Saturday, December 31, 2011

नव वर्ष की शुभकामनायें !!!


           ब्लॉगर परिवार के सभी सदस्यों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकानाएं |

Friday, October 7, 2011

मै थोड़ी हैरान हूँ !

                                     जिस विषय पर आज लिखने जा रही हूँ हालाँकि उस विषय पर पहले भी लिख चुकी हूँ, पर इस बार बात और सोच थोड़ी अलग है | विषय है बालश्रम | जानती हूँ विषय पुराना है पर विश्वास रखिये सोच नयी ही होगी |
                                       


                                  सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं की आखिर मैंने ये विषय चुना ही क्यूँ | आज कल फिर पढाई करने लगी हूँ, असल मैं मैंने कानपुर यूनिवर्सिटी में ही मास्टर इन सोशल वर्क में एडमिशन लिया है | और ये शायद मेरा सौभाग्य ही है की यहाँ आते ही एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मेरे विभाग को मिल गया | जिसमे  शहर में मौजूद बाल श्रमिकों के बारे में सर्वे करना था | चूँकि पत्रकारिता की भी छात्रा रह चुकी हूँ इसलिए चाहते हुए भी वो कीड़ा अपने अंदर से नहीं निकाल पायी हूँ, और कुछ हद तक ये बहुत अच्छा भी है शायद तभी  निष्पक्ष  और संवेदनाओं से परे रह कर काम कर पाऊँगी |
                                        इस सर्वे के दौरान अलग अलग लोगों से अप्रत्यक्ष रूप से लोगों से जानने का प्रयास किया की आखिर शहर में बाल श्रम की स्थिति क्या है पर जवाब संतोषजनक नहीं थे, तब अपने पत्रकारिता गुरु की सलाह पर कुछ देर के लिए सोशल वर्कर से फिर पत्रकार बन कर सर्वे का काम शुरू किया | आपको जानकर आश्चर्य होगा ३० मिनट के अंदर ही १०० से  १५० बाल श्रमिक सामने आ गए | सर्वे का काम तो उस वक्त हो गया, पर एक नया सवाल मेरे सामने खड़ा हो गया |
                                           इस दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसे बाल श्रमिक से हुई जिसने मुझे फिर नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया | मैंने जब उस बच्चे से पूछा की क्या वो मुफ्त में पढाना लिखना चाहेगा | तो उस महज १०-११ के बच्चे का जवाब था " पागल हूँ क्या, पढ़ाई किसको करनी है, हाँ पैसा कमाने का कोई और तरीका हो तो बताओ "| मुझे हंसी भी आई और बहुत हैरानी और अफ़सोस भी हुआ |   समझ ही नहीं आया कि इस बच्चे कि बात को किस तरह से लूं | कहीं ऐसा तो नहीं कि हम किसी गलत दिशा में प्रयास कर रहे हैं |

              हाँ हम गलत दिशा में ही प्रयास कर रहे हैं | हम [ यानि सरकार] लगातार स्कूल खोलते जा रहे हैं , आये दिन सरकारी योजनाओं के तहत स्कूल खुलते हैं , उनमे भोजन मिलता है , किताबें भी मुफ्त मिलतीं हैं और तो और यूनिफार्म भी मुफ्त ही मिलती है | पर क्या सरकार ने कभी भी ये जानने की कोशिश की कि क्या इन स्कूलों में जितने बच्चे पढ़ रहे हैं वो वास्तव में पढ़ना भी चाहते हैं या नहीं | शायद  नहीं ! और बिना सोचे समझे वो इन शिक्षा सम्बन्धी योजनाओं पर पानी की तरह पैसा बहा रही है |

                                             एक मिनट आप लोग ये बिलकुल मत सोचियेगा की मैं देश की भावी पीढ़ी की शिक्षा के पक्ष में नहीं हूँ | मेरी ऐसी सोच बिलकुल नहीं है | मैं भी भी चाहती हूँ की हमारा देश विश्व का सबसे शिक्षित देश बने | पर उसके लिए सबसे पहले उस भावी पीढ़ी के मन में ये सोच डालनी होगी की शिक्षा के बिना वो अल्पकालिक धनार्जन या तरक्की तो कर सकते हैं पर दीर्घकालिक विकास और तरक्की के लिए शिक्षा के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है |

                             इस वक्त इन बच्चों को स्कूल से ज्यादा किसी अच्छे काउंसलर यानि किसी अच्छे परामर्शदाता की ज़रूरत है , जो की सर्वप्रथम इनकी सोच बदल सके | क्यूंकि बिना सोच बदले सरकार लाख स्कूल बना ले पर इस बच्चों को शिक्षित नहीं कर पायेगी | एक बार कभी अपने इलाके के किसी सरकारी स्कूल में जाकर देखिये ७० से ७५ प्रतिशत बच्चे तो आपको वहाँ सिर्फ मिड-डे-मील के लालच में ही दिखेंगे | गलती इनकी भी नहीं है एक भूखा इंसान किताबों से तो पेट नहीं भर सकता, और वो भी बच्चे , बिलकुल नहीं |

                                     ये जो कुछ भी मैं कह रही हूँ ये कोई कल्पना नहीं है , ये वो सच है जिसे आप जब चाहें जांच सकते हैं | सिर्फ एक बार किसी बाल श्रमिक को रोक कर उससे पूँछिये कि मुफ्त स्कूल और कमाई में वो क्या चुनेगा ? यकीन मानिये ९५ प्रतिशत से ऊपर बच्चा कमाई ही चुनेगा |   कारण उस सोच कि कमी | बच्च आपना भविष्य खुद नहीं देख सकता , हमें उसे सपने देखना सिखाना होगा | हमें उसे ये बताना होगा कि अगर असल तरक्की चाहिए तो पढाना ही पड़ेगा | उसमे पढई के प्रति रूचि डालनी होगी |  वरना ये बेवजह स्कूलों कि भीड़ लगाने का कोई फायदा नहीं होने वाला |

Monday, September 12, 2011

हाँ सर क्या लेंगे आप !

                       
                                                                  हं हं ये ज़रूरी नहीं की हर बार आपको इतने ही शिष्ट और सभ्य शब्द सुनाई दें कभी कभी तो ऐसे कर्कश ध्वनि आपके कानों में गूंजती है की आपका कुछ खाने का मन ही नहीं करेगा | क्यूँ ऐसा आपके साथ कभी नहीं हुआ | मिडिल क्लास नहीं होंगे ना, इसलिए | देखिये मैंने बहुत अच्छे रेस्टोरेंट्स में भी खाना खाया है और साधारण से दिखने वाले ढाबों पर भी खाया है |

                                     हर जगह अलग-अलग नज़ारे देखने को मिलते हैं | अगर किसी शिष्ट जगह पहुँच गए तो आप एकाएक स्वयं को किसी बड़े राजा महाराजा से कम महसूस नहीं करेंगे | होटल का वेटर आपको इतना  आदर देगा जितने की शायद आपको आदत नहीं होगी | पर क्या करे बेचारा घर पर बीवी से चाहे  कितनी ही बुरी तरह से झगडा कर के आया हो आपका स्वागत वो मुस्कुराहट के साथ ही करेगा | बड़ा अच्छा लगता है | एक साफ़ सुथरी मेज़ पर वो बिलकुल चमचमाते गिलासों में पानी लाकर देगा | आपको भी प्यास लगी होगी पर आप आस पास के लोगों पर अपनी नज़र दौड़ाएंगे की वो इस परिस्थिति में क्या कर रहे हैं | यकीं मानिये अगर पड़ोस की टेबल पर बैठे सूटेड बूटेड आदमी ने पानी नहीं पिया है तो आप भी सहर्ष प्यासे मरना स्वीकार करेंगे | फिर आप नज़र डालेंगे मेन्यू पर | पहली बार में तो आप सारी डिशेज का रेट देखेंगे, फिर शुरू होगा औड मैन आउट वाला सिस्टम | यानि आप हर उस चीज़ को अपनी पसंद से बाहर करने का प्रयास करेंगी जो असल में आपके बजट के बाहर हैं | अब बारी आयेगी आपकी बीवी की जो शत प्रतिशत आपका ही अनुसरण करेगी, एक सीधा सा जवाब जो अपने लिए मंगा रहे हैं वही मंगा लीजिए | आप उन्हें थोड़ी अजीब सी निगाहों से देखेंगे और सोचेंगे की काश कुछ और ऑर्डर करती तो वो भी खाने को मिल जाता | पर चलो कोई बात नहीं जो है वही खाते हैं | अब बारी आएगी सबसे बड़ी परीक्षा की यानि बच्चों की | अगर धोखे से पूंछ लिया तो मान कर चलिए की मेन्यू की सबसे कीमती डिश पर ही उंगली जायेगी | अब क्या करें, अब आप उसे अपनी पूरी ताकत लगा कर उसे समझाने का प्रयास करेंगे की बेटा ये बिलकुल अच्छा नहीं है या ये बहुत सारा है आप इसे खा नहीं पायेंगे और ना जाने क्या क्या | बच्चा अगर समझदार हुआ तो आपका इशारा समझ जायेगा पर अगर वो कलयुगी संतान हुई तो ये मान लीजिए आपका बजट बिगडने वाला है |



           यहाँ तक का सफर तो फिर भी ठीक था | अब बारी आयेगी उस अमूल्य भोजन को गले से नीचे उतारने की | वेटर बहुत ही सफाई से आपकी टेबल पर आपका सारा आर्डर लाकर रखेगा | अचानक एक ज़ोरदार धमाका होगा जानते हैं ये क्या हुआ, असल में आपके बच्चे ने टेबल पर रखा पानी का गिलास गिरा दिया होगा | आप एक लज्जित और अर्धविक्षिप्त मुस्कुराहट से आस पास के लोगों को देखते हुए कहेंगे की आज कल के बच्चे बहुत शैतान हो गए हैं | उसके बाद धीमे से अपने बच्चे को चुटकी काटते हुए उसे कहेंगे की घर चलो तब बताऊँगा, आज के बाद कभी घुमाने नहीं ले जाऊँगा | बच्चे को एकाएक अपनी गलती का अहसास होता है, और वो शांत हो जाता है | अब आप खाना खाना शुरू करते हैं | छुरी कांटे से खाना आपके लिए थोडा मुश्किल होगा पर आखिरकार आप फ़तेह पा ही लेंगे | और आखिर में वेटर को पेमेंट के दौरान सिर्फ रौब दिखाते हुए एक अच्छी खासी टिप देकर वहाँ से एक विजयीभव् जैसा भाव लेकर वहाँ से बाहर निकलेंगे |
                    कहानी यहीं खतम नहीं होगी असल में ये कहानी अगले दिन आपके दफ्तर और पड़ोसियों तक भी   किसी ना किसी रूप में जायेगी | और तब समाप्त होगा आपका असली राजसी दिन |

     
              इस पूरी कथा के बाद अब आते हैं एक दूसरे चित्र पर जो ज्यादा आम है | ये जिंदगी है स्ट्रीट फ़ूड की, नुक्कड़ पर बिकने वाली चाट और पानी पूरी की | जो मेरे हिसाब से उस आलिशान होटल के खाने से कहीं ज्यादा स्वादिष्ट है | खास तौर पर आज मैं सभी महिला ब्लोगर्स को उनके पुराने या वर्तमान दिन याद दिलाने का प्रयास करूंगी | जब कॉलेज के बाहर लगे ठेलो पर अपनी सहेलियों के साथ खूब गोल गप्पे खाए हैं | आज भी जब कभी भी इन ठेलों के सामने से गुज़रना होता है तो हम वहाँ से कुछ खाए बिना नहीं रह पाते | सच कहूँ तो कोई फर्क नहीं पडता था की वो ठेला कैसा है उसने हाँथ धोए हैं या नहीं | मज़ा तो तब आता था जब कुछ सेकण्ड इंतज़ार के बाद आपका नंबर आता है तो एन उसी वक्त कोई और अपनी कटोरी आगे कर देता था | ऐसा लगता था मानो किसी ने हमसे हमारी पूरी जायदाद ले ली हो |एक और चीज़ जो अक्सर गर्ल्स कॉलेज के बाहर मिलती है, जिसे मैंने तो नहीं चखा पर हाँ अपनी सहेलियों को खाते हुए ज़रूर देखा है और वो है इमली  और वो रंग बिरंगा चूरन और साथ में एक और ठेला जहाँ कुछ ठंडा मिलता था याद आया वो रंग बिरंगे बर्फ के गोले और फलूदा | ये तो मैंने खाया है और आज भी अगर मौका मिलता है तो  उसे छोडती नहीं हूँ |


                 सच कहूँ तो ये सब चीज़ें सिर्फ और सिर्फ हमारे देश में ही मिल सकतीं हैं | ये वो स्वाद हैं जो सिर्फ आपकी ज़बान पर नहीं आपके दिल में रहते हैं | आप जब भी चाहें इनको बिना खाए इनका स्वाद ले सकते हैं | मुझे यकीन है इस पोस्ट को पढने के दौरान भी आप में से कईयों के मुंह में पानी आ गया होगा | तो कोई बात नहीं ये तो हमेशा हमारे बजट में आएगा | तो चलिए चलते हैं फिर उन्ही ठेलों पर | और कहते हैं "भैया थोडा मटर और डालो ना या थोडा पानी और मिलेगा"|





Monday, September 5, 2011

HAPPY TEACHER'S DAY.



सभी गुरुजनों को शिक्षक दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें |

Thursday, September 1, 2011

गणपति बाप्पा मोरिया !



सभी देशवासियों को गणेश चतुर्थी की बहुत बहुत शुभकामनायें |

Tuesday, August 30, 2011

ईद मुबारक !



सभी देशवासियों को ईद की बहुत बहुत बधाई |

Saturday, August 20, 2011

मेरा सपना पूरा हुआ !

                   



                                   
                                                         बचपन से लेकर आज तक मेरे मन में हमेशा ये मलाल रहा था कि आज़ादी कि लड़ाई में मैं अपना योगदान नहीं दे पाई थी पर आज कि परिस्थितियों में मुझे ऐसा लगता है कि शायद मेरा ये सपना पूरा हो जायेगा | हो सकता है कि इस मिशन मैं उतना एक्टिव पार्टिसिपेशन ना कर पाऊँ पर इंटरनेट की सहायता से  कुछ ना कुछ योगदान तो दे ही रही हूँ |

                 पर एक अफ़सोस है , अफ़सोस इस बात का कि आज कि इस पीढ़ी असल में देश के मोल को समझ ही नहीं पायी है |  वो ये समझ ही नहीं पाई है कि उन्हें ये आज़ादी आखिर मिली कैसे है | कितने लोगों ने अपनी जाने दिन हैं तब जाकर वो आज खुली हवा में साँस ले रहे हैं | वरना आज भी वो शायद किसी गोरे के जूते साफ़ कर रहे होते | आज़ादी की  उस जंग में  शायद उनके अपने शहीद नहीं हुए हैं , तभी वो इस बात का अंदाज़ा नहीं लगा पाते की देश असल में होता क्या है | उनके लिए भारत का मतलब सिर्फ किसी फॉर्म में नागरिकता का कॉलम भरने तक ही सीमित है |  उन्हें जो मिल गए उसी में खुश हैं , अपनी तरफ से इस देश को कुछ देना ही नहीं चाहते | 
               भारत में आई आई एम , आई आई टी से पढ़ लिखकर वो उन्ही गोरों के साथ काम करने में फक्र महसूस करते है जिन्होंने हमें लूटा था |  चले जाते हैं ये देश छोड़ कर गैर मुल्कों में |समझ नहीं आता ये कैसी पीढ़ी है ?  जो तरक्की के तरीके अपने मुल्क से सीखती है और तरक्की करती किसी और की है | 

                     देश में इस वक्त चल रही जन लोकपाल की बयार ने कहीं ना कहीं थोडा सुकून तो दिया ही है | आज अरसे बाद हम कही ना कहीं फिर से एक हो रहे हैं | शायद इस बात से हमारी इस नयी पीढ़ी पर कोई असर पड़े और  फिर एक बार देश में भगत सिंह , राजगुरु , सुखदेव , रानी लक्ष्मीबाई , दुर्गा भाभी जैसे क्रांतिकारी चेहरे दिखाई दें | 
         देश में हो रही इस नयी क्रांति के मिशन में शामिल होकर  मेरा तो वो बरसों पुराना सपना पूरा हो गया | और मुझे इस बात की भी पूरी उम्मीद है की असल में ये क्रांति ही देगी हमें असल आज़ादी |

                                       वंदे मातरम , वंदे मातरम , वंदे मातरम |
                                                      

Monday, August 15, 2011

वन्दे मातरम !

आज सिर्फ तस्वीरें ही बोलेंगी |  जय हिंद , जय भारत |

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जश्न - ए- आज़ादी 
स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें | जय हिंद जय भारत |

Sunday, August 14, 2011

भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान= एक ख़्वाब


        इस ब्लॉग को पढ़ने से पहले कृपया कोई देशभक्ति गाना पूरी तरह से डाउनलोड कर ले , यकीं मानिये ये ही आपको असल सोच देगा इस ब्लॉग को पढ़ने की |  ब्लॉग को पढ़ते वक़्त वो गीत साथ में सुने  | 
       This is my humble request .

                                   कहते है की प्रेम का धागा अगर टूट जाये तो लाख जोड़ने की कोशिश करो मगर फिर भी एक गांठ हमेशा रह ही जाती है , जो लाख कोशिश के बाद भी नहीं जाती |  लेकिन क्या हो अगर हम धागा ही बदल दें तो ?  हाँ सही समझा आपने मैंने कहा कि क्या हो अगर धागा ही बदल दें | और एक बार फिर एक नए और लोहे जैसे मज़बूत धागे में फिर से उन बिखरे हुए मोतियों को पिरो दें | थोडा अजीब तो लगा होगा आपको ये पढ़कर पर विश्वास रखिये ये हो सकता है | आप कर सकते हैं , हम कर सकते हैं , हम सब कर सकते हैं | 

                           14 अगस्त सन 1947 पाकिस्तान का नामकरण , 15 अगस्त 1947 भारत का नामकरण | एक खेल जो खेला था उन विदेशी ताक़तों ने जिन्होंने हम हम पर सैकड़ों साल राज किया और हमें तोड़ कर चले गए और आज तक मज़े से हमें लड़ते झगड़ते देख रहे हैं | सोचते होंगे 63-64 साल बाद आज भी देखो भिड़े पड़े हैं या तो वो हमसे ज्यादा समझदार हैं या फिर हम बहुत बड़े मूर्ख जो उनके इस खेल को 64 साल बाद भी समझ नहीं पाए | 
वो आज भी हमें नचाते है और हम कभी कश्मीर मुद्दे पर तो कभी परमाणु करार को लेकर नाचते हैं | एक कठपुतली की तरह | ये भूल कर की हममे इतनी ताकत है की हम कठपुतली की उस डोर को तोड़ भी सकते हैं | 

                             सन 1947 के उस विभाजन का दर्द क्या था ये हम और आप कभी समझ ही नहीं सकते हैं | क्यूंकि हम आज आपने परिवारों के साथ हैं | ये दर्द समझ सकते हैं सिर्फ वो लोग जिन्होंने ये झेला है | जिहोने इस बंटवारे में अपनों को खोया है | हमने तो ये सब सिर्फ किताबों में इतिहास की तरह पढ़ा और और भूल गए पर उनका क्या जो ये दर्द आज भी झेल रहे हैं | 
  दोष केवल विदेशी ताकतों का भी नहीं था | कुछ आपने ही गंदे ज़ेहन वाले लोगों ने भी आग में घी का काम किया | परिस्थितियां इस तरह की बना दी गयीं की ये चोट लगे | और फिर कह दिया गया की बंटवारे के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था | एक पल के लिए मान भी लिया जाये की माहौल बहुत बिगड़ गया था , पर क्या तब से अब तक इन 64 सालों में एक बार भी एसा मौका नहीं आया जब हम फिर से एक होने की कोशिश कर सकें |   लेकिन नहीं हमने की तो सिर्फ वार्ता , कभी सीमाओं को लेकर तो कभी आर्थिक मसलों को लेकर | पर नतीजा सिफ़र ही रहा |  कभी प्रेम का प्रतिक बसें चलीं तो कभी ट्रेने | पर इन बसों और ट्रेनों में प्रेम का ईंधन तो डाला ही नहीं गया |  सियासतदान अभी भी ये खेल खेल रहे हैं | दोनों ही लोकतान्त्रिक मुल्कों मे लोक यानि आम आदमी से तो कभी ये पूंछा ही नहीं गया की आखिर वो क्या चाहता है ? दोनों मुल्कों में किसी न किसी मुद्दे पर हर दो माह बाद चुनाव करा लिए जाते हैं | पर क्या इन 64  सालों में एक चुनाव भी एसा हुआ जिसमे आम इंसान से ये पूंछा गया हो की अब भारत और पाकिस्तान को एक बार फिर एक नहीं हो जाना चाहिए ? शायद नहीं | बाहरी लोग हमेशा इस ताक़ में रहते हैं की कब मौका मिले और हम इस सोच का फायदा उठायें | 

   
                       आने वाली 30 मार्च को मोहाली में भारत और पाकिस्तान का मैच है | ये तो तय है की कोई एक टीम तो हारेगी ही | पर हम किसी जीत के लिए कैसे खुश हो सकते हैं क्यूंकि असल में हम कहीं न कहीं हार भी तो रहे हैं |         एक बार सिर्फ एक बार सोचिये अगर वो बंटवारा न हुआ  तो क्या आज तस्वीर यही होती | नहीं बिलकुल नहीं , यक़ीनन नहीं |  हिन्दुस्तान की ही टीम में तब सचिन और अफरीदी  एक साथ ओपनिग करते और सामने होता कोई विदेशी मुल्क | एक मिनट के लिए अपनी आंखे बंद कीजिये और कल्पना कीजिये जो हिन्दुस्तानियों से भरा वो ग्राउंड ,  उस जोश की तीव्रता को आप आज इसी वक्त आपने दिल के रिक्टर पैमाने पर आंक सकते हैं | तब लाहौर या पेशावर जाने के लिए हमें और दिल्ली और लखनऊ जाने के लिए उन्हें किसी पासपोर्ट की ज़रुरत नहीं होती | वाघा बोर्डर पर हमारे बच्चे
क्रिकेट खेल रहे होते | सब कुछ बेहद खूबसूरत और खुशनुमा होता | चरों तरफ अमन , प्रेम और भाईचारा होता | 
  
     बहुत जी लिए हम अपने लिए आपने स्वार्थ के लिए , एक बार सिर्फ एक बार क्यूँ न हम जी लें आपने मुल्क आपने वतन के लिए | शहीदों ने अपनी जान मुल्क को विदेशियों से आज़ादी दिलाने के लिए दी थी ना कि अपनों से | 


      सन 1857 में एक क्रांति का बिगुल फूंका गया था  ताकि देश को विदेशी ताकतों से मुक्ति मिल सके 
  आज 26 मार्च सन 2011 में क्यूँ ना एक बार फिर बिगुल फूंका जाये , पर इस बार किसी को भागने के लिए नहीं बल्कि बिछड़ों को  मिलाने  के लिए , अपनो से मिलने के लिए  और एक बार फिर   भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान= एक ख़्वाब  को फिर से जीने के लिए और उसे हकीक़त में तब्दील करने के लिए | तो क्या आप तैयार हैं इस मिशन में शामिल होने के लिए | अगर हाँ तो ब्लॉग जगत से जुड़े हर हिन्दुस्तानी [ भारत + पाकिस्तान = हिन्दुस्तान ] के ब्लॉग पर ये सन्देश पहुँचाना चाहिए कि अब हम एक हैं |  1857  में भी इंक़लाब कलम ही लाया था और आज भी अमन कलम ही लायेगा | इस सोच को इतना फैलाइए कि आखिर दोनों मुल्कों में गूँज ही उठे ---------------


 MISSION REMOVE THE PARTITION '  
  

Thursday, August 11, 2011

महान वैज्ञानिक का जन्मोत्सव |



भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डा. विक्रम अंबालाल साराभाई ने भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र 

में अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर पहुँचाया। उन्होंने अन्य क्षेत्रों में भी समान रूप से पुरोगामी योगदान दिया: वे 

अंत तक वस्त्र, औषधीय, परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य क्षेत्रों में लगातार काम करते रहे।

डॉ. साराभाई एक रचनात्मक वैज्ञानिक, एक सफल और भविष्यदृष्टा उद्योगपति, सर्वोच्च स्तर के प्रर्वतक, 

एक महान संस्थान निर्माता, एक भिन्न प्रकार के शिक्षाविद्, कला के पारखी, सामाजिक परिवर्तन के 

उद्यमी, एक अग्रणी प्रबंधन शिक्षक तथा और बहुत कुछ थे।

डॉ. विक्रम साराभाई का जन्म पश्चिमी भारत में गुजरात राज्य के अहमदाबाद शहर में 12 अगस्त 1919 

को हुआ था। साराभाई परिवार एक महत्वपूर्ण और संपन्न जैन व्यापारी परिवार था। उनके पिता अंबालाल 


साराभाई एक संपन्न उद्योगपति थे तथा गुजरात में कई मिलों के स्वामी थे। विक्रम साराभाई, अंबालाल 

और सरला देवी के आठ बच्चों में से एक थे।


इंटरमीडिएट विज्ञान की परीक्षा पास करने के बाद वे इंग्लैंड चले गए और केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सेंट 

जॉन कॉलेज में भर्ती हुए। उन्होंने केम्ब्रिज से 1940 में प्राकृतिक विज्ञान में ट्राइपॉस हासिल किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बढ़ने के साथ, साराभाई भारत लौटे और बेंगलौर के भारतीय विज्ञान संस्थान में भर्ती 

हुए तथा नोबेल पुरस्कार विजेता, सर सी. वी. रामन के मार्गदर्शन में ब्रह्मांडीय किरणों में अनुसंधान शुरू

 किया।


युद्ध के बाद 1945 में वे केम्ब्रिज लौटे और 1947 में उन्हें उष्णकटिबंधीय अक्षांश में कॉस्मिक किरणों की 

खोज शीर्षक वाले अपने शोध पर पी.एच.डी की डिग्री से सम्मानित किया गया।

30 दिसंबर,1971 को कोवलम, तिरुवनंतपुरम, केरल में डॉ. विक्रम साराभाई का निधन हो गया।

पुरस्कार

शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार (1962)
पद्मभूषण (1966)
पद्म विभूषण, मरणोपरांत (1972)


महत्वपूर्ण पद

भौतिक-विज्ञान अनुभाग, भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष (1962)
आई.ए.ई.ए., वेरिना के महा सम्मलेनाध्यक्ष (1970)
उपाध्यक्ष, 'परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग' पर चौथा संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1971)

सम्मान
रॉकेटों के लिए ठोस और द्रव नोदकों में विशेषज्ञता रखने वाले अनुसंधान संस्थान, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष 

केंद्र (वीएसएससी) का नामकरण उनकी स्मृति में किया गया, जो केरल राज्य की राजधानी तिरूवनंतपुरम 

में स्थित है।

1974 में, सिडनी में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने निर्णय लिया कि सी ऑफ़ सेरिनिटी में स्थित चंद्रमा क्रेटर 

बेसेल (बीईएसएसईएल) डॉ. साराभाई क्रेटर के रूप में जाना जाएगा।

Tuesday, August 9, 2011

इतिहास एक याद [काकोरी कांड]












1924 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' चंद युवा क्रांतिकारियों द्वारा बनाया गया एक ऐसा संगठन जो 

संगठित सशस्त्र क्रांति पर विश्वास रखता था | 9 अगस्त सन 1925 को इस संगठन ने उत्तर रेलवे के 

लखनऊ सहारनपुर संभाग के काकोरी नाम के स्टेशन पर 8 डाउन ट्रेन पर डकैती डाल कर सरकारी खजाने 

को लूटा |

यही घटना इतिहास में काकोरी कांड कहलाई| इस पूरे मामले में कुल 29 लोगों की गिरफ़्तारी हुई| जिनमे से 

राम प्रसाद बिस्मिल , राजेंद्र लाहिड़ी , रोशन सिंह और अशफाकुल्ला खां को दिसंबर 1927 में फांसी हुई | 

शचीन्द्रनाथ सान्याल को आजीवन कारावास की सजा हुई | मन्मथ नाथ गुप्ता को 14 साल की सजा हुई | 

कई और क्रांतिकारियों को भी लंबी सजाए हुई |इस कांड में चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे पर वो अंग्रेजों के 


हाँथ नहीं आये | बाद में लाहौर केस में भी वो अपनी चतुराई से बच निकले , लेकिन 27 फरवरी सन 1931 

को इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में पुलिस से हुई मुटभेड में वो शहीद हो गए | इतिहास में युवा क्रांतिकारियों 

का ये अध्याय आज भी युवाओं की पहली पसंद है | आज भी ना जाने कितनी फिल्मों में इस क्रांति को बेहद 

ही खूबसूरती से दिखाया जाता है |

हम भारतीय है और हमारा ये फ़र्ज़ है की आज हम सब उन शहीदों को एक श्रधांजलि दें , और याद करें उनके 


बलिदान | और दुनिया को ये विश्वास दिला दें की क्रांतिकारी आज भी पैदा होते हैं | 









राम प्रसाद बिस्मिल 



सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।

रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।

यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

है लिये हथियार दुश्मन ताक मे बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिनमें हो जुनून कटते नही तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला सा हमारे दिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न
जान हथेली में लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल मैं है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

दिल मे तूफानों की टोली और नसों में इन्कलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमे रोको न आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल मे है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

--राम प्रसाद बिसमिल





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Monday, July 25, 2011

इनका क्या दोष ?

                                           कहते हैं कि प्रेम ही इस धरती पर मानव उत्पत्ति का कारण है | फिर किसी अबोध की उत्पत्ति पाप कैसे हो सकती है ? क्यूंकि यक़ीनन प्रेम पाप तो नहीं ही  है |  पर ऐसा होता है | कम से कम हमारे देश में तो होता ही ही | क्यूँ आखिर जिस रफ़्तार से हमारे देश में अनाथ आश्रम बढ़ रहे हैं , वो कहीं न कहीं समर्थन तो इसी बात का कर रहे हैं |  और अगर हम कुछ देर के लिए या मान भी लें कि ये पाप है तो जिसने वो पाप किया सजा उसको मिलनी चाहिए, पर नहीं हम सजा देते हैं उस नन्ही सी जान को जो न चाहते हुए भी इस पाप का भागीदार बन जाता है | 

                   एक ऐसा ही किस्सा मैं आज आपको बताने जा रही हूँ | अपने शहर कानपुर में ही पत्रकारिता की पढाई के दौरान एक बार मेरे ग्रुप और मेरे टीचर्स ने ये सोचा कि हम बाल दिवस किसी खास अंदाज़ में मनाएंगे | तो हमने फैसला किया की हम इसे अनाथ आश्रम में मनाएंगे | हमारे शहर में मदर टेरेसा के नाम का एक अनाथ आश्रम है | इस आश्रम मे बहुत छोटे यानि नवजात बच्चों को रखा जाता है | हम सब बहुत ख़ुशी ख़ुशी  वहां पहुंचे | लेकिन वहां का दृश्य देखकर मैं अन्दर तक हिल गयी | मासूम गोद के बच्चे झूलों में लेटे थे |  हालाँकि जो तस्वीर आपको सामने दिख रही है वो वहां की तो नहीं है , पर वहां का दृश्य लगभग ऐसा ही था |

                                 इतने मासूम और प्यारे बच्चे जिन्हें देखकर अपने मन में किसी भी तरह का पाप लाना भी एक बहुत बड़ा पाप ही होगा | बहुत बुरा लगा देखकर, कोई कैसे अपने हिस्से को अपने से अलग कर सकता है | अनाथ आश्रम का वो दृश्य मुझे कई रातों तक सपनो में दिखा | ऐसा लगता था मानो वो बच्चे मुझे बुला रहे हों | मेरी ज़िन्दगी में ये कोई पहला वाकया नहीं था , इससे पहले भी दो बार मैंने कुछ ऐसा ही सुना भी था |
         
                                 मेरे एक रिश्तेदार एक अस्पताल में भर्ती थे, उन्ही के बगल के एक जनरल वार्ड मे कोई महिला पैदा होते ही अपने बच्चे को वहीँ छोड़ कर चली गयी | जनवरी की भीषण सर्दी के दिन थे वो, वो मासूम ठण्ड से कांप रही थी, कुछ देर बाद अस्पताल वालों ने उसे दूध दिया और एक कम्बल में लपेट कर सुला दिया  | मै तो उस वक्त अस्पताल में नहीं थी , पर घर आकर वो पूरा किस्सा मेरी माँ ने मुझे बताया |  बहुत अजीब लगा सुन कर | मैंने माँ से कहा की क्या हम उस बच्चे को गोद नहीं ले सकते, पर माँ ने माना कर दिया उस दिन मेरी मौसी भी घर आयीं थी | बहुत मनाने और पूरी रात जागने के बाद आखिर मेरी मौसी उसे गोद लेने को तैयार हो गयीं |
                मेरी माँ और मौसी अगले दिन अस्पताल पहुंचे पर हमारे पहुँचने से पहले ही कोई और उस बच्ची को गोद लेकर चला गया था | घर आकर मम्मी ने मुझे ये सब बताया | ख़ुशी हुई की कम से कम अब वो बच्ची अनाथ तो नहीं कहलाएगी |

केवल इतना ही नहीं एक बार अखबार में मैंने एक मासूम बच्ची के रेलवे ट्रेक पर पड़े होने की खबर पढ़ी | उस रिपोर्टर से व्यतिगत रूप से मिल कर पूरी बात जानने की कोशिश  की | जिस वक्त उस बच्ची को उस रिपोर्टर ने देखा  बच्ची की जबान एक जानवर के मूंह मे थी | आसपास खड़े लोग सिर्फ तमाशा देख रहे थे |  और उस बच्ची को मारा हुआ समझ कर उसे नुचते हुए देख रहे थे | उस जानवर को हटाने के बाद जब देखा गया तो वो बच्ची जिंदा थी | उसे किसी तरह उसी वक्त अनाथ आश्रम पहुंचा दिया गया | आज वो बच्ची लगभग 5 -6 साल की होगी और पूरी तरह से स्वस्थ है और एक अच्छे परिवार की सदस्य भी है |

                           
                    लेकिन यक़ीनन हर अनाथ बच्चे की किस्मत इन दोनों बच्चों जैसी नहीं होती | आज भी हमारे देश में कई ऐसे अनाथ आश्रम हैं जहाँ इन बच्चो की अच्छी परवरिश होती है | पर यक़ीनन माँ बाप जैसा प्यार तो उन्हें नहीं मिल पाता होगा | समझ नहीं आया की आखिर क्यूँ और कैसे कोई इन्हें अपने से अलग कर सकता है | अरे एक जानवर के बच्चे को  भी देखकर हम उससे प्यार करने लगते है तो कोई कैसे नौ महीने तक एक नन्ही सी जान को अपने अन्दर रखने के बाद इस तरह सड़क पर मरने के लिए छोड़ सकता है  |
 कुछ लोगों का कहना है की परिस्थितियाँ ही ऐसी बन जातीं है जो उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर देती हैं , पर मै नहीं मानती , क्या आपके चोट लगने पर और उसके ज़ख्म बनने पर भी क्या आप खुद अपने उस हिस्से को काट सकते हैं  यक़ीनन नहीं | तो फिर ये क्यूँ |

                              सोचने का विषय है , एक बार फिर नए सिरे से सोचिये , शायद सोच बदल जाये, और अगर फिर भी सोच न बदले तो एक बार किसी अनाथ आश्रम चले जाइये, सोच यक़ीनन  बदल जाएगी |


                                           
                                                   बच्चे तो बच्चे हैं फिर क्या पाप क्या पुण्य |

Thursday, June 30, 2011

जीवन के 29 बसंत !

                                        

                                         आज मेरा जन्मदिन है | आज ही के दिन वर्ष 1982 में सुबह ठीक 11:30 बजे मैं इस धरती पर आई थी | अपने माता पिता की पहली संतान होने के कारण उनकी बहुत लाडली रही हूँ | उस पर भी मम्मी पापा की शादी के 11 साल बाद मैं हुयी तो सबका प्यार और बढ़ गया | एक संयुक्त परिवार में मेरा जन्म हुआ , दादी, ताउजी, ताईजी, उनके २ बेटे, चाचा , चाची उनका एक बेटा , बुआ फूफाजी और उनका भी एक बेटा और मेरा रियल भाई जो मुझसे 3 साल छोटा है और कंप्यूटर इंजिनिअर है | ये है मेरा परिवार | इतने सारे भाइयों में में अकेली बहन | दादी और ताउजी तो अब इस दुनिया मे नहीं हैं पर बाकि पूरा परिवार आज भी साथ ही रहता है | बहुत अच्छा लगता है की आज भी हमारा परिवार संयुक्त परिवार की प्रथा पर ही चल रहा है |
                                                        आज मैंने सोचा की क्यूँ न अपने इस नए ब्लॉग परिवार के साथ अपनी ज़िन्दगी बाटूँ | अपनी शुरूआती ज़िन्दगी मे बहुत ही सामान्य छात्रा हुआ करती थी | डांट भी पड़ती थी घर पर भी और टीचर की भी |पर मुझे दोस्त बनाने का शौक हमेशा से रहा है, जो आज भी बदस्तूर जारी है |

                                                     वक्त के साथ  धीरे धीरे  मैं पढाई में काफी रूचि लेने लगी |  2004 मे अपने पोस्ट ग्रेजुएशन के दौरान कॉलेज मे सबसे ज्यादा मार्क्स लाकर मैंने मनोविज्ञान में टॉप किया | और तब शुरू हुयी मेरी असली जंग | क्यूंकि अब शुरू होना था मेरा करियर | हालाँकि इसे लेकर मेरे मन मे कभी कोई दुविधा नहीं रही | मेरे लक्ष्य हमेशा क्लीयर था | बस उस तक पहुँचाने का रास्ता समझ नहीं आ रहा था |  साल 2003 में मैंने देश की सबसे बड़ी परीक्षा I .A .S . देने का निश्चय किया क्यूंकि यही वो रास्ता था जो मुझे मेरे लक्ष्य तक पहुंचा सकता था | एक साल की कठिन मेहनत के बाद मैंने 2004 की  I .A .S . की परीक्षा दी | पर इतनी मेहनत के बाद भी मुझे सफलता नहीं मिली |उस रात शायद  मैं अपनी ज़िन्दगी में सबसे ज्यादा रोई | निराशा तो बहुत हुयी , पर बचपन से लेकर आज तक कभी हार मानना तो सीखा ही नहीं था , तो फिर ठाना की अगला प्रयास फिर दूँगी , पर इस बार भी निराशा ही हाँथ लगी | इतना ही नहीं फिर कोशिश करके तीसरा प्रयास भी दिया पर फिर निराशा ही मिली | सच कहूं तो उस दौरान में पूरी तरह से अवसाद यानि डिप्रेशन मे चली गयी थी | पर फिर भी न जाने कौन सी ताकत मुझमे हर बार जोश भर देती थी |
                                         
                                                       साल 2008 तक आते आते मैंने तकरीबन 12 परीक्षाएं दीं पर किसी एक में भी सफलता नहीं मिली | अब तक तक तो लोगों के व्यंग भी शुरू हो गए थे , लड़की है कब तक पढ़ोगे आगे भी तो सोचना है, वगैरह वगैरह | पर शायद इस वक्त मेरे परिवार ने मेरा बहुत साथ दिया दुनिया की परवाह न करते हुए एक रात  मेरे पापा मेरे पास आये और पूछा - आगे क्या सोचा है ? एक पल के लिए तो मैं डर गयी की कहीं पापा ने समाज के आगे घुटने तो नहीं टेक दिए | पर अगले ही पल पापा के शब्दों ने ये एहेसास करा दिया की नहीं मेरा परिवार वाकई में सबसे अलग है | पापा ने साफ़ साफ़ कहा की जब तक तुम नहीं चाहोगी हम तुमसे शादी के बारे में कोई बात नहीं करेंगे, कुछ और करना चाहती हो तो बताओ , मैं अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता हूँ | मैंने पापा से कुछ वक्त माँगा |

                                                          मुझे अभी भी याद है की वो रात मेरी ज़िन्दगी की सबसे अजीब रात थी , समझ ही नहीं आ रहा था की ऊपर वाले का शुक्रिया करूं इस परिवार के लिए , या उससे नाराज़ हो जाऊं अब तक इतनी निराशा देने के लिए | मैं उस रात भी बहुत रोई , क्यूंकि कुछ समझ नहीं आ रहा था | पर हर बार की ही तरह इस बार भी किसी अंजान शक्ति ने मेरी मदद की | सुबह होते ही मैंने पापा से कहा की मुझे जर्नलिज्म करना है | मेरा सिर्फ इतना सोचना था की मेरी अब तक की पढाई बेकार भी न जाये और मैं अपनी असल मंजिल तक पहुच भी जाऊं | पापा ने भी हाँ कर दी | और मैंने अपने ही शहर के एक बहुत ही अच्छे संस्थान में दाखिला ले लिया | अपनी इस पढाई के दौरान मुझे यकीं हो गया  की अब मुझे मेरी मंजिल मिल ही जाएगी, इस संस्थान की टॉपर बनने के साथ ही  इस दौरान बहुत अच्छे और रसूक वाले लोगों से मुलाकात भी  हुयी | इसी दौरान मैंने राष्ट्रीय सहारा अखबार और लखनऊ दूरदर्शन में ट्रेनिग भी की | क्यूँ की मुझे कोई पत्रकार नहीं बनना था इसलिए मैंने शहर के ही कुछ लोकल चंनेल्स में एज मेनेजिंग एडिटर काम किया | पर मुझे यहाँ का माहौल रास नहीं आया | सही मुझे करने नहीं दिया गया और गलत मैं कर नहीं सकी | लिहाज़ा एक दिन बहुत उदास और क्रोधित मन से मैंने इस दिशा से भी नमस्कार कर लिया |
                                               

                                           जीवन मे एक बार फिर अवसाद यानि डिप्रेशन का दौर आया | 2003  से 2010 तक इतनी मेहनत के बाद भी मेरे हाँथ मे कुछ नहीं था | मैंने लोगों से मिलना बंद कर दिया, कही नहीं जाती थी | एक बार तो मन मे आया की अपनी ज़िन्दगी ही खत्म कर दूं , आखिर मेरी वजह से मेरे माता पिता क्यूँ समाज के ताने झेलें | पर फिर किसी अंजान ताकत ने मुझे रोका | नहीं जानती वो कौन है | पर एक रात अचानक नेट पर ब्लोगर के बारे में पता चला , हालाँकि इससे पहले भी मैं इसके बारे मैं अपने टीचर से सुन चुकी थी | ऐसा लगा मानो फिर मुझे एक नया रास्ता मिल गया | बहुत सारे गुरू ,दोस्त मुझे यहाँ मिले | वो दोस्त जिन्हें में जानती नहीं थी पर फिर भी वो अपने थे | लिखने का शौक शुरू से ही रहा था तो वो यहाँ काम आया | हालाँकि अब परिवार से भी शादी का दबाव बढ़ने लगा है, तो मैंने भी पापा के सामने हामी भर दी | आज मेरे मम्मी पापा मेरे लिए रिश्ता ढूंढकर अपना काम कर रहे हैं और मैं ब्लॉग लिखकर अपना काम कर रही हूँ |  

                                                         

                                              आज मैं लिखती हूँ और खुश हूँ | हालाँकि मेरा सपना  अभी तक पूरा नहीं हुआ है, पर मैं जानती हूँ की वो अनजान ताकत आज नहीं तो कल मेरे सपनों को पूरा करने में मेरी मदद ज़रूर करेगी और अब तो बहुत सारे नए गुरुजनों और दोस्तों की दुआएं भी मेरी ज़िन्दगी में शामिल हो चुकी हैं | मुझे पूरा यकीं है की मेरे सपना ज़रूर पूरा होगा |
                                 
                          आप सबकी दुआओं और आशीर्वाद के इंतज़ार में |
                                                                                                                                         


                                                                नमस्कार |

Thursday, June 23, 2011

मजबूरी , ख़ुशी या ज़बरदस्ती !!

                                            कभी - कभी  पोस्ट का टाइटल देखकर ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है की आखिर पोस्ट है किस विषय पर | लेकिन आज मैं जिस विषय पर पोस्ट लिखने जा रही हूँ वो कहीं न कहीं समाज द्वारा स्वीकृत मुद्दा नहीं है | हमारे समाज का एक ऐसा हिस्सा जिसे आज भी बहुत अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता है | जी हाँ मैं बात कर रही हूँ prostitution यानि 'वेश्यावृत्ति' की |  थोडा संवेदनशील मुद्दा है पर यक़ीनन है तो हमारे ही समाज का हिस्सा |  



                                     पिछले कई दिनों से मै देख रही हूँ की वर्तमान में बलात्कार और और प्रेम विवाह में असफल होने पर आत्महत्या के मामले कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं | कहीं वेश्यावृति जैसी समस्या के पीछे ऐसा ही तो कोई कारण नहीं है ? हो भी सकता है और नहीं भी | 
                     अगर आंकड़ों की बात करे तो यूनिसेफ के मुताबिक हमारे देश में तकरीबन 9 लाख sex workers है  जिनमे से 30% बच्चे हैं | इन आंकड़ों में प्रतिवर्ष 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि भी दर्ज की जा रही है | मुंबई, दिल्ली , मद्रास . हैदराबाद, कोलकाता और बंगलोर केवल इन्ही 6 शहरों में ही कुल आंकड़ों का तकरीबन 15 प्रतिशत भाग देखा गया है | जिसमे से लगभग 30 प्रतिशत की आयु 20 साल से भी कम हैं |
 बात अगर कारणों की करे तो तीन सबसे महत्वपूर्ण कारण  सामने आये :-

{1 }- अशिक्षा   
{2 }- आर्थिक विपन्नता  
{3}- गलत संगत
                              पहले दो कारण तो जग ज़ाहिर हैं , पर वर्तमान समय मे इस समस्या का सबसे तेजी से उभरता कारण तीसरा कारण ही है | जहाँ मासूम बच्चियां सिर्फ गलत संगत में पड़ कर अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर बैठती हैं | वेश्यावृत्ति की ये समस्या आज से नहीं है , देवदासियों के नाम पर हमारी भारतीय संस्कृति मे ये कुप्रथा बहुत ही पुरानी है | जो कहीं न कहीं आज भी दक्षिण भारत में जिंदा है | 
                                                     समस्या गंभीर है और इसका निवारण भी ज़रूरी है | हालाँकि कई स्वयं सेवी  संस्थाए इस दिशा में काम कर रही हैं , पर क्या कभी किसी ने ये सोचा  है की इस पीढ़ी तक तो ठीक है पर इन prostitutes की अगली पीढ़ी का क्या होगा , उनका भविष्य का क्या होगा ?  मजबूरी , ख़ुशी या ज़बरदस्ती किसी भी कारण से ही सही अगर अगली पीढ़ी को भी ये पेशा अपनाना पड़ा तब क्या होगा | समस्या तो कहीं न कहीं वहीँ पर ही रह गयी | 
                       हालाँकि कुछ पश्चिमी सभ्यता को मानने वाले लोग इसे भी एक व्यवसाय ही मानते हैं, उनका मानना है की आखिर वो भी तो उनका करियर ही है |  पर मै ये बिलकुल नहीं मानती | मेरे हिसाब से  करियर सिर्फ वो ही होता है की जो आपका विकास करे न की आपको पतन की ओर ले जाये | 
                                            बेहेतर यही है की इस समस्या का जल्द ही कोई उपाय निकला जाये ताकि आगे आने वाली पीढ़ी  मजबूरी , ख़ुशी या ज़बरदस्ती किसी भी वजह से इस दलदल मे न फसें |       

   

Sunday, June 12, 2011

तो ये हक़ भी हमें दो !!

                                      हमारा देश एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था वाला देश है | एक ऐसी व्यवस्था जहाँ जनता के वो प्रतिनिधि जिन्हें हम नेता कहते है जनता के द्वारा ही चुने जाते हैं | हर बार हम चुनावों के दौरान अपने पसंदीदा नेता को वोट देकर एक ज़िम्मेदार पद पर आसीन करते हैं , इस आशा में की इस बार ये नेता हमारी तकलीफ और दर्द समझेगा और उसका निदान करेगा | पर क्या हर बार ऐसा होता है ?   शायद नहीं | हर बार हम वोट देने के चन्द दिनों बाद ही पछताने लगते हैं | ये सोच कर की शायद हमारा वोट इस बार भी बेकार हो गया | हम इस बार भी सही उम्मीदवार का चुनाव करने मे चूक गए | पर अब क्या हो सकता है !!
    
                                                         हो सकता है यकीं मानिये बिलकुल हो सकता है | सिर्फ एक कदम और फिर एक ही झटके में इस देश से भ्रष्टाचार न गायब हो जाये तो कहियेगा | हालाँकि कदम थोडा कठिन है पर यदि देश में फ़ैल रही गन्दगी की  वाकई में सफाई करनी है तो इस तरह के ठोस कदम तो उठाने ही पड़ेंगे | 

                                           
                              एक उदाहरण से समझाती हूँ शायद ज्यादा सटीक समझा सकूं , जिस तरह कोई सामान बाज़ार से लेने के बाद अगर वो ख़राब निकल जाये तो हमारा ये हक़ है कि हम वो सामान उस दुकानदार को वापस करके या तो नया सामान ले लें या फिर हमारे पैसे वापस ले लें | क्यूंकि एक लोकतान्त्रिक देश में एक उपभोक्ता को ये हक़ दिया गया है |  मगर मेरी आज तक समझ मे नहीं आया कि ये कैसी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है जहाँ हम 100 रुपये का सामान तो बदल सकते हैं पर करोड़ों का नेता नहीं | 

                                             हमारा संविधान हमें बहुत से अधिकार देता है क्या इस संविधान में एक अधिकार ऐसा भी नहीं होना चाहिए जहाँ हम हमारा नेता बदल सकें  या उससे भी बहेतर हम अपना वोट वापस मांग सकें |  क्यूंकि अगर हमें वोट देने का हक़ है तो यक़ीनन वोट वापस लेने का हक़ भी होना चाहिए |
                                               
                                           सिर्फ ये एक कदम इस देश के बहुत से भ्रष्ट नेताओं के पसीने छुड़ाने के लिए काफी है | क्यूंकि इसके बाद तो सारा काम जनता ही कर लेगी , किसी भी बाबा या समाज सेवक को कोई आमरण अनशन कि ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी | क्यूंकि तब नेताओं की डोर एक वास्तविक लोकतान्त्रिक देश कि तरह जनता के हाँथ में होगी | नतीजा तब नेता कुछ भी गलत करने से पहले 100 बार सोचेगा  की कहीं उसकी एक छोटी सी गलती उसे अगले ही दिन ग्राउंड से बाहर न कर दे |  और  यकीन मानिये  वोट वापसी का ये अधिकार एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक व्यवस्था की नीव रखने में एक बहुत ही मज़बूत कदम के रूप मे सामने आयेगा | 
                                                                      

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