टेबिल बजाना चाहते हैं और हम भी कंधे पर लेपटॉप लटकाकर ऑफिस जाना चाहते हैं  | हमें भी अब अपने सपने पूरे करने दो हमें भी जीने दो , अब हमें भी जीने दो |  


Tuesday, February 22, 2011

हमें तो अपनो ने लूटा


                               1947 में हमारा देश आजाद हुआ था | बड़े बड़े स्वतंत्रता सेनानियों ने महापुरुषों ने और न जाने कितने लोगों ने अपने प्राणों कि आहुति दी थी तब जाकर आज़ादी का वो सूरज देखने को मिला था | 1857 के पहले आन्दोलन से लेकर 1947 तक फिरंगी हमारे देश का लगभग एक हज़ार करोड़ रूपया खा गए थे | आज जब हम गाहे बगाहे 15 अगस्त या 26 जनवरी को एकाएक देशप्रेमी बन जाते हैं तो उन अग्रेजों को कितना कोसते हैं | हर बार यह कहते हुए कहीं न कहीं पाए जाते हैं कि कि हमारे पूर्वजों  कि बदोलत हम आज आजाद हैं वरना पता नहीं क्या होता  और ये सब कहते हुए हमारा सिर उनके आदर में झुक जाता है |
                     सच ही तो है कितना जतन किया था तब ये आज़ादी मिली थी | पर क्या हम वाकई में अपने पूर्वजों इस धरोहर का मान रख पाए ? क्या वास्तव में हमे इस देश कि जितनी कदर करनी चाहिए थी हमने कि ? इसका जवाब मैं दूं या आप समझ गए हैं ?  सच तो यही है कि हम आज़ादी को सिर्फ एक शोपीस कि तरह देखते हैं जिसे 15 अगस्त और 26 जनवरी जेसे मौकों पर सजा लेते हैं औए दिन गुज़रते ही उसे फिर सहेज कर रख देते हैं ये सोच कर कि अगले त्योहार पर काम आयेगा |
                    एक कड़वा सच कहूं कोई हक़ नहीं है हमे अंग्रेजों को बुरा कहने का, कम से कम तब तक तो बिलकुल भी नहीं जब तक हम अपने देश के अन्दर रहने वाले डाकूओं को खत्म नहीं कर देते |
                    देश में मात्र पिछले  दस सालों में ही इतने घोटाले  हुए है जिनकी रकम सुन कर तो हमे लूटने वाले अंग्रेज़ भी शर्मा जाएँ | इन घोटालों कि लिस्ट बहुत लम्बी है, थोड़े बहुत नाम तो में ही बता सकती हूँ -----------------------------------
  
1992 — Harshad  Mehta Scam was worth Rs 5000 Crores.
1994 — Sugar Import Scam was worth Rs 650 Crores.
1995 — Preferential Allotment Scam was worth Rs 5000 Crores.
1995 — Yugoslav Dinar scam was worth Rs 400 Crores.
1995 — Meghalay Forest Scam was worth Rs 300Crores.
1996 — Fertilisers Import Scam was worth 1300 Crores.
1997 — Sukhram telecom Scam was worth Rs 400 Crores.
1997 — Lavalin Power project Scam was worth Rs 374 Crores.
1997 — Bihar Land Scam was worth 1200 Crores
1997 — C R Bhansali stock scam was worth Rs 1200 Crores.
1998 — Teak Plantation Scam was worth rs 8000 Crores.
2001 — UTI Scam was Rs 4800 Crores.
2001 — Dinesh Dalmia Stock Scam was worth Rs 596 Crores.
2001 — Ketan Parekh security scam was worth Rs 1250 Crores.
2002 — Sanjay Agarwal Home Trade Scam was worth Rs 600 Crores.
2003 — Telgi Stamp paper Scam was worth Rs 172 Crores.
2005 — IPO Demat Scam was worth Rs 146 Crores.
2005 — Bihar food relief Scam was worth 17 crores.
2005 — Scorpene submarine Scam was worth Rs 18,978 crores.
2006 — Punjab’s city centre project scam
2006 — Taj Corridor Scam was worth 175 Crores.
2008 — Pune Billionaire Hasan Ali tax default scam was worth Rs 50,000 crores.
2008 – Satyam Scam was worth Rs 10.000 Crores.
2008 — Army Ration Pilferage Scam was worth Rs 5000 crores.
2008 — 2G Spectrum Scam was worth Rs 60.000 Crores.
2008 — State Bank of Saurashtra Scam was worth Rs 95 crores.
2008 — Illegal money in Swiss Bank is worth Rs 71,00,000 Crores.
2009 — Jharkhand Medical equipment scam was worth Rs 130 Crores.
2009 — Rice export scam was worth Rs 2500 crores.
2009 — Orissa Mine scam was worth Rs 7000 crores.
2009 — Madhu Koda scam was worth Rs 4000 crores.
2010 – IPL fraud involving swine called Lalit Modi option was worth?
2010 — Commonwealth Games loot is worth?

           -  Aadarsh socity scam
 
                हं हं आप तो देख कर ही घबरा गए और करने वाले कर के भी नहीं घबरा रहे हैं | बात तब और भी ज्यादा भयानक लगने लगती है जब पता चलता है कि इन घोटालों का आंकड़ा अंग्रेजों कि इस देश में कि गयी लूट से करोड़ों अरबों गुना ज्यादा है |  और तो और ये लूट करने वाले भी कोई और नहीं बल्कि देश के नौकरशाह, राजनेता, समाजसेवक और कोर्पोरेट लोबिंग से जुड़े लोग हैं | ये वो हस्तियाँ हैं जो शपथ लेती हैं देश कि सेवा की |





            देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार के चलते आज लगभग 462 अरब डॉलर कि राशि स्विज़ बैंकों में जमा है | वो रूपया जो इस देश का है इस देश के लोगों का है |  अन्तरराष्ट्रीय संस्था ट्रांस्पिरेंसी इंटरनेश्नल के सर्वे के अनुसार देश में 80 फीसदी नौकरशाह भ्रष्ट हैं | इन्ही कि बदौलत इस देश को हर साल लगभग 315 अरब रुपये कि चपत लगती है |
              बहुत कोस लिया अंग्रजों को पहले अपने गिरेबां में झांक कर देखे कि हम कितने साफ़ हैं | बाहर के लूटेरों को छोड़ कर पहेले हम घर के भीतर बैठे चोरों को पकड़ें तो बेहेतर होगा | क्यूंकि 1947 से पहले तो गाँधी और नेहेरू जेसे लोग थे हमे आज़ादी दिलाने के लिए पार 1947 के बाद  न तो कोई गाँधी पैदा हुआ और ना ही नेहेरू |
              लिहाज़ा 2011 में हमे खुद ही आजाद होना पड़ेगा | वरना देश के अन्दर बैठे ये लूटेरे एक बार फिर हमे लूट कर खा जायेंगे | लेकिन तब अपनों के दिए इस घाव से हमारा देश कभी उबर नहीं पायेगा  |
                                     

वी वांट जस्टिस




                             इससे पहले कि कुछ लिखना शुरू करूं खुद का ही लिखा कुछ पेश करना चाहती हूँ, इस उम्मीद में कि शायद कुछ फर्क पढ़े इस समाज के जेहेन में |


            ' मासूम कली मुस्काई थी,          
              अभी थोडा ही शरमाई थी,
              आँखों को उसने खोला था,
            और सपनों कि अंगड़ाई थी,                             नापाक निगाहों ने उसपर 
           कुछ ऐसा दृष्टिपात किया,
            मासूम कली के यौवन पर,
            निर्ममता से यूँ वार किया,
            चिल्लाई कली तडपी बेहद,
             आंचल को लेकर भागी वो,
                     खुद कि ही लाज बचने को,
                    बेहाल कली यूँ कुचली गयी, 
                    नापाक निगाहों के  हांथों,
                    तब गरज बरस के एक स्वर,
                    नभ मे यूँ एकाएक गूंजा,   
                    ऐ दुष्ट निर्दयी दानव तू,
                   कब तक ये रूप दिखायेगा,
                   नारी कि कोख से उपजा तू,  
                   इस धरती मे मिल जायेगा,
                  लगता है तू भूल गया अपनी माँ के उस आंचल को,
                   तेरी बेटी ही भुगतेगी अब तेरे इन पापों को,
                   तब रोयेगा तू पछतायेगा,
                   पर कुछ न करने पयेगा 
                   और तेरा ही वो निर्मम शब्द,
                       तुझे अंत काल दिखलायेगा,
                      ऐ दुष्ट आत्मा याद रहे,
                      तू भी नारी का हिस्सा है,
                      ये तल्ख़ शब्द सिर्फ व्यंग नहीं,
                     इस धरती का ही किस्सा है ||||||||||||'

  ये सिर्फ एक कविता नहीं है, ये कराह और पीड़ा है उन तमाम औरतों कि जो कभी न कभी इस पीड़ादायक स्थिति से गुज़र चुकी हैं | आम आदमी तो इसे एक खबर कि तरह पढ़ कर भूल जाते हैं, फिर चाहे वो कविता हों या दिव्या शीलू हो या रुचिका  या फिर प्रियदर्शिनी  | आम आदमी सुबह अखबार में ये खबर पढ़ेगा कुछ देर पीडिता के लिए सान्तवना दिखायेगा और आरोपी को कोसेगा और फिर चाय कि लम्बी चुस्की लेते  हुए अखबार का पन्ना पलट  देगा | फिर, फिर क्या होगा  ?  कुछ नहीं | नेता आएंगे मीडिया आयेगी समाज सेवक भी आएंगे पर देंगे सब वही सिर्फ तसल्ली | कोई ये नहीं कहेगा कि चाहे कुछ भी हो जाये आरोपी को फांसी दी जाएगी जल्द से जल्द और वो भी सरेआम | ताकि भविष्य मे कभी भी कोई भी ऐसा अपराध   करने के   बारे में सपने में भी न सोच  सके  |
                     2009 में रिकॉर्ड किये गए 21,397 केसेस में से 11.5% (2,470) केसेस 15 साल से कम आयु  कि किशोरियों  से जुड़े  हुए  थे  |  15.6% (2,912) केसेस  15 से 18 साल  के बीच के थे | 59.8 % (12 ,812 ) 18 से 30  साल के बीच के थे | 14.6% (3,124) 30 से 50 के बीच थे और 0 .4 % (95 ) 50 साल से ऊपर के था |






 Around the world
  • One in five women will be a victim of rape or attempted rape in her lifetime (WHO 1997).
  • In South Africa 147 women are raped every day (South African Institute for Race Relations 2003).
  • In the USA a woman is raped every 90 seconds (US Department of Justice, 2000).
  • In France 25,000 women are raped per year (European Women’s Lobby, 2001).
  • In Turkey 35.6% of women have experienced marital rape sometimes and 16.3% often (surveys

    published in 2000, Women and sexuality in Muslim societies  , WWHR  Publications: Istanbul, 2000).


    बात अगर भारत कि करें तो NCRB  के अनुसार बलात्कार से जुड़े मामलों में टॉप 7 राज्य मध्य प्रदेश, 


    वेस्ट बंगाल, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, असोम, राजस्थान, और बिहार हैं | जिनके क्रमवार आंकड़े कुछ इस 


    तरह है (2008 के आंकड़ों के अनुसार) 2,937 , 2263 , 1871 , 1558 , 1438 , 1335 , 1302 | जबकि सबसे 


    कम मामले नागालेंड में सामने आये जो कि  मात्र १९ हैं  | 
           
                    हर साल दिन पर दिन बढ़ता ये आंकड़ा समाज कि उस गन्दी सोच को दिखा रहा है जिसकी 


    आज से पहले कल्पना भी नहीं कि जा सकती थी | ध्यान देने वाली बात तो ये है कि ये सभी आंकडे तो 


    उन केसेस के हैं जो कि पुलिस के पास तक पहुचे हैं, तो इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि 


    वास्तविक आंकड़े क्या होंगे |  परिस्थितियां तब और भी ज्यादा वीभत्स महसूस होने लगती है जब ये 


    बात सामने आती है कि बलात्कार के हालिया मामलों में सबसे ज्यादा मामले मासूम बच्चियों के हैं | वो 


    बच्चियां जिन्होंने शायद अपनी ज़िन्दगी के 10 , 12 बसंत भी नहीं देखे होंगे |उनमे से ज्यादातर तो काल 


    के गाल में समां गयीं और जो बची भी वो आज मृत प्राय ही हैं | अब उनमे न तो जीने कि उम्मीद है और 


    न ही कोई आशा | क्या होगा उनका ये अब कोई नहीं जानता, कैसे उबरेंगी वो इस हादसे से, क्या किसी 


    कि भी तस्सली उन्हें उनकी पुरानी ज़िन्दगी में वापस ले जा पायेगी ? शायद नहीं | लेकिन एक कोशिश 


    तो कि ही जा सकती है  कि भविष्य में इस तरह के हादसे दोबारा न हों | ताकि फिर कोई कली फिर इस 


    बेरहमी से कुचली न जा सके  |         
    
                       
SAVE WOMEN, SAVE SOCIETY

वो भारत देश है मेरा




 
बीती रात टीवी पर अपना पसंदीदा  प्रोग्राम देख रही थी ' तारख महेता का उल्टा चश्मा' | हालाँकि यह प्रोग्राम हमेशा ही अच्छा होता है पर कल कुछ खास था उसमे | उसमे गोकुलधाम में रहने वाले  सभी लोग कर्नल राठोड को उनका खोया हुआ मेडल वापस   देने जाते हैं, पर कर्नल साहब उसे स्वीकार करने से मना कर देते हैं  और इसके पीछे वो एक बेहद संवेदनशील तर्क भी देते हैं उनका यह साफ़ साफ़ कहना था कि उन्हें यह मेडल इस देश कि सरकार ने देश में शांति लाने के लिए दिया था पर आज देश में न तो शांति है और न ही भाईचारा, चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार और आतंकवाद ही दिख रहा है, लिहाज़ा उनका उस उद्देश्य के लिए मेडल लेना व्यर्थ है जो अब है ही नहीं | 
                                                      दोस्तों कहने को तो यह सिर्फ एक सीरिअल है पर सच यही है कि उसमे जो कुछ भी कहा गया वो असल में सच ही तो है | देश कि सीमाओं पर लड़ने वाले हमारे सिपाही सरहद के बाहर के दुश्मनों से तो हमारी रक्षा कर रहे हैं पर उन दुश्मनों का क्या जो सरहदों के अन्दर छिपे बेठे हैं | उनका सफ़ाया कैसे  करेंगे ?  बात तब और भी ज्यादा गंभीर हो जाती है जब हर बार हम उन दुश्मनों को देश के अन्दर  हमला करते हुए देखते हैं और चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते |  हर बार अपने मन से कहते हैं कि बस यह अब आखिरी बार है अब और नहीं | लेकिन पता नहीं हर बार किसके डर से हम खुद को कोई बड़ा कदम उठाने से रोक लेते हैं | क्यूँ हर बार हमारे मन के एक कोने से यह आवाज़ आती है कि 'जाने दो यार हमे क्या करना ये हमारा काम थोड़ी है', विश्वास रखिये जब तक ये आवाज़ हमारे दिल से आती रहेगी इस देश का कुछ नहीं हो सकता | आखिर कब तक हम हर काम  सिर्फ दूसरों पर छोड़ते रहेंगे ? कब तक हम सिर्फ ये सोचते रहेंगे कि ये हमारा काम नहीं है ? 
कहीं ऐसा न हो कि हम सिर्फ इंतज़ार करते रह जाये कि कोई कुछ करेगा और कोई हमे ही लूट के चल दे | क्योंकि तब हमारे पास पछतावे के अलावा और कुछ नहीं बचेगा | 
                     इसलिए बहेतर यही है कि क्यूँ न कोई एसा ठोस कदम अब उठाया जाये जिससे इस समस्या का समूल नाश हो  और एक बार हम फिर वह ही देशभक्त गीत सच्चे मन से गा सकें-------------
 'जहाँ डाल डाल पर सोने कि चिड़िया करती हैं बसेरा, वो भारत देश है मेरा, 
जहाँ सत्य अहिंसा और धर्म का पग पग लगता डेरा, वो भारत देश है मेरा'|   

काठ की बनी मैं

           
                                पिछले कई दिनों से ब्लॉग पर जो भी लिख रही थी वो कहीं न कहीं ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मो जैसा था | जिसे जानते तो सब है पर शायद देखना कोई नहीं चाहता | तो सोचा कि आज कुछ ऐसा लिखती हूँ जो ढेर सारे रंगों से भरा हो और जिसे सब पढ़ना चाहे | इससे पहले मैं कुछ लिखूं आप----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- 


                      पहले कुछ देखिये -------------------------------------------------------



कुछ याद आया , शायद नहीं, आयेगा भी कैसे , इससे पहले इस तरह का कुछ देखा भी तो नहीं है, कभी कोशिश ही नहीं कि देखने की और देखते भी कैसे थ्रीडी और फोर्डी गेम से बाहर निकालें तो इन पर ध्यान देंगे न |
                                असल मैं ये है हमारा भारत ,हमारा असली भारत | वो भारत  जो खूबसूरत है, शानदार है, और नायाब है | हमारे देश की असली सुन्दरता तो हमारी लोक और पारंपरिक कलाएं हैं | वो कलाएं जो कहीं न कहीं अब विलुप्ति की कगार पर हैं और हमारे जैसी युवा पीढ़ी से ये कह रही हैं की बचा लो बचा लो हमे, हम नष्ट नहीं होना चाहते हैं | और हमारा ये फ़र्ज़ है की हम अपने देश की धरोहरों को नष्ट होने से बचाएं |     
                         
      हमारे देश की रेत में छिपी है ऐसी ही एक नायाब धरोहर  कठपुतली   | वो धरोहर जो किसी तरह अल्प रूप मे ही सही पर आज भी अपना अस्तित्व बचाए हुए है | वो धरोहर जिसमे आज भी है देश की मिटटी की खुशबू |




कठपुतलियो का अपना एक अलग ही इतिहास है | केवल भारत मे ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इनकी कहानी अपने अलग अलग रूपों में साफ़ देखी जा सकती है | कठपुतली शब्द हिंदी के दो शब्दों से मिल कर बना है काठ और पुतली  | काठ का अर्थ है लकड़ी  और पुतली का अर्थ है पुतला या मूरत से है | जिसका मतलब लकड़ी की गुडिया या पुतले से लगाया जा सकता है |  जबकि इसका अंग्रेजी रूपांतरण 'पपेट'  है | जो की एंग्लो नोर्मन शब्द पोपे से निकला है | जिसका अर्थ डॉल या  गुडिया है |
        
                          इसकी उत्पत्ति  के बारे में पूरी तरह से निश्चित तौर पर तो कुछ नहीं कहा जा सकता है | पर विद्वानों   का मानना है की भारत मे इसका अस्तित्व लगभग 4000 साल पुराना है | संस्कृत के कई नाटकों में ' सूत्रधार'  शब्द का ज़िक्र हुआ  है | कठपुतली का उदय तो भारत मे ही हुआ था पर इसने सात समंदर पार कई पूर्वी और पश्चिमी देशों की यात्रा की है |
  कहीं ये शैडो या छाया पपेट के रूप  में तो कहीं  रौड पपेट के रूप में |  दुनिया के लगभग हर देश मे ये कला किसी न किसी रूप में मौजूद है  | भारत मे ही उड़ीसा मे जहाँ कठपुतलियों को बेहद खूबसूरत स्वरूप राधा कृष्ण के रूप में तो वहीँ केरल में नृत्य कि एक खास कला कथकली के रूप मे आज भी देखा जा सकता है | 




          पर कहीं न कहीं ये कला आज भी मुख्य रूप से राजस्थान से जुडी ही मानी जाती है|  कठपुतली का पारंपरिक और वर्तमान स्वरुप लगभग 1500 साल पुराना है | जो वर्तमान नागौर जिले के आस पास का इलाका है | राजस्थान कि धरती पर  आज भी पुराने योद्धाओं में महाराजा अमर सिंह का नाम बहुत ही आदर के साथ लिया जाता है | लिहाज़ा इसी के चलते उनकी याद मे आज भी कठपुतली के किसी भी खेल और नाटक मे उन्ही के नाम का मुख्य किरदार रखा जाता है | जो शायद कही न कही इस देश कि मिटटी की उनको एक श्रद्धांजलि है|  कठपुतली को जीवन्तता देने वाला सूत्रधार अपनी कठपुतलियों का खास आदर करता है | जिनकी वो बाकायदा प्राणप्रतिष्ठा करता है  और न केवल खुद तक बल्कि अपनी आगे आने वाली पीढ़ी तक इसे बढ़ता है | आज भी कई सूत्रधारों के पास सैकड़ों साल पुरानी कठपुतलियाँ है जो आज भी उन्होंने बेहद सहेज के रखी हैं | 
             कठपुतलियों का महत्व आज सिर्फ बच्चों  तक सिमित नहीं है | दक्षिण भारत मे इनका सबसे ज्यादा उपयोग धार्मिक  कार्यों में होता है | जहां आज भी छाया कठपुतलियों के रूप मे धार्मिक अनुष्ठानो में किया जाता है | इनके इतिहास के कुछ और पुख्ता प्रमाण महाभारत और संगम काल मे भी देखे गए हैं | इनकी उत्पत्ति का एक हिस्सा सिन्धु घटी सभ्यता से भी जुड़ा  हुआ है | जहाँ खुदाई के दौरान टेराकोटा कि बनी गुड़ियाँ मिली हैं जो कहीं न कही कठपुतलियों जैसी ही हैं |
       कठपुतलियों का उपयोग आज न सिर्फ मनोरंजन के रूप में किया जाता है बल्कि कई शोधों से ये सिद्ध हो चुका है कि शिक्षा के प्रचार और प्रसार मे भी ये अपना  योगदान दिया है | खास तौर पर स्पास्टिक बच्चों के बौद्धिक विकास में भी इस कला ने बहुत   ही महत्वपुर्ण योगदान दिया है | 
             

          इससे पहले कि ये कला आज अपने अंत समय पर आ जाये या अपनी खूबसूरती से भटक जाये हमारा ये फ़र्ज़ है कि हम देश कि इस शानदार धरोहर को बचा लें और इसे इतना प्रसिद्ध कर दें कि आने वाली सैकड़ों हज़ारों सालों तक ये अपने अस्तित्व पर कायम रह सकें |  इससे पहले कि में अपने आज के ब्लॉग को खत्म करूं आपको छोड़ जाती हूँ ऐसी ही एक खूबसूरत  धरोहर के साथ -----------------------------------------------------------------------------------------


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“Our Census, Our Future”.






देश मैं इस वक्त एक बेहद ही महत्वपूर्ण काम चल रहा है | ये काम कितना महत्त्वपूर्ण है इसका अंदाज़ा शायद
  एक आम आदमी नहीं लगा सकता, उसके लिए  उसके घर पर आये जनगणनाकर्मी किसी सेल्समेन से ज्यादा  नहीं है, जिससे  वो ये कह कर की 'कोई घर पर नहीं है', टालने का पूरा प्रयास करते हैं | पर इस ब्लॉग को पढ़ने वाले प्रत्येक नागरिक को मै ये बताना चाहूंगी की असल मई  ये जनगणना प्रमाण है आपके इस देश का नागरिक होने का | ये जनगणना प्रमाण है आपके एक भारतीय होने का और ये जनगणना प्रमाण है इस बात का की आप भी इस देश का एक  बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं  |
                  देश मैं चल रही ये जनगणना असल मैं अब तक की विश्व की सबसे बड़ी जनगणना है | ये जनगणना कितनी बड़ी है  इसका अंदाज़ा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस जनगणना  के प्रारंभिक चरण मे लगभग 2 ,209 करोड़ रुपये व्यय हुए है जबकि अंतिम चरण तक आते आते NPR पर होने वाला खर्च लगभग 3539 .24 करोड़ हो जाने का अनुमान है | जबकि इस काम के प्रारंभिक चरण में तक़रीबन 11 मिलियन टन कागज़ इस्तेमाल हुआ है | इतनी बात के ही बाद आपके ज़हन में एक सवाल तो आया ही होगा कि What is NPR . 
NPR is the NATIONAL POPULATION RAGISTER 
 
The NPR would be a Register of usual residents of the country. The NPR will be a comprehensive identity database that would help in better targeting of the benefits and services under the Government schemes/programmes, improve planning and help strengthen security of the country. This is being done for the first time in the country .

जनगणना को अंग्रेजी में CENSUS कहते हैं |  इससे जुड़े कुछ खास सवाल जवाब आगे आपके सामने देने जा रही हूँ | इस आर्टिकल के दौरान इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि जनगणना से जुडी लगभग सभी शंकाओं का निदान और सभी प्रश्नों का हल दिया जा सके | लिहाज़ा अब आगे कुछ इसे ही प्रश्नों का संकलन पेश किया जा रहा है जो संभवतः सभी सवालों को अपने में सम्मिलित किया हुए है |

A. What is Census? How is it useful?
The Indian Census is the most credible source of information on Demography (Population characteristics), Economic Activity, Literacy & Education, Housing & Household Amenities, Urbanization, Fertility and Mortality, Scheduled Castes and Scheduled Tribes, Language, Religion, Migration, Disability and many other socio-cultural and demographic data since 1872. Census 2011 will be the 15th National Census of the country. This is the only source of primary data at village, town and ward level. It provides valuable information for planning and formulation of polices for Central & State Governments and is widely used by National & International agencies, scholars, business people, industrialists, and many more. The delimitation/reservation of Constituencies – Parliamentary/Assembly/Panchayats and other Local Bodies is also done on the basis of the demographic data thrown up by the Census. Census is the basis for reviewing the country’s progress in the past decade, monitoring the on-going schemes of the Government and most importantly, plan for the future. That is why the slogan of Census 2011 is “Our Census, Our Future”.


C. How will both these exercises be conducted?
The Census is a statutory exercise conducted under the provisions of the Census Act 1945 and Rules made there under. The NPR is being created under the provisions of the Citizenship Act and Rules


Census Process:
The Census process involves visiting each and every household and gathering particulars by asking questions and filling up Census Forms. The information collected about individuals is kept absolutely confidential. In fact this information is not accessible even to Courts of law. After the field work is over the forms are transported to data processing centres located at 15 cities across the country. The data processing will be done using sophisticated software called Intelligent Character Recognition Software (ICR). This technology was pioneered by India in Census 2001 has become the benchmark for Censuses all around the globe. This involves the scanning of the Census Forms at high speed and extracting the data automatically using computer software. This revolutionary technology has enabled the processing of the voluminous data in a very short time and saving a huge amount of manual labour and cost


NPR Process:
Details such as Name, Date of Birth, Sex, Present Address, Permanent Address, Names of Father, Mother and Spouse etc will be gathered by visiting each and every household. All usual residents will be eligible to be included irrespective of their Nationality. Each and every household will be given an Acknowledgement Slip at the time of enumeration. The data will then be entered into computers in the local language of the State as well as in English. Once this database has been created, biometrics such as photograph, 10 fingerprints and probably Iris information will be added for all persons aged 15 years and above. This will be done by arranging camps at every village and at the ward level in every town. Each household will be required to bring the Acknowledgement Slip to such camps. Those who miss these camps will be given the opportunity to present themselves at permanent NPR Centres to be set up at the Tehsil/Town level. In the next step, data will be printed out and displayed at prominent places within the village and ward for the public to see. Objections will be sought and registered at this stage. Each of these objections will then be enquired into by the local Revenue Department Officer and a proper disposal given in writing. Persons aggrieved by such order have a right of appeal to the Tehsildar and then to the District Collector. Once this process is over, the lists will be placed in the Gram Sabha in villages and the Ward Committee in towns. Claims and Objections will be received at this stage also and dealt with in the same manner described above. The Gram Sabha/Ward Committee has to give its clearance or objection within a fixed period of time after which it will be deemed that the lists have been cleared. The lists thus authenticated will then be sent to the Unique Identity Authority of India (UIDAI) for de-duplication and issue of UID Numbers. All duplicates will be eliminated at this stage based on comparison of biometrics. Unique ID numbers will also be generated for every person. The cleaned database along with the UID Number will then be sent back to the Office of the Registrar General and Census Commissioner, India (ORG&CCI) and would form the National Population Register. As the UID system works on the basis of biometric de-duplication, in the case of persons of age 15 years and above (for whom biometrics is available), the UID Number will be available for each individual. For those below the age of 15 years (for whom biometrics is not available), the UID Number will be linked to the parent or guardian.


D. Will an Identity Card be given?
The National Population Register would have the data of every person enumerated during the Census operations irrespective of age. It would also have the biometric data and UID Number of every person of age 15 years and above. National Identity Cards will be given in a phased manner to all usual residents by the Office of the Registrar General and Census Commissioner, India. The issue of Cards will be done in Coastal Villages to start with. After this the coastal Towns will be covered and so on till the entire country is covered


E. Who will collect the Information?
Government servants duly appointed as Enumerators will visit each and every house and collect the information required. They will carry an Identity Card as well as an Appointment Letter. In case of need you may ask them to show these documents. The local Tahsildar can also be contacted in this regard


F. What information will be collected?
Two Forms will be canvassed in each household. The first relates to the Houselisting and Housing Census. In this, 35 questions relating to Building material, Use of Houses, Drinking water, Availability and type of latrines, Electricity, possession of assets etc. will be canvassed.
The second form relates to the National Population Register. In this the following will be

canvassed:
* Name of the Person
* Gender
* Date of Birth
* Place of Birth
* Marital Status
* Name of Father
* Name of Mother
* Name of Spouse
* Present Address
* Duration of stay at Present Address
* Permanent Address
* Occupation
* Nationality as Declared
* Educational Qualification
* Relationship to Head of family


G. Will my Information be disclosed to anybody?
All information collected under the Census is confidential and will not be shared with any agency – Government or private. Certain information collected under the NPR will be published in the local areas for public scrutiny and invitation of objections. This is in the nature of the electoral roll or the telephone directory. After the NPR has been finalised, the database will be used only within the Government

H. How will I know that Census is being conducted?
The dates on which Census is being conducted in various States/Union Territories is given below:
Date of commencement
States /UTs
1st April
New Delhi (NDMC area), West Bengal, Assam,   A & N Islands, Goa, Meghalaya
7th April
Kerala, Lakshadweep, Orissa, Himachal Pradesh, Sikkim
15th April
Karnataka, Arunachal, Chandigarh
21st April
Gujarat, Dadra & Nagar Haveli, Daman & Diu
26th April
Tripura, Andhra Pradesh
1st May
Haryana, Chhattisgarh, Delhi, Punjab, Uttaranchal, Maharashtra
7th May
Madhya Pradesh
15th May
J & K, Manipur, Mizoram, Rajasthan, Uttar Pradesh
1st June
Tamil Nadu, Puducherry, Himachal Pradesh (non synchronous), Nagaland
Not finalised
Bihar, Jharkhand



Advertisements will be published in local Newspapers and in the radio/electronic media. Apart from this, the Census enumerators will be visiting your house in person. They will be affixing small Census stickers on the doorway of houses in which Census has been completed. These will indicate that they have commenced operations in your area


I. Whom do I contact in case my house is not covered?
The local Tehsildar/Ward Officer of your area is the designated officer. In case of need you can also contact the Collector/DC/DM of your District or the Commissioner of your Town. You can also intimate us over e mail or contact us over the toll free number given in this website


J. How do I ensure that the information given by me is being correctly entered?
The NPR form has to be signed by you. In case you require, ask the Enumerator to read it out to you and then affix your signature/thumb impression. In any case do ascertain that the details are correctly entered


K.  Do I need to show any documents to the enumerator?
The enumerator will take down all particulars as given by you. You are not required to show any proof. However, be cautioned that it is expected that you will provide correct and authentic information. You are also signing to this effect. The provision of false information can invite penalties under the Census and Citizenship Acts.


L. What is the Link between NPR and Unique ID Authority of India (UIDAI)?
The data collected in the NPR will be subjected to de-duplication by the UIDAI. After de-duplication, the UIDAI will issue a UID Number. This UID Number will be part of the NPR and the NPR Cards will bear this UID Number. The maintenance of the NPR database and updating subsequently will be done by the Office of Registrar General and Census Commissioner, India .

एक खास बात जो इस बार जनगणना में है वो ये है कि इस बार कि जनगणना  में मंगलामुखियों यानिकी हिजारो [eunuchs] को भी ससम्मान स्थान दिया जायेगा |

A First for Census Taking: The Third Sex
By: Carl Haub and O.P. Sharma
Source: Behind the Numbers, Population Reference Bureau
From the beginning, questions on one’s sex on census forms had two choices: male or female. But no more. In its upcoming decennial census, to be conducted in February, India offer the possibility of a third response – “other” (see partial facsimile of the census form below). The innovation has generated quite a bit of publicity in the Indian press. The group most affected by this change to the census form is usually referred to in India as transgenders/eunuchs, or hijras.

        जनगणना के दोनों चरणों कि शुरूआत देश की प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति से कि गयी |
वर्ष 2011 में होने वाली ये जनगणना , देश के इतिहास की 15th , स्वतंत्र भारत की 7th  और इक्कीसवीं शताब्दी की 2nd जनगणना है | 
   
      इतिहास में अगर झांक कर देखे तो भारत में पहली जनगणना  1872 में ' लार्ड मेयो  ' के  शासनकाल में कराई गयी थी | लेकिन उसमे एक दोष था, वो ये की जनगणना की जो पद्धति प्रयोग मैं  लायी  गयी थी वो नॉन Synchronous थी | जबकि  इसे Synchronous होना चाहिए था | मतलब देश के हर हिस्से मैं जनगणना एक ही वक्त पर होनी चाहिए थी, ताकि कहीं धोखे में एक ही व्यक्ति की गिनती कहीं दो बार न हो जाये | लिहाज़ा 1881 में लार्ड रिपन के काल में Synchronous जनगणना कराई गयी | और उसी के बाद से ही प्रत्येक दस वर्ष में हमारे देश में जनगणना होती है | 



         वर्ष 2001 के आंकड़ों के हिसाब से हमारे देश की आबादी 102 .7 करोड़ थी | जो की विश्व की कुल जनसंख्या  का 16 .7 प्रतिशत है |   जनसंख्या  के मामले में 2001 के अनुसार टॉप 5 राज्य उत्तर प्रदेश , महाराष्ट्र , बिहार , पश्चिमी बंगाल  और आंध्र प्रदेश थे| देश में होने वाली इतनी बड़ी जनगणना में इस बार किस तरह के आंकडे सामने आते हैं ये तो अभी भविष्य के गर्भ में है | पर इतना तो निश्चित है कि इस बार के आंकड़े शत प्रतिशत चौकाने वाले होंगे |

            जनगणना में लगे कर्मियों कि मेहनत को देखते हुए ये भी तय है कि इस बार के जनगणना के आंकडे पूर्णतः शुद्ध और सटीक होंगे |


       लिहाज़ा विश्व कि इस सबसे बड़ी जनगणना में सरकार का सहयोग दें और इसे पूर्णतः सफल बनायें | 

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