Wednesday, December 25, 2013

Kuch samajh nahi aaya..................................

Ek baat aaj aap sabhi logon se share karna chahoongi...........asal main ye ek sawal hai jo mere dil aur dimag main kai saalon se chal raha hai.......par aaj tak mujhe uska koi santoshjanak javab nahi mila.............aaj fir koshish karti hoon aaap sabhi logon se poonchne ki........shayd is baar koi javab mil jaye.................

Bharat yani hamre desh main bahut saare dharam aur mazhab ke log rehete hain..... mera ye manna bhi hai ki har mazhab ki apni hi ek khoobsoorati aur positivity hai jo use baki dharmo se alag banati hai.........main khud Hindu hoon aur apne dharm se bahut pyar bhi karti hoon par saath hi baki ke sabhi dharmo ka samman bhi karti hoon........vajah ishwar sab jagah hai....... hum logon ne bas uske naam badal diye hain........

par ek sawal jiska jawab main aap sabhi se chahti hoon.......aur aaj mujhe us sawal ne fir pareshaan kiya...........

Hum [HINDU] jab bhi koi festival ya tyohaar mante hain to mandir jate hain..... zyadatar cases main aisa hi hota hai........Janmashtami ho ya shivratri....... deepawali ho ya ganesh utsav.......hum dheron tyuhaar manate hain........par hota kya hai........Shivratri par Bhagwaan bhole naath par itna saman chadhya jata hai ki pata chale ki bhole naath vomit kar den.........same ganesh utsav aur baki ke tyuhaaron main bhi hai....... hamari hindu parampara main pata nahi mandiron ko ganda karne se rok kyun nahi lagayi jati hai...........

Baki festivals [ Christmas, Eid, Guru parv] main jahan unka dharmik sthan saaf aur roz se kahin zyad sundar dikhta hai............hamre dhram main pata nahi kyun festivals main mandiron ki halat dekhne layak hoti hai...............

aaj main church gayi..... pehle bhi gayi hoon........lekin fir yahi sawal mere dimag main aa hi gaya...... aur such kahoon to thoda afsos bhi hua........kya hum apne mandiron ko bhi itna hi saaf nahi rakh sakte hain...............

Bholenaath doodh nahi piyenge........aap wo doodh kisi zarooratmand ko piladeneg to shayd bholenaath khush zaroor ho jayenge..........................

Is baar plz prayaas karen ki aane vale har tyuhaar main hamre mandir bhi khoobsoorat saafsuthre lagen........aur vahan bhi saaf suthra vatavaran ho...........shayd tabhi bhagwaan thoda prasann hokar dharti par agaman kar den....

PLEASE apne dharmik sthano ki safayi aapki zimmedari hai na ki bhagwaan ki........aap bhagwaan ko saaf rakhiye tabhi bhagwaan aapko mansik roop se saaf rakhenge..........

Saturday, December 21, 2013

I am back.........................

नमस्कार ! आप सभी को मेरा बहुत लम्बे समयांतराल बाद नमस्कार । बहुत लम्बे समय बाद आप सबसे मुलाकात हो रही है । इस बीच काफी कुछ बदल गया लाइफ में । मैं बाजपेयी से  अग्निहोत्री हो गयी । और अब तो उसको  हुए भी लगभग 8 माह हो चुके  हैं । खैर आप लोग बताइये आप सब कैसे हैं और कैसी चल रही है लाइफ ?

Wednesday, March 7, 2012

होली की बधाइयाँ !!!!!!





 ब्लॉग परिवार के सभी सदस्यों को होली की रंगारंग शुभकामनायें | 

Monday, January 16, 2012

अजीब दास्ताँ है ये !!!

           नमस्कार , ब्लॉग परिवार के मेरे सभी सदस्यों को मेरा बहुत दिनों बार एक सादर नमस्कार | जानती हूँ बहुत दिनों बाद आना हो पा रह है आपके बीच , सच मानिये इन दिनों बहुत मिस किया आप सबको | इस दौरान बहुत कुछ हुआ जीवन में, ज़्यादातर अच्छा या शायद बहुत ही अच्छा था, कुछ कडवे पल भी थे, पर इन दोनों के मिश्रण में अच्छे पल ज्यादा थे | जैसा कि आप सभी जानते हैं मैंने फिर से पढ़ाई शुरू कर दी है, अब मास्टर्स कर रही हूँ सोशल वर्क में | कुछ सपने हैं जिन्हें पूरा करने के लिए इसे करना शायद ज़रूरी था | मेरे ब्लॉग परिवार के भी कुछ सदस्यों ने ठीक एक परिवार कि तरह मेरा साथ निभाया | इनमे से कुछ लोगों का नाम में खास तौर पर लेना चाहूंगी मेरे परिवार के वो सदस्य हैं विजय माथुर सर , यशवंत , सुबीर सर  ये वो नाम हैं जिन्होंने मेल, फेसबुक या किसी ना किसी तरीके से मुझे ये एहेसास कराया कि हार नहीं माननी है | आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद |

                                 पिछले कुछ महीनों में कुछ उपलब्धियां भी मेरे हिस्से में आयीं | मुझे मेरे डिपार्टमेंट कि मिस फ्रेशेर चुना गया | साथ ही इस दौरान मुझे यूनिवर्सिटी लेवल के कई प्रोग्राम ओर्गनाईज करने के मौके भी मिले | जिसके लिए मुझे काफी ज्यादा प्रोत्साहित किया गया, और कई पुरस्कार भी मिले | अच्छा लगता है जब आपके काम कि तारीफ होती है, जोश बढ़ जाता है |  खैर ये सब तो रहीं वो बातें जो मेरी कुछ छोटी मोटी  उपलब्धियों से जुड़ी हैं | इस दौरान एक और बहुत अच्छा मौका मुझे और मिला, सोशल वर्क के स्टूडेंट को किसी  स्वयं सेवी संस्था से भी जुडना पडता है | बहुत सोचने विचारने के बाद मैंने अपने एक सपने को ही इसी चुनने का अधार बनाया, मैंने जिस संस्था से खुद को जोड़ा उसका नाम शायद आप सबने सुना होगा, उसका नाम है "हेल्प एज इण्डिया "| यहाँ बुजुर्गों के साथ काम करने का खास तौर पर उनकी हे़ल्थ से जुड़े मुद्दों को देखने और समझने का मौका मिला |

            इस दौरान दो केस मेरे हाथ में आये | स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाए तो संस्था उन्हें पहेले ही दे रही थी | हमारा काम उनकी स्टडी, डैग्नोसिस और ट्रीटमेंट देना है | ये दोनों केस दो वृद्ध महिलाओं के थे | जो दोनों हो ७० वर्ष से ऊपर की आयु कि हैं | संस्था उनके स्वास्थ्य का इलाज निशुल्क कर रही है | पर उनसे बात चीत के दौरान पता चला कि उनकी ये समस्या शारीरिक के कई गुना ज्यादा मानसिक और सामाजिक है | वही अकेलापन, बुढ़ापे में औलादों का साथ ना देना और आर्थिक समस्या | कुछ देर के लिए तो थोड़ी उपसेट हो गयी थी, सोच कुछ मदद कर दूं | पर फिर याद आया कि सोशल वर्क हमें क्या सिखाता है | हमारे यहाँ असली मदद वो होती है जो आजीवन चले और क्लाइंट को दोबारा वो समस्या ना हो  और वो आत्मनिर्भर बन सके |

                    थोडा विचारने के बाद एक विचार दिमाग में आया क्यूँ ना इन्हें कोई सरकारी मदद दिलवा दी जाये|  एक वकील से परामर्श लिया कि ऐसी कौन कौन सी सरकारी योजनाये हैं जो इनके मदद कर सकतीं हैं | सब कुछ पता लगाने के बाद एक योजना मुझे सही लगी, योजना के नाम नहीं बताऊंगी, क्या पता इसे भी लोग चुनाव प्रचार का तरीका समझ लें | तो मैं ऐसा कोई भी प्रयास नहीं करना चाहती | खैर उस योजन से जुड़े फॉर्म मैंने उन दोनो से भरवाए, कुछ खास कागज के ज़िरोक्स कराये | और पूरा कार्य करके सारे कागज अपनी संस्था की एक्जीक्यूटिव को दिए ताकि वो संस्था के माध्यम काम को तेज़ी से आगे बढ़ाएं |
     अभी काम पूरा तो नहीं हुआ है पर लगभग अंतिम चरण पर है | संस्था को भी मेरा ये प्रयास अच्छा लगा | और अब काम बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है | जल्द ही दोनों क्लाइंट्स को पेंशन मिलाने लगेगी | वो दोनों अम्मा जी जिस तरह से मुझे आशीर्वाद दे रहीं थी यकीन मानिये अगर थोड़ी देर भी और वहाँ रुकती तो रो पड़ती | उनके घर की स्थिति भी बहुत खराब थी | उनमे से एक अम्मा जी को तो अब दिखता भी नहीं था | दोनों के दो- दो तीन तीन बेटे बहुएं पर सबने उन्हें अपने से अलग कर दिया |
      ये बुढ़ापा केसे कटेगा वो बार बार यही कह कर रोतीं रहीं | बहुत बुरा लग रहा था | ऐसा लग रह आता कि काश भगवान मुझे कोई शक्ति दे दे और मैं इनके सरे दुःख खतम कर दूं | पर ये तो हो नहीं सकता | इसलिए जो कर सकती हूँ वो करने कि कोशिश कर रही हूँ |
     जानती हूँ दुनिया को नहीं सुधार सकती | पर जितना  कर सकती हूँ उतना तो करूंगी ही | कम से कम जब तक जिन्दा हूँ तब तक तो हार नहीं मानूंगी | और वैसे भी जिसके साथ उसके परिवार [ फिर चाहे वो मेरा अनुवांशिक परिवार हो या नेट या ब्लॉग का परिवार ] का आशीर्वाद होता है वो देर से ही सही सफल ज़रूर होता है |  आशा है इतने दिनों बाद अपनी ये कहानी सुना कर आप सबको बोर नहीं किया होगा |
                                                                                                                        नमस्कार |                      

Saturday, December 31, 2011

नव वर्ष की शुभकामनायें !!!


           ब्लॉगर परिवार के सभी सदस्यों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकानाएं |

Friday, October 7, 2011

मै थोड़ी हैरान हूँ !

                                     जिस विषय पर आज लिखने जा रही हूँ हालाँकि उस विषय पर पहले भी लिख चुकी हूँ, पर इस बार बात और सोच थोड़ी अलग है | विषय है बालश्रम | जानती हूँ विषय पुराना है पर विश्वास रखिये सोच नयी ही होगी |
                                       


                                  सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं की आखिर मैंने ये विषय चुना ही क्यूँ | आज कल फिर पढाई करने लगी हूँ, असल मैं मैंने कानपुर यूनिवर्सिटी में ही मास्टर इन सोशल वर्क में एडमिशन लिया है | और ये शायद मेरा सौभाग्य ही है की यहाँ आते ही एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मेरे विभाग को मिल गया | जिसमे  शहर में मौजूद बाल श्रमिकों के बारे में सर्वे करना था | चूँकि पत्रकारिता की भी छात्रा रह चुकी हूँ इसलिए चाहते हुए भी वो कीड़ा अपने अंदर से नहीं निकाल पायी हूँ, और कुछ हद तक ये बहुत अच्छा भी है शायद तभी  निष्पक्ष  और संवेदनाओं से परे रह कर काम कर पाऊँगी |
                                        इस सर्वे के दौरान अलग अलग लोगों से अप्रत्यक्ष रूप से लोगों से जानने का प्रयास किया की आखिर शहर में बाल श्रम की स्थिति क्या है पर जवाब संतोषजनक नहीं थे, तब अपने पत्रकारिता गुरु की सलाह पर कुछ देर के लिए सोशल वर्कर से फिर पत्रकार बन कर सर्वे का काम शुरू किया | आपको जानकर आश्चर्य होगा ३० मिनट के अंदर ही १०० से  १५० बाल श्रमिक सामने आ गए | सर्वे का काम तो उस वक्त हो गया, पर एक नया सवाल मेरे सामने खड़ा हो गया |
                                           इस दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसे बाल श्रमिक से हुई जिसने मुझे फिर नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया | मैंने जब उस बच्चे से पूछा की क्या वो मुफ्त में पढाना लिखना चाहेगा | तो उस महज १०-११ के बच्चे का जवाब था " पागल हूँ क्या, पढ़ाई किसको करनी है, हाँ पैसा कमाने का कोई और तरीका हो तो बताओ "| मुझे हंसी भी आई और बहुत हैरानी और अफ़सोस भी हुआ |   समझ ही नहीं आया कि इस बच्चे कि बात को किस तरह से लूं | कहीं ऐसा तो नहीं कि हम किसी गलत दिशा में प्रयास कर रहे हैं |

              हाँ हम गलत दिशा में ही प्रयास कर रहे हैं | हम [ यानि सरकार] लगातार स्कूल खोलते जा रहे हैं , आये दिन सरकारी योजनाओं के तहत स्कूल खुलते हैं , उनमे भोजन मिलता है , किताबें भी मुफ्त मिलतीं हैं और तो और यूनिफार्म भी मुफ्त ही मिलती है | पर क्या सरकार ने कभी भी ये जानने की कोशिश की कि क्या इन स्कूलों में जितने बच्चे पढ़ रहे हैं वो वास्तव में पढ़ना भी चाहते हैं या नहीं | शायद  नहीं ! और बिना सोचे समझे वो इन शिक्षा सम्बन्धी योजनाओं पर पानी की तरह पैसा बहा रही है |

                                             एक मिनट आप लोग ये बिलकुल मत सोचियेगा की मैं देश की भावी पीढ़ी की शिक्षा के पक्ष में नहीं हूँ | मेरी ऐसी सोच बिलकुल नहीं है | मैं भी भी चाहती हूँ की हमारा देश विश्व का सबसे शिक्षित देश बने | पर उसके लिए सबसे पहले उस भावी पीढ़ी के मन में ये सोच डालनी होगी की शिक्षा के बिना वो अल्पकालिक धनार्जन या तरक्की तो कर सकते हैं पर दीर्घकालिक विकास और तरक्की के लिए शिक्षा के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है |

                             इस वक्त इन बच्चों को स्कूल से ज्यादा किसी अच्छे काउंसलर यानि किसी अच्छे परामर्शदाता की ज़रूरत है , जो की सर्वप्रथम इनकी सोच बदल सके | क्यूंकि बिना सोच बदले सरकार लाख स्कूल बना ले पर इस बच्चों को शिक्षित नहीं कर पायेगी | एक बार कभी अपने इलाके के किसी सरकारी स्कूल में जाकर देखिये ७० से ७५ प्रतिशत बच्चे तो आपको वहाँ सिर्फ मिड-डे-मील के लालच में ही दिखेंगे | गलती इनकी भी नहीं है एक भूखा इंसान किताबों से तो पेट नहीं भर सकता, और वो भी बच्चे , बिलकुल नहीं |

                                     ये जो कुछ भी मैं कह रही हूँ ये कोई कल्पना नहीं है , ये वो सच है जिसे आप जब चाहें जांच सकते हैं | सिर्फ एक बार किसी बाल श्रमिक को रोक कर उससे पूँछिये कि मुफ्त स्कूल और कमाई में वो क्या चुनेगा ? यकीन मानिये ९५ प्रतिशत से ऊपर बच्चा कमाई ही चुनेगा |   कारण उस सोच कि कमी | बच्च आपना भविष्य खुद नहीं देख सकता , हमें उसे सपने देखना सिखाना होगा | हमें उसे ये बताना होगा कि अगर असल तरक्की चाहिए तो पढाना ही पड़ेगा | उसमे पढई के प्रति रूचि डालनी होगी |  वरना ये बेवजह स्कूलों कि भीड़ लगाने का कोई फायदा नहीं होने वाला |

Monday, September 12, 2011

हाँ सर क्या लेंगे आप !

                       
                                                                  हं हं ये ज़रूरी नहीं की हर बार आपको इतने ही शिष्ट और सभ्य शब्द सुनाई दें कभी कभी तो ऐसे कर्कश ध्वनि आपके कानों में गूंजती है की आपका कुछ खाने का मन ही नहीं करेगा | क्यूँ ऐसा आपके साथ कभी नहीं हुआ | मिडिल क्लास नहीं होंगे ना, इसलिए | देखिये मैंने बहुत अच्छे रेस्टोरेंट्स में भी खाना खाया है और साधारण से दिखने वाले ढाबों पर भी खाया है |

                                     हर जगह अलग-अलग नज़ारे देखने को मिलते हैं | अगर किसी शिष्ट जगह पहुँच गए तो आप एकाएक स्वयं को किसी बड़े राजा महाराजा से कम महसूस नहीं करेंगे | होटल का वेटर आपको इतना  आदर देगा जितने की शायद आपको आदत नहीं होगी | पर क्या करे बेचारा घर पर बीवी से चाहे  कितनी ही बुरी तरह से झगडा कर के आया हो आपका स्वागत वो मुस्कुराहट के साथ ही करेगा | बड़ा अच्छा लगता है | एक साफ़ सुथरी मेज़ पर वो बिलकुल चमचमाते गिलासों में पानी लाकर देगा | आपको भी प्यास लगी होगी पर आप आस पास के लोगों पर अपनी नज़र दौड़ाएंगे की वो इस परिस्थिति में क्या कर रहे हैं | यकीं मानिये अगर पड़ोस की टेबल पर बैठे सूटेड बूटेड आदमी ने पानी नहीं पिया है तो आप भी सहर्ष प्यासे मरना स्वीकार करेंगे | फिर आप नज़र डालेंगे मेन्यू पर | पहली बार में तो आप सारी डिशेज का रेट देखेंगे, फिर शुरू होगा औड मैन आउट वाला सिस्टम | यानि आप हर उस चीज़ को अपनी पसंद से बाहर करने का प्रयास करेंगी जो असल में आपके बजट के बाहर हैं | अब बारी आयेगी आपकी बीवी की जो शत प्रतिशत आपका ही अनुसरण करेगी, एक सीधा सा जवाब जो अपने लिए मंगा रहे हैं वही मंगा लीजिए | आप उन्हें थोड़ी अजीब सी निगाहों से देखेंगे और सोचेंगे की काश कुछ और ऑर्डर करती तो वो भी खाने को मिल जाता | पर चलो कोई बात नहीं जो है वही खाते हैं | अब बारी आएगी सबसे बड़ी परीक्षा की यानि बच्चों की | अगर धोखे से पूंछ लिया तो मान कर चलिए की मेन्यू की सबसे कीमती डिश पर ही उंगली जायेगी | अब क्या करें, अब आप उसे अपनी पूरी ताकत लगा कर उसे समझाने का प्रयास करेंगे की बेटा ये बिलकुल अच्छा नहीं है या ये बहुत सारा है आप इसे खा नहीं पायेंगे और ना जाने क्या क्या | बच्चा अगर समझदार हुआ तो आपका इशारा समझ जायेगा पर अगर वो कलयुगी संतान हुई तो ये मान लीजिए आपका बजट बिगडने वाला है |



           यहाँ तक का सफर तो फिर भी ठीक था | अब बारी आयेगी उस अमूल्य भोजन को गले से नीचे उतारने की | वेटर बहुत ही सफाई से आपकी टेबल पर आपका सारा आर्डर लाकर रखेगा | अचानक एक ज़ोरदार धमाका होगा जानते हैं ये क्या हुआ, असल में आपके बच्चे ने टेबल पर रखा पानी का गिलास गिरा दिया होगा | आप एक लज्जित और अर्धविक्षिप्त मुस्कुराहट से आस पास के लोगों को देखते हुए कहेंगे की आज कल के बच्चे बहुत शैतान हो गए हैं | उसके बाद धीमे से अपने बच्चे को चुटकी काटते हुए उसे कहेंगे की घर चलो तब बताऊँगा, आज के बाद कभी घुमाने नहीं ले जाऊँगा | बच्चे को एकाएक अपनी गलती का अहसास होता है, और वो शांत हो जाता है | अब आप खाना खाना शुरू करते हैं | छुरी कांटे से खाना आपके लिए थोडा मुश्किल होगा पर आखिरकार आप फ़तेह पा ही लेंगे | और आखिर में वेटर को पेमेंट के दौरान सिर्फ रौब दिखाते हुए एक अच्छी खासी टिप देकर वहाँ से एक विजयीभव् जैसा भाव लेकर वहाँ से बाहर निकलेंगे |
                    कहानी यहीं खतम नहीं होगी असल में ये कहानी अगले दिन आपके दफ्तर और पड़ोसियों तक भी   किसी ना किसी रूप में जायेगी | और तब समाप्त होगा आपका असली राजसी दिन |

     
              इस पूरी कथा के बाद अब आते हैं एक दूसरे चित्र पर जो ज्यादा आम है | ये जिंदगी है स्ट्रीट फ़ूड की, नुक्कड़ पर बिकने वाली चाट और पानी पूरी की | जो मेरे हिसाब से उस आलिशान होटल के खाने से कहीं ज्यादा स्वादिष्ट है | खास तौर पर आज मैं सभी महिला ब्लोगर्स को उनके पुराने या वर्तमान दिन याद दिलाने का प्रयास करूंगी | जब कॉलेज के बाहर लगे ठेलो पर अपनी सहेलियों के साथ खूब गोल गप्पे खाए हैं | आज भी जब कभी भी इन ठेलों के सामने से गुज़रना होता है तो हम वहाँ से कुछ खाए बिना नहीं रह पाते | सच कहूँ तो कोई फर्क नहीं पडता था की वो ठेला कैसा है उसने हाँथ धोए हैं या नहीं | मज़ा तो तब आता था जब कुछ सेकण्ड इंतज़ार के बाद आपका नंबर आता है तो एन उसी वक्त कोई और अपनी कटोरी आगे कर देता था | ऐसा लगता था मानो किसी ने हमसे हमारी पूरी जायदाद ले ली हो |एक और चीज़ जो अक्सर गर्ल्स कॉलेज के बाहर मिलती है, जिसे मैंने तो नहीं चखा पर हाँ अपनी सहेलियों को खाते हुए ज़रूर देखा है और वो है इमली  और वो रंग बिरंगा चूरन और साथ में एक और ठेला जहाँ कुछ ठंडा मिलता था याद आया वो रंग बिरंगे बर्फ के गोले और फलूदा | ये तो मैंने खाया है और आज भी अगर मौका मिलता है तो  उसे छोडती नहीं हूँ |


                 सच कहूँ तो ये सब चीज़ें सिर्फ और सिर्फ हमारे देश में ही मिल सकतीं हैं | ये वो स्वाद हैं जो सिर्फ आपकी ज़बान पर नहीं आपके दिल में रहते हैं | आप जब भी चाहें इनको बिना खाए इनका स्वाद ले सकते हैं | मुझे यकीन है इस पोस्ट को पढने के दौरान भी आप में से कईयों के मुंह में पानी आ गया होगा | तो कोई बात नहीं ये तो हमेशा हमारे बजट में आएगा | तो चलिए चलते हैं फिर उन्ही ठेलों पर | और कहते हैं "भैया थोडा मटर और डालो ना या थोडा पानी और मिलेगा"|





Monday, September 5, 2011

HAPPY TEACHER'S DAY.



सभी गुरुजनों को शिक्षक दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें |

Thursday, September 1, 2011

गणपति बाप्पा मोरिया !



सभी देशवासियों को गणेश चतुर्थी की बहुत बहुत शुभकामनायें |

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